लेखक परिचय

अशोक गौतम

अशोक गौतम

जाने-माने साहित्‍यकार व व्‍यंगकार। 24 जून 1961 को हिमाचल प्रदेश के सोलन जिला की तहसील कसौली के गाँव गाड में जन्म। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से भाषा संकाय में पीएच.डी की उपाधि। देश के सुप्रतिष्ठित दैनिक समाचर-पत्रों,पत्रिकाओं और वेब-पत्रिकाओं निरंतर लेखन। सम्‍पर्क: गौतम निवास,अप्पर सेरी रोड,नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212, हिमाचल प्रदेश

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Illustration-of-a-snake-बाजार द्वारा अपने ठगे जाने की अनकही प्रसन्नता के चलते गुनगुनाता- भुनभुनाता हुआ घर की ओर आ रहा था कि घर की ओर जा रहा था राम जाने। बाजार द्वारा ठगे जाने के बाद आदमी होश खो बैठता है और मदहोशी में घर की ओर अकसर लौटता है मंद मंद मुस्कुराते कि उसे बाजार से ठगे आते हुए कोई देख भी रहा है कि नहीं।
घर आने या जाने के बीच रास्ते में ही रहा होगा कि अचानक सामने से सांप सा आता दिखाई दिया तो पलभर के लिए तो बाजार का सारा नशा हवा हो गया। जब ध्यान से देखा तो असल में वह सांप ही था असली वाला। बड़े दिनों बाद सांप की ही जाति का सांप देखा था। अपनी जाति के सांप तो हर कदम पर गले मिलते ही रहते हैं। उसे देख कुछ देर रूका और चैन की सांप ली कि चलो, असली सांप अभी भी इस दुनिया में शेष हैं।
फिर पता नहीं क्यों उससे बात करने का मन हुआ सो उसे रूकने को यों ही आवाज दे डाली,‘ मित्र! रूको! बड़े दिनों बाद मिले हो। कैसे हो?’ सांप ने तनिक पीछे मुडकर देखा तो चैंका। उसे लगा, है तो बंदा अपनी जात का नहीं, तो फिर रूकने को, बात करने को क्यों न्योता दे रहा है?? इस बंदे के मन में खोट तो नहीं होगा? बिना खोट के कोई आज किसीसे बात भी नहीं करता। दुआ- सलाम तो दूर की बात है।
मेरे कहने के बाद पहले तो सांप बहुत तेज भागा पर फिर अचानक रूक गया। पीछे मुड़कर उसने डरी- सहमी नजरों से देखा तो मैंने उसे उसे कोई हानि न पहुंचाने की कसम दोहराई तो वह विश्वास न करते हुए भी लगा मुझ पर विश्वास करने की सोचने लगा है। क्योंकि कसमें केवल आजकल खाने की चीज हो गई हैं। निभाने की नहीं। शुक्र भगवान तेरा! किसीने तो आज के आदमी पर विश्वास किया।
वह रूका पर मुझसे एक दूरी बनाए रखा । इतनी की चाहकर भी मैं उसे कोई नुकसान न पहुंचा सकूं। जैसे वह जानता हो कि सतर्कता में ही सुरक्षा होती है।
‘और कैसे हो?बड़े महीनों बाद दिखे? कहीं बाहर चले गए थे क्या?’ मैंने उसे अपनेपन का अहसास दिलाना चाह उससे बतियाना शुरू किया पर वह दूर से ही बोला,‘ पहले वचन दो, मारोगे नहीं?’ मैं परेशान! यार ये सांप बोल क्या रहा है? ये तो मुझसे ऐसे डर रहा है जैसे गांधी दर्शन को इसने अपने जीवन में पूरा का पूरा ढाल लिया हो। अरे भैये? जीवन अलग होता है और दर्शन अलग।दोनेां को एक साथ लेकर जिाओगे तो विषैले होने के बाद भी सज्जन को देख डरोगे ही।
‘ अरे ये बात तो मुझे तुमसे कहनी चाहिए थी। और तुम हो कि…..’
‘ क्या करे भाई साहब! अब आप जैसों से डर ही लगता है,’ कह वह मुझसे बातें भी करता रहा और आक्रमण होने का आभास होते ही सुरक्षा का भी इंतजाम करता रहा।
‘ हमसे? हद है यार! गीदड़, सूअर तो हमें आए दिन बदनाम करते ही रहते हैं अब तुम भी?? जहर अपने पास रखे हो और डर हमारे से रहे हो?’ मैंने सांप को सांप की औकात बताने की कोशिश की तो वह दोनों हाथ जोडे़ बोला,‘ बंधु! माफ करना जो सच बोल रहा होऊं। क्या है न कि अब तुमसे नेवले से भी अधिक डर लगता है।’
‘ क्या ? क्या हम तुमसे भी जहरीले हो गए हैं? मैंने गुस्साते कहा तो वह सादर बोला,‘ हां बंधु! हममें तो दो प्रतिशत ही जहरीले होते हैं पर तुममे तो दो प्रतिशत भी बिना विष के निकलें तो …. विश्वास नहीं तो किसी लैब में अपने विष को टेस्ट करवा लीजिए। हाथ कंगन को आरसी क्या?’
‘मतलब?’ मेरे हाथ से बाजार गिरते- गिरते बचा।
‘बुरा तो नहीं मानोगे?’
‘ नहीं! अब बुरा मानने को बचा ही क्या है? अब सुनने को शेष बचा ही क्या है। मन में हमारे बारे में और भी भड़ास हो तो लगे हाथ विपक्षियों की तरह निकाल ही डालो। फिर पता नहीं कब मुलाकात हो!’
‘हमारे सौ में से एक सांप के काटने पर जीव की मौत होती है और तुम्हारे एक के फुफकारने पर भी सौ जीव मर जाते हैं। हमारे काटे का तो हर अस्पताल में इलाज है पर तुम्हारे काटे को तो छोड़िए, फुफकारे तक का कहीं इलाज नहीं….. बस, इसीलिए माफ करना अग्रज! तुमसे डर रहा था।’ सच कहूं, किसके आगे पहली बार शर्मसार हुआ हूं। शर्मसार भी इतना कि अब सिर उठाने को मन ही नहीं कर रहा।

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