शिव योगी हैं नशेडी नहीं |

शिव
शिव

हाल ही में महाशिवरात्रि का पर्व बीत गया | यानि कि भगवान् आशुतोष का दिन | कई मित्रो के मेसेज आये शिवरात्रि की शुभकामनाये प्रेषित करते हुए | सभी का धन्यवाद सभी को शुभकामनाये | रूद्र आप सबकी रक्षा करे | पर मन उस तरह प्रफुल्लित हुआ जिस तरह एक त्यौहार पर होना चाहिए | कारण है कि जितने भी मेसेज आये उनमे से आधे में भगवान् शिव का वर्णन एक नशेडी की तरह किया गया |

वो महासूर्य अपने धनुष पिनाक की प्रत्यंचा मात्र चढ़ा दे तो अचल पृथ्वी भी कम्पन करने लगती है | उस पराक्रमी का चित्रण आप भांग नशे में चूर रहने वाले आदमी की तरह कर रहे हैं ? जो समस्त लोकों में संहार के देव हैं | जो युद्ध में स्वयं रूद्र और कालों में स्वयं महाकाल हैं | जो सत्य हैं, सनातन है जो शाश्वत हैं, शिव हैं | उन्हें आप धतूरा खाने वाला बता रहे हो ? कभी कुछ लिखने से पहले सोच भी लिया करो मित्रो कि क्या लिख रहे हो और किसके बारे में लिख रहे हो ?

मुझे पता है यहाँ पर भी कुछ मित्र कई धर्मग्रंथो से ससंदर्भ ये प्रमाणित कर सकते हैं कि भगवान् शिव धतूरे या भांग का सेवन करते थे | पर मेरी नजर में ये संभव नहीं है | जो हिंदी को या किसी भी भाषा को थोडा सा भी जानते हैं या जिन्हें साहित्य की थोड़ी सी भी जानकारी है, वो सब ये जानते हैं कि लिखते समय लेखक भाषा को बोझिल होने से बचाने के लिए अलंकारों का प्रयोग करता है | ताकि उसके लिखे की पठनीयता बनी रहे | जैसे किसी कवि ने लिखा

“राम रण मध्य एसो कौतुक करत आज |
बाणन के संग छूटन लाग्ये प्रान दनुजन के ||”

“यानि भगवान् श्री राम आज एसा कमाल का युद्ध कर रहे हैं कि जैसे ही वो इधर से बाण छोड़ते है तो दूसरी तरफ राक्षसों का वध हो जाता है | “ अब अगर आप थोडा सा भी सोचेंगे तो पाएंगे एसा करना बिलकुल भी संभव नहीं है | आसानी से कोई भी ये जान सकता है कि ये अतिशयोक्ति का प्रयोग है श्रीराम की वीरता का वर्णन करने के लिए |

ठीक उसी तरह हम सभी जानते हैं कि शिव महायोगी हैं | कहते हैं कि समाधिस्थ शिव का इस चराचर जगत से कोई सम्बन्ध नहीं रह जाता है | वो समाधि में कुछ इस तरह लीन हो जाते है कि उन्हें खुद के शरीर की भी सुध नहीं रहती है | ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार किसी धतूरा खाए व्यक्ति की हालत हो जाती है | हो सकता है कि उस ज़माने के लेखकों(ऋषि मुनि जो शिक्षा जिन पर शिक्षा के प्रसार का दारोमदार था) ने अपने लेखन में उसी अतिश्योक्ति या रूपक या उत्प्रेक्षा या किसी अन्य अलंकार का प्रयोग अपने शिष्यों को शिव की एकाग्रता को समझाने के लिए किया हो | जरा सी देर के लिए अपने मस्तिष्क के सातों द्वार खोलिए और खुले मन से सोचिये | खुद से पूछिये कि क्या ये संभव नहीं है ? क्या पता आपको इसका जबाब खुद आपके अंतर्मन से मिल जाये |

-अनुज अग्रवाल

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