मनुष्य जीवन में स्वाध्याय करना उन्नति के लिए आवश्यक है


मनमोहन कुमार आर्य

मनुष्य का जन्म अपनी आत्मा व संसार के रचयिता परमेश्वर को जानने, ईश्वर की उपासना करने, सद्कर्म अर्थात् धर्म करने सहित ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिये हुआ है। मनुष्य को अपने कर्तव्यों का बोध अपने माता-पिता व आचार्यों सहित ईश्वरीय ज्ञान वेद व ऋषियों के ग्रन्थों से होता है। सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर ने अमैथुनी सृष्टि अर्थात् बिना माता-पिता के ऋषियों व स्त्री-पुरुषों को उत्पन्न करके उनके कर्तव्य व अकर्तव्य सहित भाषा का बोध कराने के लिये चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। यही ज्ञान विगत 1.96 अरब वर्षों से चला आ रहा है। इसके सत्य अर्थों को पढ़कर ही ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति आदि सभी विषयों का यथावत् ज्ञान होता है। हमारे ऋषिमुनि और सभी पूर्वज वेदानुयायी थे। संसार में ईसाई, मुसलमान, जैन व बौद्ध आदि जितने भी मत-मतान्तर हैं उनके सभी पूर्वज भी वैदिक धर्मी थे। इस धारणा का तर्कपूर्ण उत्तर यह है कि संसार में प्रचलित सभी मतों का प्रचलन विगत लगभग 2500 वर्षों में हुआ है जबकि वेद मत सृष्टि के आरम्भ काल से, जिसे 1.96 अरब वर्ष हो चुके हैं, प्रचलन में है। वेदों पर ऋषि दयानन्द और अनेक आर्य विद्वानों के भाष्य व टीकायें उपलब्ध हैं जिनमें वेद मन्त्रों के सत्य अर्थ दिये गये हैं। इन्हें पढ़कर ज्ञात होता है कि वेद की सभी बातें, शिक्षायें, मान्यतायें व सिद्धान्त सत्य हैं तथा आधुनिक ज्ञान व विज्ञान के अनुकूल हैं। सभी मतमतान्तरों के ग्रन्थों में केवल वेद ही ऐसा ग्रन्थ है जो ईश्वरीय ज्ञान है जबकि अन्य सभी ग्रन्थ अल्पज्ञ मनुष्यों की कृतियां हैं। सभी वेदेतर मतों में विद्याविद्या वा सत्यासत्य युक्त वचन पाये जाते हैं। उनका ज्ञान भी एकांगी एवं अनेक विषयों में असत्य व ज्ञान-विज्ञान विरुद्ध मान्यताओं का प्रतिपादन करता है जबकि वेद में सबसे सूक्ष्म विषय ईश्वर के स्वरूप व सत्ता का यथार्थ एवं विस्तृत ज्ञान उपलब्ध है जिसकी सहायता से ईश्वर की उपासना व भक्ति आदि कर मनुष्य ईश्वर व जीवात्मा सहित इस सृष्टि के अनेक गुप्त व विलुप्त रहस्यों का साक्षात्कार कर सकता है। अन्य सभी विषयों का ज्ञान भी वेदों में है। वेदों के बारे में ऋषियों की मान्यता है कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। मनुष्य के जीवन का प्रमुख लक्ष्य ज्ञान प्राप्ति कर ईश्वरोपासना करना व सद्कर्मों को करके देश व समाज का हित व उपकार करना है। इस कर्तव्य की पूर्ति में वेदाध्ययन एवं नित्य प्रति वेद एवं ऋषियों के ग्रन्थों का स्वाध्याय करना आवश्यक एवं अपरिहार्य है। बिना ऐसा किये मनुष्य न तो ईश्वर व आत्मा को जान सकता है और न ही ईश्वर के ध्यान व उपासना में प्रवृत्त होकर उपासना से होने वाले लाभों को ही प्राप्त कर सकता है।

                मनुष्य का आत्मा सत्, चित्त तथा अल्पज्ञ है। यह अनादि, सनातन, अनुत्पन्न, अविनाशी, नित्य एव अमर है। आत्मा में ज्ञान प्राप्ति और कर्म करने की क्षमता स्वभावगत है। यह जन्म व मरण धर्मा है तथा मनुष्य-योनि उभय योनि है जिसमें मनुष्य वर्तमान एवं भविष्य के जीवन को संवारने के लिये नये कर्मों को करता है और इसके साथ ही पूर्वजन्म के शुभ व अशुभ कर्मो के फलो को भोगता भी है। मनुष्येतर अन्य सभी योनियां भोग योनियां हैं। अन्य योनियों में जीवों को सीमित व कामचलाऊ बुद्धि प्राप्त हुई है। वह मनुष्य की तरह से चिन्तन व मनन तथा सत्यासत्य का निर्णय नहीं कर सकते। वह स्वाध्याय भी नहीं कर सकते। हां, मनुष्यों द्वारा सिखाये जाने पर कुछ सीख कर उसे दोहरा सकते हैं जैसा कि हम सर्कस आदि में देखते हैं। अतः मनुष्य को मनुष्य जीवन का लाभ उठाकर ज्ञान प्राप्ति कर सद्कर्मों यथा ईश्वरोपासना, यज्ञादि कर्म, दान व परोपकार आदि को करना चाहिये जिससे उनका यह जीवन सुखी हो तथा परजन्म में सुख व मोक्ष की प्राप्ति हो सके। मनुष्य जीवन की सर्वांगीण उन्नति सहित अन्य सभी लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये ही हमारे ऋषियों शास्त्रकारों ने स्वाध्याय का विधान किया है। अविद्यायुक्त ग्रन्थों को पढ़कर मनुष्य भ्रमित होता है। उसे विवेक नहीं हो पाता। इससे उसका जीवन व आत्मा यथार्थ ज्ञान को प्राप्त नहीं कर पाते हैं। यदि हमारे ऋषि दयानन्द जी व अन्य महापुरुष भी अन्य मतों में जन्म लिये होते और वह वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन न करते तो वह भी आज के मत-पन्थ के अनुयायियों के समान ही होते। वेदों व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन कर ही वह पूर्ण पुरुष व ऋषि एवं विद्वान आदि बने जिनके मार्ग पर चल कर हम व सभी वेदभक्त ज्ञान लाभ सहित कर्तव्य बोध को प्राप्त हुए हैं। अतः सभी मतों के अनुयायियों सहित मनुष्यमात्र को वेद एवं वैदिक साहित्य का अध्ययन अवश्यमेव करना चाहिये। यदि करेंगे तो लाभान्वित होंगे और नहीं करेंगे तो धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति में कृतकार्य नहीं हो सकेंगे।

                स्वाध्याय के लिये श्रेष्ठ ग्रन्थों में वेद के अतिरिक्त 11 उपनिषद, 6 दर्शन, मनुस्मृति, ऋषि दयानन्द कृत सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थें का महत्वपूर्ण स्थान है। ऐसे अनेक ग्रन्थ और हैं जिनका अध्ययन करने से आत्मा की उन्नति में चार चांद लगते हैं। इनकी प्राप्ति भी वर्तमान समय में सुगम है। वह बच्चे व युवा धन्य हैं जो गुरुकुलीय शिक्षा से पाणिनीमुनि कृत शिक्षा, आर्ष व्याकरण, निरुक्त आदि ग्रन्थों का अध्ययन किये हुए हैं। उनके लिये वेदों सहित उपनिषद, दर्शन व मनुस्मृति एवं ऋषियों के अन्य प्राचीन ग्रन्थों व उन पर ऋषियों की टीकाओं को पढ़ना अधिक सरल, सहायक व उपयोगी होता है। ऐसा न होने पर भी हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं के जानकर भी लोग इन सभी ग्रन्थों को हिन्दी आदि भाषाओं में पढ़कर लगभग संस्कृत के विद्वानों के समान ही लाभ उठा सकते हैं। अतः युवावस्था से ही इन सब ग्रन्थों का अध्ययन आरम्भ कर देना चाहिये। इसके साथ ही सभी को आर्यसमाज के सत्संगों में भी जाना चाहिये जहां प्रत्येक रविवार को सामूहिक वृहद यज्ञ होता है और वैदिक विद्वान प्रवचनों के लिये आते हैं। आर्यसमाज के सत्संग में यज्ञ करने व विद्वानों के प्रवचनों को सुनने से भी अनेक भ्रम दूर होने व आध्यात्मिक ज्ञान में वृद्धि सहित विद्वानों के संगतिकरण से जीवन को सन्मार्ग में बढ़ाने में सहायता मिलती है।

                ऋषि दयानन्द एक जिज्ञासु से ऋषि बने, इसमें उनके स्वाध्याय का मुख्य योगदान कहा जा सकता है। वह ईश्वर को जानने तथा मृत्यु पर विजय पाने के लिये घर से निकले थे। उन्होंने पौराणिक दृष्टि से तीर्थ व धर्म-स्थान माने जाने वाले स्थानों पर जाकर साधु-महात्माओं की संगति की और उनसे अपने प्रश्नों के उत्तर सहित विविध विषयों पर ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास किया था। वह अनेक योगियों के सम्पर्क में भी आये और उनसे योग विद्या सीखी एवं उसका अभ्यास किया। वह सफल योगी बने और कई-कई घण्टों की समाधि लगाने में सफल हुए। उन्होंने देश का भ्रमण किया और जहां से उन्हें जो भी ग्रन्थ मिलता था उसे वह पढ़ते थे। हजारों ग्रन्थों को उन्होंने पढ़ा जिसमें लगभग तीन हजार ऐसे ग्रन्थ थे जिनको उन्होंने प्रमा कोटि का स्वीकार किया। इस पर भी उनकी सन्तुष्टि नहीं हुई और उन्होंने अधिक विद्या को प्राप्त करने का प्रयत्न किया। इसकी पूर्ति उन्हें मथुरा में दण्डी स्वामी विरजानन्द सरस्वती जी से आर्ष व्याकरण सहित शास्त्रों की चर्चा व शंका समाधान से हुई। हमारा अनुमान है कि कोई मनुष्य, योगी व ऋषि जितना ज्ञान अर्जित कर सकता है, वह सब ऋषि दयानन्द जी ने किया था। इससे अधिक आध्यात्म व धर्म विषयक ज्ञान की हम किसी मनुष्य व ऋषि से अपेक्षा नहीं कर सकते। वह पहले ऐसे योगी व ऋषि हुए हैं जिन्होंने अपना अधिक से अधिक ज्ञान देश, समाज व साधारण मनुष्यों के ज्ञानार्जन के लिये मौखिक प्रवचनों सहित लेखबद्ध कर उपलब्ध कराया है। अतः स्वाध्याय का भी स्वामी दयानन्द जी के जीवन में महत्वपूर्ण येगदान था, यह उनके जीवन पर दृष्टि डालने से विदित होता है। उन्होंने ईश्वर का जीवन में अनेक बार अथवा समाधि में सफलता मिलने पर शेष जीवन निरन्तर साक्षात्कार किया, ऐसा उनके जीवन व कार्यों से अनुभव होता है।

                आज का युग ज्ञान-विज्ञान का युग है। महाभारत युद्ध के बाद लोगों को वेद व वैदिक साहित्य सुलभ नहीं था। छपाई व प्रकाशन आदि की सुविधायें विकसित होने से सभी प्रकार की पुस्तकों का प्रकाशन होने लगा। इससे लोगों को किसी भी विषय का ज्ञान प्राप्त करने में सहायता मिली है। आज इण्टरनेट ने ज्ञान प्राप्ति के साधनों में अभूतपूर्व वृद्धि की है। अतः हमें इन सब साधनों का लाभ उठाते हुए सत्साहित्य का अध्ययन करना चाहिये। इससे हमें अवश्य ज्ञान प्राप्त होगा। स्वाध्याय में प्रवृत्त होने के लिये यदि हम प्रथम सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करते हैं तो इससे हमें प्रायः सभी प्रकार का आवश्यक ज्ञान मिल जाता है अन्य उपयोगी विषयों के ग्रन्थों के अध्ययन की प्रेरणा भी मिलती है। ऋषि दयानन्द  के सभी ग्रन्थ पढ़ने से ज्ञान की वृद्धि होती है। यदि हम केवल ऋषि दयानन्द जी के ग्रन्थों का ही अध्ययन कर लें, और अन्य ग्रन्थों का अध्ययन न भी करें, तो भी हमारा अनुमान है कि इससे हमें बहुत लाभ हो सकता है। ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों के अध्ययन हमारी अविद्या कम दूर हो सकती है। इनके अध्ययन से विद्या का प्रकाश प्राप्त होता है। धर्म-कर्म, गृंहस्थ व सामाजिक जीवन के प्रति हमें अपने कर्तव्यों का बोध होता है। हम अज्ञान व अन्धविश्वासों सहित मिथ्या परम्पराओं से बच जाते हैं। सन्ध्या व यज्ञ से परिचित होकर इनका अनुष्ठान कर भी हम अपनी आत्मा की उन्नति कर सकते हैं। नाना प्रकार के व्यस्नों से भी हम सब बच सकते हैं। वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन करने से मनुष्य विद्वान भी बनता है और महात्मा व धर्मात्मा भी बनता है। वह परिग्रह व लोभ पर पर्याप्त सीमा तक नियंत्रण पा लेता है जिससे समाज को लाभ होता है। स्वाध्यायशील व्यक्ति स्वार्थ के लिये दूसरों को पीड़ा नहीं देता, न किसी पर अन्याय करता है एवं शोषण ही करता है। ऐसे बहुत से लाभ स्वाध्याय व स्वाध्याय से प्राप्त ज्ञान का चिन्तन-मनन करने सहित उस पर आचरण करने से प्राप्त होते हैं। इस चर्चा को यहीं पर विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

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