लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का कर्तव्य सत्य का धारण करना और असत्य का त्याग करना है। सत्यासत्य का निर्णय करने के लिए एक ऐसे ग्रन्थ की आवश्यकता होती है जिसमें मनुष्य जीवन के सभी पक्षों व सभी कर्तव्यों एवं कर्मों का उल्लेख व अकरणीय कार्यों का निषेध दिया गया हो। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि के मनुष्यों को वेद ज्ञान दिया था। वेद ज्ञान सब सत्य विद्याओं व कर्तव्य कर्मों का ग्रन्थ है। वेदों का ज्ञान ईश्वर प्रदत्त ज्ञान है जो सृष्टि के आरम्भ में सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी ईश्वर ने चार पवित्र आत्माओं वाले ऋषि अग्नि, वायु, आदित्य और अंगिरा को दिया था। उन्हीं से आरम्भ परम्परा से वेदों का ज्ञान ब्रह्मा जी को प्राप्त हुआ और सृष्टि के 1.96 अरब वर्षों बाद भी वही ज्ञान आज हमें प्राप्त है। सृष्टि की आदि में जो अमैथुनी सृष्टि हुई थी उस काल के ऋषि पवित्र आत्मा वाले होने के कारण उनकी बौद्धिक योग्यता भी कहीं अधिक थी। वेदों का ज्ञान परमात्मा ने मन्त्रों के अर्थ सहित दिया था। कई पीढ़ियों तक वेदों का प्रचार प्रसार चलता रहा और उसके लेखन आदि के द्वारा संरक्षण की आवश्यकता अनुभव नहीं हुई थी। बाद में जब मनुष्यों की बौ़द्धक क्षमता कुछ कम हुई तो वेदों के आधार पर कुछ स्मृति आदि ग्रन्थों की रचना की आवश्यकता हुई। मनुस्मृति ऐसा ही ग्रन्थ है जो वेदों के आधार पर रचा गया और इससे उन दिनों मनुष्य जाति अपने कर्तव्यों का बोध प्राप्त करती थी। महाभारत काल तक वेद अपने यथार्थ अर्थो सहित सुरक्षित रहे। महाभारत युद्ध के बाद देश की शासन व सामाजिक व्यवस्था कमजोर होने से वेदों का अध्ययन अध्यापन व प्रचार बाधित हुआ जिससे ऋषि परम्परा समाप्त हो गई और देश व विश्व में अज्ञान छा गया है। इसी कारण समाज में अनेक अन्धविश्वास एवं मिथ्या परम्परायें आदि प्रचलित हुईं। कालान्तर में देश में बौद्ध व जैन मतों का आविर्भाव भी हुआ और उसके बाद आचार्य शंकर का अद्वैत मत व अनेक मत-मतान्तर उत्पन्न हुए जो अविद्या पर आधारित थे। देश से बाहर भी पारसी, ईसाई व इस्लाम मतों का आविर्भाव हुआ। अविद्या व अन्धविश्वासों के कारण ही भारत सन् 715 ईस्वी से गुलाम होना आरम्भ हुआ। धीरे धीरे देश के अनेक भागों में गुलामी का प्रभाव वृद्धि को प्राप्त होता गया।

 

ऋषि दयानन्द (1825-1883) के काल में भारत अंग्रेजों का गुलाम था। देशवासियों को ईसाई बनाने के षडयन्त्र रचे गये व उन्हें पूरा करने के प्रयत्न किये जा रहे थे। इसी कारण से देश में मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को प्रचलित कराया और वेदों के दूषित अर्थ करके प्रचारित व प्रसारित किये गये। ऋषि दयानन्द के काल तक मुस्लिम व अंग्रेज शासको की प्रेरणा व सहयोग से लाखों हिन्दुओं का धर्मान्तरण हुआ। इस धर्मान्तरण में हिन्दू समाज की अविवेकपूर्ण अनेक मान्यतायें भी सम्मिलित थीं। अज्ञानता के कारण ही देश में मूर्तिपूजा, अवतारवाद, फलित ज्योतिष, मृतक श्राद्ध, पर्दा प्रथा, बाल विवाह आदि का प्रचलन हुआ और इसी कारण देश में जन्मना जाति व्यवस्था भी प्रचलित हुई। स्त्री व शूद्रों को वेद व इतर ज्ञान के अध्ययन से वंचित किया गया। शूद्रों के प्रति छुआछूत आदि का व्यवहार भी किया गया। बाल विवाह के कारण बाल विधवाओं की समस्या भी उत्पन्न हुई। पौराणिक मान्यताओं में विधवाओं के लिए पुनर्विवाह का अधिकार नहीं दिया गया और उनके प्रति अनेक प्रकार के अत्याचार हुए। यहां तक की सती प्रथा प्रचलित हुई जिससे मातृशक्ति को एक अमानवीय कू्रर परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। ऐसे समय में ऋषि दयानन्द जी का आगमन हुआ। ऋषि दयानन्द जी ने अपनी आयु के 22 वें वर्ष में गृहत्याग किया था। उन्होंने ज्ञान प्राप्ति हेतु देश भर का भ्रमण किया। उन्हें योग के सिद्ध गुरुओं की प्राप्ति हुई और वह योग व ईश्वर उपासना में सफलता को प्राप्त हुए। स्वामी दयानन्द जी को विद्या गुरु के रूप में प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती, मथुरा का सान्निध्य प्राप्त हुआ और उनकी संगति से स्वामी दयानन्द जी सन् 1863 में अपनी विद्या दीक्षा लेकर देश से अविद्या दूर करने के संकल्प के साथ कार्यक्षेत्र में प्रविष्ट हुए।

 

स्वामी दयानन्द जी ने समाज में फैले असत्य व अज्ञानता से युक्त अंधविश्वासों का खण्डन आरम्भ कर दिया। मूर्तिपूजा व फलित ज्योतिष को उन्होंने सब अन्धविश्वासों की जननी मानकर इनका प्रबल खण्डन किया और अपने पक्ष को वेद, वैदिक साहित्य सहित युक्ति व तर्क से प्रमाणित व पुष्ट किया। स्वामी उपदेश व प्रवचनों के द्वारा मौखिक प्रचार करते थे। उन्होंने पौराणिक, बौद्ध, जैन, ईसाई व मुसलमानों आदि विभिन्न मत-मतान्तरों के आचार्यों से शास्त्रार्थ भी किये। हर शास्त्रार्थ व शास्त्र चर्चा में वैदिक पक्ष ही पुष्ट हुआ। स्वामी दयानन्द जी देश भर में घूम कर प्रचार करते थे। बनारस में प्रचार करते हुए उन्हें राजा जयकृष्णदास जी ने अपने विचारों, मान्यताओं व सिद्धान्तों का एक ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा की जिससे वह लोग भी लाभान्वित हो सकें तो किसी कारण से उनके प्रवचनों में पहुंच नहीं पाते थे। स्वामी जी जहां नहीं जा पाये थे वहां के लोग भी इस ग्रन्थ से लाभान्वित हो सकते थे। स्वामी जी के जीवन के बाद भी उनका वह ग्रन्थ उनके शिष्यों के लिए उपयोगी व मार्गदर्शक हो सकता था। इन सब कारणों व लाभों पर विचार कर महर्षि दयानन्द ने अपनी वैदिक मान्यताओं का ग्रन्थ लिखना स्वीकार कर लिया और शीघ्र ही लेखन कार्य आरम्भ कर दिया। इस ग्रन्थ का नाम ‘सत्यार्थप्रकाश’ रखा गया। यह ग्रन्थ सन् 1874 में प्रकाशित हुआ था। स्वामी जी के जिन लिपिकर्ताओं ने इस ग्रन्थ को लिखा, प्रेस कापी तैयार की व मुद्रणालय के कर्मचारियों ने भी स्वामी जी की मान्यताओं के विरुद्ध भी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के कुछ स्थानों पर प्रक्षेप कर दिये। स्वामी जी को इनका ज्ञान हुआ तो इसका संशोधित संस्करण निकालना आवश्यक हुआ। सन् 1883 में यह सत्यार्थप्रकाश का नया संस्करण 14 समुल्लासों में तैयार हो गया था और मुद्रणालय में इसका मुद्रण कार्य चलता रहा जो सन् 1884 में पूर्ण होकर स्वामी जी की मृत्यु के बाद प्रकाशित हुआ।

 

सत्यार्थप्रकाश सभी वेदों की प्रमुख मान्यताओं को अपने भीतर समेटे हुए है। देश की दुर्दशा का चित्रण व उसको दूर करने के उपाय भी सत्यार्थप्रकाश में दिये गये हैं। ईश्वर, जीव व प्रकृति के स्वरूप पर भी इस ग्रन्थ में विस्तार से चर्चा है। इन तीनों अनादि पदार्थों के सत्यस्वरूप इस ग्रन्थ में अनेक प्रमाणों से सुशोभित हो रहे हैं। मनुष्य धर्म के जितने भी कर्तव्य व अनुष्ठान आदि हैं, उनका भी संक्षिप्त उल्लेख सत्यार्थप्रकाश में किया गया है और संस्कारों पर एक अलग से संस्कारविधि पुस्तक लिखी गई है। पूरा सत्यार्थप्रकाश वेदानुकूल ऋषिकृत रचना होने से वेदों के बाद इसका प्रमुख स्थान है। यह सनातन वैदिक धर्म की शोभा है। वेदों से सभी प्रमुख मान्यताओं वा सिद्धान्तों को वेद मन्त्रों के उद्धरण सहित इस ग्रन्थ में हिन्दी में दिया गया है। एक साधारण हिन्दी जानने वाला व्यक्ति भी इसे पढ़कर धार्मिक विद्वान बन सकता है। स्वामी जी के समय में देश व देश से बाहर जो प्रमुख मिथ्या मत-मतान्तर प्रचलित थे उनकी मान्यताओं को प्रस्तुत कर उनकी समीक्षा भी इस ग्रन्थ में की गई है जिससे यह ज्ञात होता है कि वेद के अतिरिक्त संसार का अन्य कोई मत पूर्ण सत्य सिद्धान्तों से युक्त नहीं है। सत्यार्थप्रकाश वेद सहित सभी मनुष्यों का धर्म ग्रन्थ है। दूसरे मत वाले अपने आचार्यों के पक्षपात के कारण इसे स्वीकार नहीं करते परन्तु आर्यसमाज के अनुयायियों के लिए तो यह अन्य किसी धर्म ग्रन्थ के समान ही धर्म ग्रन्थ है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें असत्य कहीं कुछ भी नहीं है। इस एक ग्रन्थ को पढ़ लेने पर संसार के सभी मत-मतान्तरों की मान्यताओं व उसमें निहित मिथ्या तत्व से पाठक परिचित हो जाता है। सत्यार्थप्रकाश की रचना को 143 वर्ष हो चुके हैं। इसके अंग्रेजी व अनेक देशी व विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध हैं। हमारे पास भी प्रायः सभी अनुवादों की पीडीएफ उपलब्ध हैं जो किसी भी पाठक को उपलब्ध कराई जा सकती हैं। वस्तुतः सत्यार्थप्रकाश आधुनिक युग का प्रमुख धर्म ग्रन्थ है। संसार के सभी लोगों को इस ग्रन्थ को मानव जीवन के लिए सर्वाधिक उपयोगी मानकर अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकों की तरह एक बार तो अवश्य ही इसे पढ़ना चाहिये और विवेकपूर्वक इसकी मान्यताओं व शिक्षाओं पर विचार करना चाहिये। हम अनुभव करते हैं कि जो भी मनुष्य पक्षपातरहित होकर इस पुस्तक का अध्ययन करेगा वह इससे लाभान्वित होगा। महर्षि दयानन्द ने अपने भक्तों की प्रार्थना पर चैत्र शुक्ल पंचमी तदनुसार 10 अप्रैल, 1875 को मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की थी। आर्यसमाज ही इस ग्रन्थ का विश्व में प्रचार करता है। आर्यसमाज ने देश, धर्म रक्षा सहित समाज की उन्नति के सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। आर्यसमाज ही देश की समाज सुधार की प्रमुख धार्मिक व सामाजिक संस्था है। आर्यसमाज के स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में हम सबको स्थापना दिवस की बधाई देते हैं। ओ३म् शम्।

 

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