लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

कर्ण-युधिष्ठिर युद्ध

महासंग्राम का सत्रहवां दिन। मुस्कुरता हुआ सूर्य आज भी उदित हुआ। अभी तक एक दिन भी धुंध या मेघों ने सूर्य और कुरुक्षेत्र के बीच आने का साहस नहीं किया था। अपनी सेनाओं का उत्साह बढ़ाने के बाद श्रीकृष्ण के साथ मैंने कौरव सेना पर दृष्टि डाली। उत्साह से भरा हुआ कर्ण अपनी सेना की व्यूह रचना कर रहा था। अब व्यूह रचना करने में अधिक कौशल की आवश्यकता नहीं थी। सेना बची ही कितनी थी। ग्यारह अक्षौहिणी सेना के साथ युद्धभूमि में उतरे दुर्योधन के पास अर्द्ध अक्षौहिणी सेना ही रह गई थी। युद्ध के सत्रहवें दिन उसकी तुलना में हमारी सैन्य-शक्ति संख्या बल में दूनी थी। इतनी छोटी संख्या से किसी अभेद्य व्यूह की रचना नहीं की जा सकती थी। अतः कर्ण ने सुरक्षात्मक व्यूह की रचना की – सूर्यबिंब के समान मण्डलाकार।

श्रीकृष्ण और मुझसे परामर्श कर हमारे सेनापति धृष्टद्युम्न ने यमराज के वाहन महिष के आकार में आक्रामक व्यूह की रचना की। मैंने अपनी सेना के अग्रभाग में मोर्चा संभाला और कर्ण ने अपनी सेना का।

दोनों सेनाओं का सिंहावलोकन करने के पश्चात महाराज युधिष्ठिर ने सत्रहवें दिन के लिए व्यवस्था दी –

“आज के युद्ध में अर्जुन कर्ण के साथ, भीमसेन दुर्योधन के साथ, नकुल कर्ण-पुत्र वृषसेन के साथ और सहदेव शकुनि के साथ युद्ध करेंगे। शतानीक का दुशासन से, सात्यकि का कृतवर्मा से, धृष्टद्युम्न का अश्वत्थामा से तथा मेरा कृपाचार्य से युद्ध होगा। शिखण्डी सभी द्रौपदी-पुत्रों के साथ धृतराष्ट्र के बचे हुए पुत्रों से युद्ध करेगा। आज का लक्ष्य होगा – कर्ण समेत कौरव पक्ष के प्रधान महारथियों का व्यापक संहार। युद्ध के प्रथम दिवस शत्रु जितना ही सशक्त था, आज उतना ही शक्तिहीन है। निर्णायक प्रहार करने का आज सबसे उपयुक्त दिन है। अतः सभी महारथी अपने-अपने अभूतपूर्व पराक्रम से इस महायुद्ध को आज ही समाप्त करने का प्रयास करें।”

सभी महारथियों ने “ऐसा ही होगा” कहकर उनकी आज्ञा उत्साहपूर्वक स्वीकार की।

रथारूढ़ होकर श्रीकृष्ण ने अपने शुभ्र पांचजन्य शंख से युद्ध प्रेरक रोमहर्षक ध्वनि निकाल युद्ध का बिगुक फूंक ही दिया। मेरे देवदत्त शंख के उद्‌घोष के उत्तर में कर्ण ने भी भीषण शंखध्वनि की।

मैं कर्ण के आक्रमण की प्रतीक्षा कर रहा था। लेकिन वह मुझसे नहीं भिड़ा। उसने मुझे अपनी दाईं ओर छोड़ते हुए, अश्व, गज और पदाति तीनों दलों से युक्त हमारी अग्रवर्ती सेना में देखते-ही-देखते सेंध लगा दी। वह हमारी सेना में बेरोकटोक घुसता जा रहा था। हमारे सेनापति महारथी धृष्टद्युम्न ने शीघ्रता से आगे आकर उसका वेग रोका।

धृष्टद्युम्न की सहायता के लिए मैं उसके समीप पहुंचना चाह रहा था कि बचे हुए संशप्तकों की आत्मघाती टुकड़ी ने सामने आकर पुनः मुझे युद्ध की चुनौती दी। मैंने कल समस्त संशप्तकों का संहार कर दिया था, आज यह नई टुकड़ी कहां से आ गई, समझ से परे था। श्रीकृष्ण ने बताया कि यह उनकी अन्तिम सुरक्षित सेना थी। मुझे अविलंब उनका संहार करने का निर्देश दे मेरा रथ उनके सामने ले गए। एक निश्चित योजना के अन्तर्गत संशप्तक वीर युद्ध करते हुए मुझे मुख्य युद्धभूमि से दूर खींच ले गए। युद्धभूमि में सबकुछ अपनी योजना के अनुसार घटित नहीं होता। आज मुझे सर्वप्रथम कर्ण से भिड़ना था, मैं संशप्तकों से जूझ रहा था। धृष्टद्युम्न को अश्वत्थामा से दो-दो हाथ करने थे, वह कर्ण के सामने था। वह पूरी वीरता और साहस के साथ युद्ध कर रहा था, फिर भी कर्ण के सम्मुख टिक नहीं पाया। उसके सामने ही कर्ण ने भानुदेव, चित्रसेन, सेनबिन्दु, तपन तथा शूरसेन – इन पांच पांचाल वीरों का वध कर दिया। भीमसेन ने स्वयं कर्ण के सामने आकर धृष्टद्युम्न की सहायता की। आते ही अपने प्रचण्ड आक्रमण से कौरव सेना को भयभीत कर डाला, कर्ण की उपस्थिति में ही उसके पुत्र भानुसेन का वध कर दिया। इस प्रकार भीमसेन ने घटोत्कच की मृत्यु का प्रतिशोध ले लिया। कर्ण अपने पुत्र का सिर गोद में लेकर अश्रु-वर्षा कर रहा था। भीम ने उसपर प्रहार नहीं किया। वे समुद्र के ज्वार की भांति शत्रु सेना को ध्वस्त कर आगे बढ़ने लगे।

भ्राता की मृत्यु से अप्रभावित वृषसेन सात्यकि से घनघोर युद्ध में जूझ रहा था। सात्यकि ने उसे तरह-तरह से पीड़ित किया। उसकी जीवन लीला समाप्त करने के लिए तीन अचूक वेगवान प्राणघातक सायकों से उसके वक्षस्थल को बींध डाला। मूर्च्छित वृषसेन रथ में कटे पेड़ की भांति गिर पड़ा। अत्यन्त शीघ्रता से दुशासन उसे युद्धभूमि से बाहर ले गया।

पुत्र वियोग के दारुण शोक से उबरकर कर्ण ने दूने वेग से हमारी सेना पर धावा बोल दिया। वह हमारे अग्रवर्ती दलों को तितर-बितर करता हुआ पुनः हमारी सेना में घुस गया।

उसके दक्षतापूर्ण शस्त्र संचालन, चपल बाण-वर्षा और चीते सी फूर्ती के आगे कोई टिक नहीं पा रहा था। वह धृष्टद्युम्न, भीमसेन, सात्यकि, नकुल, सहदेव, शिखण्डी एवं द्रौपदी के पुत्रों की व्युह-रचना को छिन्न-भिन्न करता हुआ हमारी सेना में स्वछन्द विचरण करने लगा। कर्ण के हाथों अपनी सेना की यह दुर्दशा भला युधिष्ठिर कैसे देख सकते थे? क्षत्रिय धर्म की पुकार थी कि वे कर्ण के साथ युद्ध करें। उन्होंने वीरतापूर्वक कर्ण का सामना किया। घमासान युद्ध में आसमान बाणों से घिर गया। दोनों ने एक ही गुरु से शिक्षा पाई थी। शस्त्रों के प्रहार और काट एक साथ हो रहे थे। धर्मराज ने युद्ध में एक बार पुनः सबकुछ दांव पर लगा दिया था। कर्ण पर विजय पाना असंभव था और पराजय का अर्थ था – मृत्यु। उनकी मृत्यु का अर्थ था, युद्ध की समाप्ति और हमलोगों की निर्णायक पराजय। शायद युधिष्ठिर इस तथ्य से अवगत थे। उन्होंने समय नष्ट न करते हुए, निर्णायक दांव खेला – पर्वतों को भी विदीर्ण करने वाला, आपात स्थिति मे ही प्रयुक्त होने वाला ‘यमदण्ड’ बाण मन्त्रोच्चार के साथ, पूरी शक्ति लगा कर्ण पर छोड़ा। बाण कर्ण की बाईं कोख में धंसा और परिणाम सामने था – मूर्च्छित कर्ण रथ के पार्श्व भाग में शव की भांति गिर पड़ा। कर्ण को परलोक पहुंचाने के लिए अब सिर्फ एक ही बाण की आवश्यकता थी, लेकिन युधिष्ठिर ने मेरी प्रतिज्ञा का स्मरण कर यह कार्य तत्क्षण स्थगित कर दिया।

युधिष्ठिर आगामी योजना पर विचार कर ही रहे थे कि कर्ण पुनः चैतन्य हो उठा। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस मिट्टी का बना था। अभी वे संभलते कि कर्ण ने प्रचण्ड बाण-वर्षा कर पूरे रथ को आच्छादित कर दिया। धनुष की प्रत्यंचा, तूणीर, रथ की ध्वजा, सारथि सहित रथ पलक झपकते टुकड़े-टुकड़े हो गया। युधिष्ठिर के पास दूसरे रथ पर बैठकर पलायन करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं बचा। कर्ण ने उनके रथ को आगे से घेरकर बाण-वर्षा रोक कटुवचनों की बौछार कर दी –

“युधिष्ठिर! जिसका उच्चकुल में जन्म हुआ है, जो क्षात्र धर्म में स्थित है, वह भयभीत होकर प्राण बचाने के लिए युद्धक्षेत्र से कैसे भाग सकता है? मेरा तो ऐसा विश्वास है कि तुम क्षत्रिय धर्म के पालन में निपुण नहीं हो। तुम सदा ब्राह्मणोचित स्वाध्याय और यज्ञों में ही लगे रहते हो। तुम्हें युद्ध करना शोभा नहीं देता, इसलिए आज मैं तुम्हें प्राणदान दे रहा हूं। मेरा यह दान सदैव याद रखना। कुन्तीनन्दन! आज के बाद युद्ध में न आना और शूरवीरों का सामना भी न करना। ”

पत्नी और शत्रु द्वारा किया गया सार्वजनिक अपमान असह्य होता है। निःशस्त्र युधिष्ठिर को यह भी सहना पड़ा। कर्ण की जिह्वा उसके बाणों से कम तीक्ष्ण नहीं थी। भीम, सात्यकि, अभिमन्यु और स्वयं युधिष्ठिर ने कुछ ही क्षण पूर्व उसे परास्त किया था लेकिन वाक्‌बाणों से उसे पीड़ित नहीं किया था। पर कर्ण तनिक सा अवसर प्राप्त होने पर व्यंग्य बाणों का बौछार करना नहीं भूलता था।

घायल युधिष्ठिर शारीरिक और मानसिक, दोनों यंत्रणाओं के साथ अपने शिविर में लौट आए। चिकित्सकों ने घाव पर औषधि लेप कर दिया।

क्रमशः

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