आर्यसमाज की स्थापना क्यों की गई थी?”


-मनमोहन कुमार आर्य

आर्यसमाज समाज देश का धार्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीयता का पोषक, अविद्या को दूर कर विद्या वृद्धि करने वाला अनेक गुणों से सम्पन्न एक वैश्विक संगठन है। आर्यसमाज की स्थापना इसके संस्थापक वेदों के महान विद्वान ऋषि दयानन्द सरस्वती ने 10 अप्रैल, सन् 1875 को मुम्बई में की थी। इसका उद्देश्य वैदिक सिद्धान्तों व मान्यताओं पर आधारित स्वरूप व सत्ता वाले ईश्वर द्वारा प्रदत्त सत्यधर्म के मूल वेदज्ञान का प्रचार करना रहा है। देश व संसार से अविद्या, अन्धविश्वास, कुरीतियां, सामाजिक असमानता एवं सभी सामाजिक बुराईयों को हटाकर विद्या पर आधारित सत्य मान्यताओं का प्रचार कर देश विदेश के लोगों को ज्ञानी बनाना व देश व समाज के प्रति उनमें कर्तव्यों का बोध कराकर उन भावनाओं को सुदृण करना भी आर्यसमाज का उद्देश्य रहा है। आर्यसमाज ने अपनी स्थापना के विगत 143 वर्षों में उल्लेखनीय व प्रशंसनीय कार्य किया है। पूरे विश्व व सभी मत-मतान्तरों पर आर्यसमाज के सिद्धान्तों व कार्यों का प्रभाव पड़ा है। जो कार्य हुआ है उसका प्रभाव लक्ष्य की तुलना में नगण्य कह सकते हैं परन्तु वह नगण्य नहीं है। कुछ बीज ऐसे होते हैं जो कुछ ही समय में अंकुरित होकर फल देने वाले होते हैं और कुछ पल्लवित होने में बहुत समय लेते हैं। विश्व व देश की कुल आबादी में यदि वेद वा आर्यसमाज के सिद्धान्तों को मानने व उस पर चलने वाले मुनष्यों की गणना करें तो वह नगण्य प्रतीत होती है। परन्तु ऐसा हो सकता है कि आने वाले समय में इस कार्य से विश्व में क्रान्ति उत्पन्न हो और इस किये गये कार्य से महर्षि दयानन्द का स्वप्न साकार हो जाये। ऋषि दयानन्द द्वारा स्थापित आर्यसमाज ने कौन कौन से प्रमुख कार्य किये हैं, इस पर एक दृष्टि डालते हैं।

                महर्षि दयानन्द ने आर्यसमाज स्थापित कर विश्व में वेदों का पुनरुद्धार किया है। ऋषि दयानन्द के समय में लोग वेदों का नाम को तो कुछ-कुछ जानते थे परन्तु उस समय वेद कहीं सुलभ नहीं थे। विद्वत जगत में यहां तक कहा जाता था कि शंकासुर या भस्मासुर वेदों को पाताल लोक में ले गया है। ऋषि दयानन्द ने अपने प्रयत्नों से वेदों की मूल संहिताओं को प्राप्त किया। उन्होंने वेद मन्त्रों के पदच्छेद कर उन पदों के अर्थ सहित पदार्थ प्रस्तुत करके मन्त्रों का भावार्थ संस्कृत आर्यभाषा हिन्दी में किया है। इससे यह लाभ होता है कि देवनागरी हिन्दी जानने वाला एक सामान्य मनुष्य भी वेदों का अध्ययन करने में समर्थ होता है। इससे ब्राह्मणों व पण्डितों का एकाधिकार भी समाप्त हुआ है जो वेदों व उसकी व्यवस्थाओं के नाम पर इसका दुरुपयोग करते थे। हम जैसे लाखों लोग वेदों का अध्ययन कर लाभान्वित हो रहे हैं। महाभारत से लेकर ऋषि दयानन्द के समय तक सामान्य मनुष्य को इस प्रकार की सुविधा नहीं थी। यदि वेदाध्ययन की सुविधा होती तो देश में अविद्या का अन्धकार न फैलता, न ही देश में अन्धविश्वास उत्पन्न होते और न ही देश पराधीन हुआ होता। विश्व में अविद्या के कारण जो मत-मतान्तर उत्पन्न हुए हैं वह भी न होते। महाभारत के बाद से वेद केवल कुछ चुने हुए पण्डितों वा ब्राह्मणों की निजी सम्पदा बने हुए थे जबकि वेदा पर सब मनुष्यों का समान अधिकार था। देश के ब्राह्मण वर्ग ने भी वेदों के अध्ययन को तिलांजलि दे दी थी। वह न तो वेदों का अध्ययन करते थे और न वेदमन्त्रों के यथार्थ अर्थ ही जानते थे, उनका वेदानुसार आचरण करना तो बहुत दूर की बात थी। आर्यसमाज के एक विद्वान पं. भारतेन्द्र नाथ, जो वानप्रस्थी होकर महात्मा वेदभिक्षु जी के नाम से विख्यात हैं, उन्होंने वेदों को हिन्दुओं के घर-घर में पहुंचाने का शुभ संकल्प लिया था। उन्होंने ऋषि दयानन्द और आर्य विद्वानों का वेदों का हिन्दी भाष्य प्रकाशित किया और उसे घर-घर पहुंचाने का प्रयत्न किया। अन्य वैदिक साहित्य का प्रकाशन भी उन्होंने किया है। ऋषि दयानन्द और आर्यसमाज समाज की कृपा से वेदों के सत्य अर्थों से युक्त वेदभाष्य आज सर्वसाधारण को सुलभ हैं। यह ऋषि दयानन्द की देश, समाज और विश्व को बहुत बड़ी देन है। वेदों के प्रचार से लोगों को ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति, कारण व कार्य, का ज्ञान हुआ है और इसी से ईश्वर की सत्य उपासना का ज्ञान व महत्व भी लोगों को हुआ।

                वेद प्रचार का मुख्य प्रयोजन अविद्या के नाश सहित देश व समाज से अज्ञानता पर आधारित अन्धविश्वासों, मिथ्याचरण, मिथ्या सामाजिक परम्पराओं, आडम्बरों तथा समाज को कमजोर करने वाले कार्यकलापों को समाप्त करना था। अन्धविश्वासों के शीर्ष स्थान पर अवतारवाद की मिथ्या अवधारणा, मूर्तिपूजा, फलित ज्योतिष व मृतक श्राद्ध आदि प्रमुख हैं। आर्यसमाज ने इन सब अन्धविश्वासों को तर्क व युक्ति के साथ वेद के प्रमाणों से भी खण्डित किया है। देश की बहुत बड़ी संख्या ने आर्यसमाज की मान्यताओं व सिद्धान्तों को अपनाया है। मूर्तिपूजा को ईश्वर प्राप्ति का साधन माना जाता है जबकि मूर्तिपूजा से यह उद्देश्य पूरा नहीं होता। ईश्वर की पूजा का अर्थ ईश्वर के अस्तित्व व स्वरूप विषयक सत्य ज्ञान को प्राप्त होना एवं उस ज्ञान के अनुरूप ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना करना होता है। इसके लिये सहस्रो वर्ष पूर्व महर्षि पतंजलि ने योग दर्शन का प्रणयन किया था। उपासना का यही प्रमुख ग्रन्थ है और योगदर्शन वर्णित अष्टांग योग यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधि से ही मनुष्य ज्ञानवान होकर ईश्वर को प्राप्त कर सकता है। इसकी अन्य विधि नहीं है। उपासना में स्वाध्याय व अध्ययन, सच्चे गुरुओं व विद्वानों की संगति, यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि का सेवन तथा प्रत्याहार-धारणा व ध्यान का अभ्यास आवश्यक होता है। आर्यसमाज जड़ मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा के सिद्धान्त व विधि को भी स्वीकार नहीं करता। यदि मन्त्रोच्चार से जड़-मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा हो सकती है तो मृतक शरीर में तो उन्हीं मन्त्रों से मृतक शरीर को जीवित हो जाना चाहिये। ऐसा नहीं होता, अतः प्राण प्रतिष्ठा जिस उद्देश्य से की जाती है वह पूरा होता है, यह स्वीकार नहीं किया जा सकता। हम समझते हैं कि जो लोग इन बातों को करते हैं वह कभी यह विचार नहीं करते कि क्या उनका कार्य सत्य व उचित है या नहीं? आर्यसमाज ने समाज से अन्धविश्वासों को दूर कर सामाजिक व्यवस्थाओं को भी सत्य व ज्ञान के आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया है। आर्यसमाज ने समाज से बाल विवाह व बेमेल विवाह का अन्त करने में सफलता प्राप्त की है। कम आयु की विधवाओं के पुनर्विवाह की वकालत व प्रचार भी आर्यसमाज ने अपने आरम्भ काल से ही किया है। विवाह ब्रह्मचर्ययुक्त स्वस्थ युवक व युवती का पूर्ण युवावस्था में गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार ही होना चाहिये, इसका लिखित व मौखिक प्रचार भी आर्यसमाज ने किया है। विवाह में जन्मना जाति का परित्याग कर वैदिक धर्म के ही अनुयायियों में गुण-कर्म-स्वभाव के अनुसार विवाह-सम्बन्ध देश, समाज व भावी पति-पत्नी व उनके परिवारों के हित में होता है। इसको आज सारा संसार स्वीकार करता है।

                आर्यसमाज ने गुण-कर्म-स्वभाव पर आधारित वैदिक वर्ण व्यवस्था का भी ज्ञान, तर्क व युक्तियों के आधार पर प्रचार किया। वर्तमान समय में जो सरकारी नियम आदि बने हैं उसमें इसका कुछ कुछ रूप देखा जा सकता है। हाईस्कूल पास सब जातियों के बच्चों का स्तर सरकारी नियमों में समान माना जाता है। यदि कहीं सरकारी पद हाईस्कूल के बच्चों से भरना होता है तो वहां जन्मना जाति का महत्व न होकर अभ्यर्थी की योग्यता अर्थात् गुण-कर्म व स्वभाव को ही देखा जाता है। इसी प्रकार सर्वत्र नियुक्तियां होती हैं। आर्यसमाज की बात को लोगों ने माना नहीं अन्यथा अब तक हिन्दू समाज से जन्मना जातिवाद समाप्त हो जाना चाहिये था। इसके सुपरिणामों की हम कल्पना ही कर सकते हैं। जन्मना जातिवाद ने देश समाज को बहुत कमजोर किया है और अनेक समस्याओं को जन्म भी दिया है। हिन्दू समाज जितना जल्दी इस व्यवस्था का त्याग कर दे उतना ही अच्छा है, अन्यथा इसके परिणाम बहुत भयंकर रूप से सामने आ रहे हैं और आने वाले दिनों में आयेंगे। हमें उन परिणामों की कल्पना करके भी डर लगता है। आर्यसमाज ने देश व समाज से अशिक्षा को दूर करने के लिये गुरुकल व स्कूलों का संचालन कर भी देश व समाज को सुदृण करने में महत्वपूर्ण योगदान किया है। आर्यसमाज का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य शुद्धि का कार्य है। स्वामी श्रद्धानन्द जी, पं. लेखराम जी तथा पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी आदि ने इस कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसी का

रण हमें स्वामी श्रद्धानन्द जी और पं. लेखरामजी सहित महाशय राजपाल जी आदि का बलिदान देना पड़ा है। विधर्मियों ने इन महापुरुषों से द्वेष किया और इनकी हत्या कर दी। वह लोग स्वयं तो हिन्दुओं को मनुष्य भी नहीं मानते और इनका धर्मान्तरण करते हैं परन्तु जब हमारे विद्वान व नेता अपने बिछुड़े हुए भाईयों की उन्नति के लिए उन्हें अपने साथ मिलाते हैं, तो इसका विरोध किया जाता है। यह संविधान प्रदत्त शुद्धि के अधिकारों के प्रति उनके दोहरे मापदण्ड हैं।

                हमने आर्यसमाज की स्थापना के उद्देश्य व उसके कुछ थोड़े से कार्यों का उल्लेख यहां नमूने के रूप में किया है। आर्यसमाज का वेदाद्धार, शिक्षा, अन्धविश्वास उन्मूलन, समाज सुधार, देश की आजादी, देश की सर्वविध उन्नति तथा स्त्री-शूद्रों को वेदाधिकार आदि में सर्वाधिक योगदान है। देश का हित आर्यसमाज की विचारधारा को अपनाकर ही हो सकता है। सारा संसार ऋषि दयानन्द का उनके कार्यों के लिये ऋणी हैं। आज के सभी लोग भले ही उनके ऋण को न समझे, परन्तु भविष्य में ज्ञान-विज्ञान पर आधारित ऐसे समाज जिसमें अन्धविश्वासों की प्रतिष्ठा नहीं होगी, तब ऋषि दयानन्द को ही सबसे बड़ा महापुरुष व महामानव माना जायेगा, ऐसा हमारा अनुमान है। ओ३म् शम्।

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