लेखक परिचय

आर. सिंह

आर. सिंह

बिहार के एक छोटे गांव में करीब सत्तर साल पहले एक साधारण परिवार में जन्मे आर. सिंह जी पढने में बहुत तेज थे अतः इतनी छात्रवृत्ति मिल गयी कि अभियन्ता बनने तक कोई कठिनाई नहीं हुई. नौकरी से अवकाश प्राप्ति के बाद आप दिल्ली के निवासी हैं.

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आर. सिंह 

Clipboard01एक समृद्ध मंदिर में पुजारी की आवश्यकता थी. राजाज्ञा से प्रधान पुजारी को अपने मंदिर के लिए पुजारी के चुनाव की जिम्मेवारी दी गयी थी..ढिंढोरा पिटवा कर दूर दूर तक इस सन्देश को प्रसारित गया था,जिससे अधिक से अधिक लोग इसमे भाग ले सकें.सबको उचित समय पर मंदिर के प्रांगण में पहुचना था.

प्रधान पुजारी मंदिर में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि पुजारी बनने के इच्छुकों का अच्छा खासा समूह मंदिर के प्रांगण में उपस्थित था. सब एक से एक विद्वान नजर आ रहे थे. समय पर उन्होंने आसान ग्रहण किया और सभा को संबोधित करना आरम्भ किया. इतने में देखते क्या हैं कि एक तेजस्वी व्यक्ति ,जिसका पहनावा बहुत साधारण था, प्रांगण में प्रविष्ट हुआ.उसके कपडे भी जगह जगह फटे हुए थे और उसमे कही कही कीचड भी लगा हुआ था..वह अंदर आने में भी झिझक रहा था.उपस्थित सज्जनों के चेहरे पर भी एक व्यंगात्मक मुस्कान झलक रही थी.उनके मन में शायद यह भाव था कि देखो कैसे कैसे लोग इस बड़े मंदिर का पुजारी बनने का ख़्वाब देख रहा है.

प्रधान पुजारी ने उसको आगे बढ़ने का इशारा किया और आगे आने पर पूछा,” आपने आने में देर क्यों कर दी और आपके ये कपडे कैसे फटे?”

उस व्यक्ति ने विनम्रता पूर्वक उत्तर दिया,”क्षमा कीजिए महाराज,.मैं तो घर से समय पर ही निकला था,पर यहाँ से कुछ ही दूरी पर देखा कि एक गर्भवती गाय कीचड में फँसी हुई हैऔर निकल नहीं पा रही है .मैं तो भूल ही गया कि मुझे मंदिर पहुंचना है.मैं उस गाय को कीचड से निकालने में लग गया. जब वह गाय कीचड़ से निकल गयी ,तो मुझे ध्यान आया कि मुझे तो मंदिर पहुचना है.देर भी हो चुकी थी और मेरे कपडे भी कीचड में सन गए थे.जगह जगह फट भी गए थे. पहले तो लगा कि लौट जाऊं,फिर सोचा कि इतनी दूर तक आया हूँ ,तो भगवान के दर्शन भी कर लूँ.इस हालत में मंदिर में आने के लिए आप सबों से फिर क्षमा याचना करता हूँ”

प्रधान पुजारी बोले,”ऐसी कोई बात नहीं.आप भगवान के दर्शन के लिए आ गए,यह अच्छी बात है. अब आप एक बात बताइये. क्या आपको भगवान को भोग लगाने आता है?”

उस व्यक्ति ने उत्तर दिया,”हाँ महाराज,भोग सामने रख कर घंटी बजाकर पर्दा गिराना होता है.इतना तो मैं जानता हूँ?”

“और मन्त्र?” यह प्रधान पुजारी का अगला प्रश्न था.

“हुजूर यह तो मुझे मालूम नहीं कि उस समय मन्त्र भी पढ़ना होता है.”

अब तो लोगों कि हॅंसी फूट पडी..”कैसे कैसे लोग भगवान के दरबार में आ जाते हैं?इस मूर्ख को यह भी ज्ञान नहीं कि भोग लगाते समय मन्त्र भी पढ़ना होता है और चला आया है पुजारी बनने के लिए.”

पुजारी जी ने उत्तर दिया,”कोई बात नहीं.आज से आप इस मंदिर के पुजारी बन गए.रही बात मन्त्र की तो वह मैं सीखा दूंगा.”

लोग भड़क उठे .यह तो उनका घोर अपमान हो रहा था.वे तो प्रधान पुजारी को भी भला बुरा कहने लगे. प्रधान पुजारी ने उन्हें शांत रहने के लिए कहा और बोले,”भगवान ने मुझे सपने में दर्शन दिए थे और कहा था कि पुजारी के पद के लिए किसी इंसान को चुनना.”

वह कहानी तो यहीं ख़त्म हो गयी थी,पर आज मैं सोचता हूँ कि क्या आज भी वही कहानी दुहराने की घड़ी नहीं आ गयी है.

आज भी गाय(राष्ट्र) कीचड(भ्रष्टाचार) में फँसी हुई है. अब जब पुजारी (प्रतिनिधि) चुनने का अवसर आया है तो प्रधान पुजारी (आम जनता) सोच रहा है कि मन्त्र ज्ञान (अनुभव ) जरूरी है या नियत?

2 Responses to “लघुकथा : मंदिर का पुजारी”

  1. protimadatta

    मन्दिर का पुजारी ‘अच्छी व शिक्षा प्रद कहानी है |

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  2. आर. सिंह

    आर. सिंह

    मुझे तो ऐसा नहीं लगता. मैंने प्रेमचंद की कहानी ‘परीक्षा’ पढ़ी है. यह किसी रियासत के दीवान के बूढ़े होने पर नया दीवान नियुक्त करने और उस में हिस्सा लेने आये हुए उम्मीदवारों में से एक की हॉकी खेलते समय चोट लग जाने के बावजूद किसान की गाडी को निकालने में सहायता करने की कहानी है,पर यह लघु कथा बचपन में पढ़ीहुई एक शिक्षा प्रद कहानी का लेखक की अपनी शैली में रूपांतर मात्र है.

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  3. आशुतोष माधव

    यह कथानक प्रेमचंद की कहानी -‘परीक्षा’ पर आधारित है.

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