लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

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समस्त आवेग, आवेश उद्वेग और अशान्त हस्तिनापुर से बहुत दूर गंधमादन पर्वत के शतशृंग शिखर पर सुनील सरोवर के किनारे हमारी पर्णकुटी थी। चारों ओर हरी भरी वनस्पतियां थीं। वृक्ष फलों से लदे रहते थे। हिरणों और खरगोशों के झुंड कुटी के आसपास भ्रमण करते रहते थे। हम पांचों भ्राताओं का जन्म इसी पर्णकुटी में हुआ था। गंधमादन का अरण्य ही हमारा राजमहल था। वहाँ के विभिन्न प्राणी हमलोगों के मित्र थे। पक्षियों का संगीत ही हमारा मनोरंजन था.

वन में दो माताओं और पिता के अतिरिक्त अरण्य निवासी देवताओं के समान तेजस्वी संपूर्ण मंत्रज्ञ अनेक महर्षिगणों का भी सान्निध्य प्राप्त था। हम पिताजी के साथ ऋषि आश्रमों में जाया करते और वे लोग प्रसाद के रूप में फल-फूलों के अतिरिक्त हमें शस्त्र विद्या और शास्त्र विद्या की प्रारंभिक शिक्षा भी देते थे। बड़े भैया पिताजी के साथ महर्षिगणों के प्रवचन-श्रवण में अपना अधिक समय बिताते। मेरे लिए धनुष-बाण की व्यवस्था कर दी गई थी। मैं दिन भर शर-संधान का अभ्यास करता। भीम भैया को किसी अस्त्र-शस्त्र की आवश्यकता नहीं थी। वे प्रायः बाघ के साथ खेलते रहते थे और कभी एक-दो सिंह-शावकों को पकड़ पर्णकुटी में भी ले आते थे। वे अरण्य के किसी हिंस्र पशु से भी भय नहीं खाते थे। हमारी क्रीड़ाओं के लिए शतशृंग पर्वत शिखर की शृंखलाएं भी कम पड़ने लगीं। गंधमादन पर्वत का यह अरण्य ही हमारा साम्राज्य था और हम पांचों थे उसके राजकुमार। हमें माताओं द्वारा यह ज्ञात हुआ कि मूलतः हम हस्तिनापुर राज्य के राजकुमार हैं। लेकिन पिताजी के तपस्वी वेश को देखकर इस कथन पर कभी विश्वास ही नहीं होता था। हमलोगों को हस्तिनापुर की कामना भी नहीं थी। हम गंधमादन पर्वत के प्राकृतिक साम्राज्य से ही संतुष्ट थे। दो माताओं, पिताजी और हम पांच भ्राताओं की दुनिया ही अलग थी।

वन में निर्बाध रूप से बहती सरिताएं हमें अपने व्यवहार से शिक्षा देतीं – जीवन सदा प्रवाहमान होना चाहिए। ऊँचे-ऊँचे धवल पर्वत शिखर हमें आमन्त्रित करते और सिखाते कि हमें भी उनकी ऊँचाई प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्वच्छ नीला आकाश हमें मन की पवित्रता बनाए रखने की प्रेरणा देता, वहां के विभिन्न जीव-जन्तुओं को शीतल छाया प्रदान करनेवाले तरुवर हम सबको संसार के लिए कर्त्तव्य-पालन हेतु तिल-तिलकर गलने का संदेश देते, पक्षियों की ऊँची उड़ानें हमलोगों के साहस को चुनौती देतीं।

हमारे दिन आनन्द से व्यतीत हो रहे थे लेकिन ईश्वर को यह कहां स्वीकार था। माँ मेरा जन्म दिवस मना रही थी। उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में ब्राह्मणजनों का स्वस्तिवाचन प्रारंभ हुआ ही था कि हमें समाचार मिला – हमारे पिताजी, हस्तिनापुर साम्राज्य के महाराज, कुरुकुल शिरोमणि पाण्डु अपना पार्थिव शरीर छोड़ परम सत्ता में विलीन हो गए। जन्म के पश्चात हम पर यह सबसे बड़ा वज्राघात था। शोकविह्वल माता माद्री पिताजी के साथ ही सती हो गईं। हम पांचों भ्राताओं को माता कुन्ती गोद में लेकर अश्रुवर्षा करती रहीं।

मृत्यु जीवन का ऐसा भंवर है जिससे कोई पार न पा सका। जीवन की आयु लंबी होती है मृत्यु की बस पल दो पल। जीवन हर क्षण मृत्यु से संघर्ष करता है और विजयी भी होता है लेकिन अन्तिम विजय तो मृत्यु की ही होती है। सृष्टि के प्रारंभ से आजतक न जाने कितने जन काल की गाल में समाए लेकिन मृत्यु देवी कभी तृप्त नहीं हुईं। हम छः प्राणी पर्णकुटी में बच गए थे। दिन में तो महर्षिगण आकर सांत्वना दे जाते लेकिन रात जैसे ही पंख फैलाती, हमारी पर्णकुटी में सन्नाटा पसर जाता। कौन किसके आँसू पोंछ्ता। सिसकियां ही रात्रि की निस्तब्धता भंग करतीं। मृत्यु से यह मेरा प्रथम साक्षात्कार था।

पिताजी के स्वर्ग गमन के पश्चात अरण्यवासी तपस्वी, ऋषि-मुनि ही हमलोगों के अभिभावक थे। उन्होंने आपस में एक दिन मंत्रणा करके यह निर्णय लिया कि हमलोगों को हस्तिनापुर जाकर ही रहना चाहिए और विधिवत क्षत्रियोचित शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए। माता कुन्ती ने भी महर्षियों की इस योजना का अनुमोदन किया।

हम पांच भ्राता, माता कुन्ती और अरण्यवासी देवदुर्लभ तपस्वियों के साथ हाथ में पिताजी और माता माद्री का अस्थि-कलश ले हस्तिनापुर के लिए निकल पड़े। नगर पहुंचने के पश्चात वर्धमान द्वार पर पितामह भीष्म, ताऊ धृतराष्ट्र, सोमदत्त, संजय, विदुरजी, सौ भ्राताओं के साथ दुर्योधन, देवी सत्यवती और देवी गांधारी ने हम सबका राज्योचित ढंग से स्वागत किया। महाराज धृतराष्ट्र ने पिताजी की मृत्यु के शोक को राजकीय शोक घोषित किया और उनकी अन्त्येष्टि क्रिया विधिवत पूर्ण की।

हम पांचों भ्राता दुर्योधन और उसके सभी भाइयों के साथ राजमहल में रहने लगे। हमलोग साथ-साथ भोजन करते और क्रीड़ा करते। दुर्योधन को भैया युधिष्ठिर सदा सुयोधन कहकर पुकारते। अपने शत्रुओं का भी दिल अपने निर्मल व्यवहार से जीत लेने का निर्मल गुण भैया को प्राप्त था। महात्मा विदुर और पितामह भीष्म उनके इस गुण से बहुत प्रभावित रहते। जो भी उनके संपर्क मंत आता वह उनकी धर्म पारायणता, निष्कपट प्रेम, दयालुता, दृढ़ता, नेतृत्व क्षमता और न्यायप्रियता से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। हस्तिनापुर में धीरे-धीरे सार्वजनिक रूप से यह चर्चा व्यापक होने लगी कि राजसिंहासन का सुयोग्य अधिकारी युधिष्ठिर ही हो सकते हैं। दुर्योधन आरंभ में हमलोगों के साथ प्रेमभाव से ही रहता था लेकिन जैसे-जैसे भैया की लोकप्रियता हस्तिनापुर में बढ़ने लगी, उसके मन में स्पर्धा का उदय हुआ जिसने अल्पकाल में ही ईर्ष्या का रूप ग्रहण कर लिया। परिणामस्वरूप उसके मन में पापाचार अंकुरित हो गए और एक दिन उसने भीम भैया को विष देकर मारने का प्रयत्न किया। यह ईश्वर की ही महिमा थी जो विषधरों ने विषपान किए भीम भैया के जीवन की रक्षा की। दुर्योधन के इस षडयंत्र का भेद राजभवन में सबसे पहले महात्मा विदुर ने प्राप्त किया। उन्होंने हम सबको दुर्योधन और शकुनि से सतर्क रहने के निर्देश दिए।

पितामह भीष्म हमलोगों की शिक्षा के विषय में कुछ ज्यादा ही चिन्ता करते। हमलोगों ने प्रारंभिक शिक्षा कृपाचार्य से प्राप्त की। कुछ ही दिनों के पश्चात हम सबका साक्षात्कार महान गुरु द्रोणाचार्य से हुआ। उन्होंने हमलोगों की गेंद जो कुंए में गिर गई थी, सींकों के बाणों के सहारे निकालकर हम लोगों को चकित कर दिया था। संपूर्ण प्रसंग जब पितामह के संज्ञान में आया, तो उन्होंने द्रोणाचार्य को निमन्त्रित कर हमलोगों की सर्वांग शिक्षा का गुरुतर दायित्व उन्हें सौंप दिया। हमलोग अब नियमित रूप से उनसे समस्त विद्याओं का ज्ञान प्राप्त करने लगे। मेरे शर-संधान और मेरी एकाग्रता से गुरु द्रोण बहुत ही प्रभावित होने लगे। मुझे भी अनुभूति हो रही थी कि मैं उनके स्नेह का विशिष्ट अधिकारी बनता जा रहा हूँ।

कर्ण से मेरा प्रथम साक्षात्कार गुरु द्रोण के आश्रम में हुआ था। दिन के प्रथम प्रहर अपने पिता अधिरथ के साथ गुरु द्रोण के दर्शनार्थ वह आया था। अधिरथ के हाथों में रेशमी वस्त्रों में लिपटी महाराज धृतराष्ट्र की एक राजाज्ञा थी जिसे उसने अत्यन्त सम्मानपूर्वक गुरुवर द्रोण को अर्पित की। गुरु द्रोण ने उसे ग्रहण किया और पढ़ा। महाराज धृतराष्ट्र ने कर्ण को भी राजकुमारों के साथ ही संपूर्ण विद्याओं का ज्ञान देने का शासकीय आदेश किया था। गुरु द्रोण का मुखमंडल एक बार क्रोध से आरक्त हुआ लेकिन दूसरे ही पल उन्होंने अपने उपर नियंत्रण स्थापित किया और कर्ण को अपने शिष्य के रूप में ग्रहण कर लिया।

 

One Response to “कहो कौन्तेय-४”

  1. Prof. Deenabandhu Pandey

    1. ‘कहो कौन्तेय’ को पाठकों की सुविधा के लिए साथ में कोष्ठक में (महाभारत पर आधारित अर्जुन के मुख से आत्मकथात्मक उपन्यास) भी लिखें तो अच्छा रहेगा।
    2. ‘कहो कौन्तेय’ का जो भी अंश ‘प्रवक्ता’ में प्रकाषित हो उसका एक ‘शीर्षक’ दे दिया जाय तो अच्छा रहेगा।

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