लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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पहले बना अकबर का मकबरा, बाद में बना घर चिड़िया
डा. राधेश्याम द्विवेदी
विश्व प्रसिद्ध ताज महल के अलावा आगरा मुगल वास्तुशिल्प से बनी उत्कृष्ट कृतियों के लिए भी काफी चर्चित है। इन्हीं में से एक है सिकंदरा स्थित अकबर का मकबरा। उत्तर प्रदेश में आगरा के निकट सिकंदरा स्थित यह मकबरा 119 एकड़ (105 स्क्वायर मीटर) में फैला हुआ है। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल द्वारा स्वच्छता पखवाडा अभियान स्मारकों से 300 मीटर की दूरी को पालिथिन से मुक्त रखने के लिए विशेष स्वच्छता पखवाडा अभियान 16 अप्रैल से 30 अप्रैल 2017 के मध्य चलाया गया है । इस कार्यक्रम के माध्यम से जन जागरूकता का कार्यक्रम भी चलाया गया है ! आगरा मण्डल में तीन विश्व धरोहरों तथा लगभग एक दर्जन राष्ट्रीय स्मारकों पर विशेष स्वच्छता अभियान चलाया गया है। कार्यालयाध्यक्ष अधीक्षण पुरातत्वविद् डा. भुवन विक्रम के कुशल निर्देशन में अधिकारियों और कर्मचारियों ने विभिन्न संस्थाओं व संगठनों के सहयोग से खूब बढ़चढ.कर भाग लिया है। 20 अप्रैल 2017 को प्रातः 9 बजे से इस अद्भुत स्मारक पर विशेष स्वच्छता कार्यक्रम मनाया गया है,इसमें विभाग के कर्मचारियों के अलावा पास के विद्यालयों के बच्चे भी बढ़ चढ़ कर भाग लिया है। 8 साल में बने इस मकबरे का निर्माण कार्य अकबर के द्वारा 1605 में शुरू करवाया गया था और उनके बेटे जहांगीर ने इसके निर्माण को 1613 में पूरा करवाया।मकबरे का निर्माण संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर से किया गया है और इसमें मुस्लिम और हिन्दू वास्तुशिल्प शैली का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। इसमें प्रयुक्त संगमरमर में खूबसूरत नक्काशी की गई है और इसे आभूषणों से सजाया गया है। निर्माण में परिशुद्धता के लिए कम्पास का सहारा लिया गया था। यह ऊंची दीवारों से घिरे मनमोहक बाग के बीच में स्थित है। इस मकबरे की खासियत इसका दरवाजा है, जिसे बुलंद दरवाजा कहा जाता है। दरवाजे से शुरू होकर एक चौड़ा रास्ता मकबरे तक जाता है। यह दरवाजा एक मेहराब पर बना हुआ है और इसमें संगमरमर से बनी चार मीनारें हैं। देखा जाए तो मकबरे से ज्यादा इसका दरवाजा लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
चारबाग उद्यान के केन्द्र में स्थित:-मुगल बादशाह अकबर का मकबरा चारबाग प्रकार के विस्तृत उद्यान के केन्द्र में स्थित है। वर्गाकार योजना का यह मकबरा पाच तल ऊँचा है जिसका प्रत्येकतल क्रमशः छोटा होकर इसे पिरामिडनुमा आकार देता है। प्रथम तल का निर्माण अकबर ने अपने जीवन काल में करवाया था जबकि ऊपरी मंजिलें संभवतः अकबर की मृत्यु के तुरन्त बाद बनवायी गयीं। भूतल पर दक्षिणी भाग के मध्य के अलावा चारों तरफ विहार है। दक्षिणी भाग के मध्य में द्वारमंडप हैं इस द्वारमंडप के नीले आवरण पर सुनहरे अक्षरों में कुरान की आयतें सुन्दर अक्षरों में लिखी हुई हैं। इस द्वार मंडप से एक उतरता हुआ गलियारा अपेक्षाकृत सामान्य तथा सख्त दीवारों वाले स्मारक की ओर जाता है। केवल अकबर की कब्र भवन से चारों ओर से घिरी है तथा यह ईंट तथा चूने के गारे से बनी है। ऊपरी मंजिल को छोड़कर सम्पूर्ण मकबरा लाल बलुआ पत्थर से बना है जबकि ऊपरी मंजिल श्वेत संगमरमर की बनी है। वर्गाकार मंजिलों के चारों तरफ तोरणयुक्त बरामदे तथा छतरियों के समूह लगे हैं। दूसरी मंजिल की छतरियों की छतपिरामिडनुमा संगमरमर से बनी हैं जबकि अन्य के शिखर गुम्बदनुमा हैं। तीसरी तथा चैथी मंजिल के स्तम्भों पर बने मेहराब एक समान रूप से क्रमबद्ध हैं तथा सभी मेहराब स्तम्भों पर बने मेहराब पर टिके हैं। प्रत्येक मेहराब पर बाहर से छतरिया लगी हैं। ऊपरी मंजिल पर वर्गाकार प्रांगण है जो ऊपर से खुला है। केन्द्रीय प्रांगण चारों ओर से पतले मेहराबों से घिरे हुए हैं तथा ये कक्षों में विभाजित हैं इन कक्षों की छत प्रस्तर-विन्यासित है। प्रांगण के मध्य में एक वर्गाकार चबूतरा है। इस चबूतरे के ऊपर संगमरमर की समाधि बनी हुई है। इस समाधि पर अरबी शैली के पुष्प नमूने प्रचुरता से उत्कीर्ण हैं। इस स्मारक का वास्तुशिल्प पारम्परिक मुस्लिम मकबरे के वास्तुशिल्प से भिन्न हैं। इसके वास्तुशिल्पीय योजना में गुम्बद का अभाव है जो अनेक छतरियों के ऊपर संगमरमर के गुम्बद के मुस्लिम मत के अधीन कब्र वास्तुशिल्प का आवश्यक तत्व है।परंपरागत चारबाग नमूने पर आधारित, थोड़े अवनत, इस बाग को चार चतुश्फलकों में बाटा गया है। प्रत्येक चतुश्फलक एक-दूसरे से एक ऊँचे रास्ते से अलग होता है, जिसके बीच में एक छिछली नाली है, जो एक-दूसरे को अलग करती है। यह बाग चारों ओर से एक ऊँचे परकोटे से घिरा है। इस परकोटे के दक्षिणी भाग में अंदर जाने के लिए एक राजसी प्रवेश द्वार है। अन्य दिशाओं में परकोटे में समरूपता दिखाने के लिए छद्म दरवाजे हैं।
चार प्रवेशद्वार:-उत्तरी प्रवेशद्वार अब व्यवहारिक तौर पर नष्ट हो गया है। योजना में उत्तरी तथा दक्षिणी प्रवेश द्वार लगभग समरूप हैं। इनमें विभिन्न आकार के सतमंजिला भवन समूह हैं। ये कमरे (प्रकोष्ठ) विकर्णवत तथा आयताकार गलियारों की सहायता से आपस में जुड़े हैं। इनके केन्द्र में एक बड़ा ढलानयुक्त द्वारमंडप है। द्वारमंडप के ऊपर एक अर्द्ध-गुम्बद है जिसके दोनों तरफ एक के ऊपर एक कुल दो छोटे मेहराबदार आले बने हैं। इनके ऊपर सुन्दर छतरिया हैं। भित्ति-स्तंभ के ऊपर लगी छोटी छतरिया अग्रभाग के बाह्य कोण से जुड़ी हुई हैं। दोनों ही प्रवेशद्वार उत्कृष्ट चित्रकला, जड़ाऊ काम, पच्चीकारी तथा सुन्दर नक्काशी से सजे हुए हैं जिन पर हाथी, मोर, हंस तथा अन्य पक्षी, कमल एवं अन्य पारंपरिक व पुष्प नमूने हैं।
दक्षिणी मुख्य प्रवेशद्वार:-दक्षिणी प्रवेशद्वार जो मुख्य प्रवेशद्वार है, आयताकार तथा दो मंजिला है। इसके पूर्वी तथा पश्चिमी अग्रभाग में तीन खण्ड तथा एक के ऊपर एक दो गहरे आले हैं। उत्तरी तथा दक्षिणी अग्रभाग समरूप हैं। प्रत्येक के केन्द्र में एक विशालकाय फाटक तथा बगल में एक के ऊपर एक, दो मेहराबदार आले हैं। केन्द्रीय भाग चबूतरे के ऊपर उठा हुआ है तथा इसमें दो छतरिया हैं। सम्पूर्ण बाह्य भाग में रंगीन पत्थरों से उत्कृष्ट नक्काशी तथा पच्चीकारी की हुई है। केन्द्रीय मेहराबदार प्रवेशद्वार पर फारसी भाषा में पच्चीकारी की हुई है। प्रवेशद्वार की मुख्य विशेषता चबूतरे के कोनों से उठे हुए चार सुन्दर संगमरमर की मीनारें हैं।
बन अभयारण्य (चिड़िया घर):- अंग्रेजों ने बन अभयारण्य बनवाया था। यहां सांभर, ब्लैक बक (काला हिरन), मोर, तोते, लंगूर, बन्दर आदि विभिन्न प्रकार के जीव जन्तुओं को अंग्रेज अधिकारियों ने अपने मनोरंजन के लिए पाल रखा था।यहां एक अच्ठे प्रकार का डाक बंगला भी था। बाद में उसमें आग लगने से वह जल कर खत्म हो गया और यह स्थाई पिकनिक स्पाट ना रह कर अस्थाई पिकनिक के रुप में विसित हुआ जो आज भी बना हुआ है।भारत में एसे बिरले ही स्मारक है जहां स्थापत्य और अभयारण्य एक साथ देखने को मिलता है। साम्भर अपने सम्पूर्ण फैलाव क्षेत्र में विभीन्न रूप और आकार में पाया जाता है, जिसके कारण पुराने समय में वैज्ञानिकों में असमंजस था और इसके लगभग 40 पर्याय थे। सामान्यतः कन्धे तक इसकी ऊँचाई 102 से १६०160 से.मी. होती है तथा वज़न 150 से 320 कि. होता है, हालांकि यह 546 कि. तक भी वज़नी हो सकता है। सर से कूल्हों तक की लंबाई 1.62 से 2.7 मी. हो सकती है तथा इसकी पूँछ की लंबाई 22 से 35 से.मी. तक होती है। अन्य हिरनों की तुलना में इसकी पूँछ ज़्यादा बड़ी होती है तथा आमतौर पर बाहर से काली और अंदर की तरफ़ सफ़ेदी लिये हुये होती है। पश्चिमी उप-जाति के जीव अपने पूर्वी सम्बन्धियों से आकार में कुछ बड़े होते हैं।इसके सींग बड़े और मज़बूत होते हैं तथा बहुत सी शाखाओं वाले होते हैं। पूर्ण वयस्क में इनकी लंबाई 110 से.मी. तक होती है। ज़्यादातर हिरनों की तरह सींग नर में ही पाये जाते हैं। इसकी रोएँदार त्वचा मटमैले रंग से लेकर गाढ़ी स्लेटी रंग की होती है। आमतौर पर यह पूरा एक ही रंग का होता है, लेकिन कुछ उप-जातियों में कूल्हों और पेट में लाल-भूरे रंग के निशान होते हैं। इसकी छोटी किन्तु घनी अयाल भी होती है जो नरों में ज़्यादा विशिष्ट होती है।वयस्क नरों तथा गर्भवती या दूध पिलाती मादाओं के गले से आधा नीचे दूर एक सुर्ख़-लाल धब्बा होता है। यह एक ग्रंथी होती है कभी-कभी इसमें से सफ़ेद रंग का द्रव्य निकलता है।
ब्लैक बक (काला हिरन):- अकबर टॉम्ब में रहने वाले ब्लैक बक तकरीबन सवा सौ साल से भी अधिक समय से रह रहे हैं। अकबर टॉम्ब के अंदर का एरिया ब्लैक बक के लिए लम्बे समय से नेचुरल हैबिटेट बना हुआ है। ब्लैक बक के साथ ही साथ बीते समय में यह मॉन्युमेंट लंगूरों की उपस्थिति के लिए भी खासा फेमस रहा है। सिकन्दरा में अकबर के मकबरे के परिसर में घूमने आने वाले देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण के केन्द्र दुर्लभ ब्लैक बक (हिरन) के संरक्षण की एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की जा रही है। लेकिन, हाल के सालों में अकबर टॉम्ब के अंदर जैकालों ने अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी है। जिसके चलते ब्लैक बक की जान सुरक्षित नहीं बची है. काले हिरनों की संख्या दिनोंदिन कम होती जा रही है। जबकि जैकाल को पकड़ने के लिए गवर्नमेंट की ओर से मोटा फंड भी रिलीज किया जा चुका है। सिकंदरा में दर्जनों की संख्या में जैकाल बने हुए हैं। जैकाल की वजह से ब्लैक बक कुनबे के सदस्यों में घटोत्तरी देखने को मिल रही है। जैकाल का झुंड दौड़ाकर एक हिरन को मारकर गिरा लेता है। पिछले कुछ समय में जैसे- जैसे जैकालों की संख्या बढ़ती गई, वैसे- वैसे ही ब्लैक बक कम होते चले गए। कुछ समय पहले तक अकबर टॉम्ब के अंदर तकरीबन ढाई- तीन सौ ब्लैक बक हुआ करते थे। सिकंदरा के अंदर जैकालों को घूमते- फिरते हुए साफ- साफ देखा जा सकता है। मॉन्युमेंट परिसर में उगे झाड़- झंखाड़ इनके छिपने- छिपाने के लिए मुफीद स्थान बने हुए हैं।
आज की तारीख में ब्लैक बक का परिवार सिमट कर महज पांच- छह दर्जन तक रह गया है।बढ़ते हुए जैकालों ने इनकों खत्म करने का काम शुरू कर दिया। झाडि़यों में छिपकर बैठने वाले जैकालों ने बीते समय में सबसे ज्यादा ब्लैक बक की फैमिली के छोटे- छोटे सदस्यों का ही शिकार किया। वयस्क काले हिरन तो एक बार को लम्बी- लम्बी छलांग लगाकर जैकालों से बचने की कोशिश में सफल भी हो जाते हैं लेकिन, इनके बच्चों को यह सफलता प्राय: कम ही नसीब होती है। नतीजा, जैकाल के पंजों में तड़प कर इनकी जान निकल जाती है। सरकारी खजाने से सात लाख रुपये का मोटा फंड रिलीज भी हो चुका है। यह पैसा वाइल्ड लाइफ एसओएस को दिया जा चुका है। धन इसलिए दिया गया ताकि अकबर टॉम्ब के अंदर से जैकालों को पकड़कर ब्लैक बक की जान बचाई जा सकी। पिछले दिनों जैकाल को पड़ने के लिए अभियान भी शुरू किया गया लेकिन, महज सात- आठ जैकाल पकड़ने के बाद अभियान ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। जबकि अभियान के तहत अकबर टॉम्ब को जैकाल विहीन करना था।

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