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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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शैलेन्द्र सिन्हा

देश के कुछ राज्य अभी भी ऐसे हैं जो आधुनिकता के साथ साथ अपनी साझा संस्कृति को भी न सिर्फ संजोय हुए हैं बल्कि उसे पीढ़ी दर पीढ़ी आगे भी बढ़ाते रहे हैं। इस श्रेणी में झारखंड का भी शुमार किया जा सकता है। एक तरफ प्रकृति ने इस राज्य को जहां संसाधनों से नवाजा है तो वहीं यहां के मूल आदिवासी भी आधुनिक परिवेश के बावजूद अपनी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। यहां स्थापित कई प्रकार के उद्योग धंधे विशेषकर कुटीर उद्योग ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी है। आदिवासियों की जिंदगी में रेशम उद्योग ने अहम भूमिका निभाई है। झारखंड की तीस जनजातियां तसर उपजाने में लगी है। रेशम उत्पादन में झारखंड देश में तीसरा स्थान रखता है। लगभग साठ हजार कीट पालक रेशमदूध के रूप में अपनी आजीविका चला रहे है। कृषि आधारित उद्योग से लाखों परिवार को रोजगार मिला है। झारखंड के आदिवासी के जीवन शैली में वनों का एक बड़ा हिस्सा रहा है। जहां साल और आसन के पेड़ बड़ी मात्रा में पाये जाते है। इन्हीं पेड़ों पर रेशम के कीटों का भोजन मिलता है। इस वक्त राज्य में 75 हजार करघे चल रहे है। जिसमें रेशम के धागे से कपड़े बुने जा रहे हैं। तसर उद्योग से किसानों की आर्थिक स्थिति में सुधार हो रहा है। वास्तव में तसर उद्योग पर्यावरण के लिए भी अनुकूल है।

पूरे देश में रेशम दूत का आधा हिस्सा झारखंड से है। रेशम की मांग अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर है। इससे प्रतिवर्ष झारखंड सरकार को पचास करोड़ रू0 विदेशी मुद्रा से प्राप्त होती है। रेशम उद्योग आज नई उचाईयों को छू रहा है। झारखंड में इको रेस के तसर सर्वाधिक पाए जाते है। अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में झारखंड सिल्क को कूचाई सिल्क के नाम से जाना जाता है। झारखंड के रेशमी कपड़ों की बिक्री दिल्ली, मुम्बई एवं बैंगलुरू में झारखंड सिल्क इम्पोरियम के माध्यम से बेचे जा रहे है। अब तो पूरे देश के हवाई अड्डों पर सिल्क इम्पोरियम खोले जाने की योजना है। झारखंड सरकार ने हैंडलूम एवं हैण्डीक्राफ्ट निर्यात कॉरपोरेशन, भारत सरकार से एम0ओ0यू0 किया है। नई दिल्ली स्थित कैनीड प्वांईट नामक संस्था के साथ एक करोड़ का व्यापार सरकार ने किया है। झारखंड में आर्गेनिक सिल्क बन रहा है। आज रेशम उद्योग में रोजगार के अवसर बढ़े है।

झारखंड में तसर का उत्पादन वर्ष 2008-09 में 400 मैट्रीक टन हुआ है। कीट पालकों के चेहरों पर खुशी देखी जा सकती है। दुंमका जिले के सरैयाहाट प्रखंड के झारखंडी राय बताते है कि वे लगभग दो एकड़ जमीन पर अर्जुन का पेड़ लगा चुके है। अर्जुन के पौधों पर तसर के कीट पालन से उत्पादन बढ़ा है क्योंकि अर्जुन के पौधों में कोकून अधिक मात्रा में होता है। आज व्यापारी कोकून को खरीदने गांव तक आते है। झारखंडी राय पांच वर्षों से रेशम दूत के रूप में काम कर रहे है। उनके पांच बच्चे है, जिनकी परवरिश इसी से कर रहे है। मो0 मुस्तफा अंसारी रेशम दूत के रूप में आज सभी के प्रेरण श्रोत बन गए है। श्री अंसारी ने दो सौ डी0एफ0एल्स0 से प्रथम फसल के रूप में 13,500,00 को कोकून का उत्पादन किया है। वे बताते है कि तसर उत्पादन में आमदनी उनकी तब बढ़ी जब उन्होने परम्परागत तरीके को छोड़कर वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन शुरू किया। चुन्नी किस्कू एवं सरस्वती देवी जैसी कई महिलाओं ने समूह के माध्यम से वाणिज्यक कीट पालक के रूप में तकनिकी प्रशिक्षण प्राप्त किया। महिलाओं का कहना है कि सावन माह में धान रोपन के बाद पूस माह में धान कटनी के बीच वह यह रोजगार करती है। कोकून की आमदनी से उनका परिवार चलता है। महिलाओं ने इस व्यवसाय को अपना कर स्वावलंबी बनने की दिशा में कदम बढ़ाया है। जरमंडी प्रखंड की मोनिका सोरेन का नाम तो राष्ट्रपति पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है।

झारखंड में रेशम विभाग के प्रयास से रेशम कृषकों को सरकार हर संभव मदद दे रही है। किसान इस पेशे से जुड़ रहे है। वैज्ञानिक तरीके से रेशम कीट का उत्पादन हो रहा है। तसर उत्पादन में वृद्धि लाने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है। संताल परगना में 17 हजार परिवार इससे लाभांवित हो रहे है। गोड्डा में सिल्क उद्योग से कपड़े बुने जा रहै है। सिल्क के क्षेत्र में झारखंड का अपना स्थान बनता जा रहा है। रेशम के उत्पादन से वन भी तेजी से लगाए जा रहे है। पर्यावरण के संकट से बचने में कोकून उत्पादन का महत्वपूर्ण स्थान है। तसर उद्योग घरेलू रोजगार की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। झारखंड में लघु उद्योग के विकास की व्यापक संभावनाएं है। राज्य में मजबूत अर्थ व्यवस्था के लिए कुटीर उद्योगों का विकास आवष्यक है। राज्य में तसर उद्योग के विकास की संभावना बढ़ी है। सरकार के पास अब भी इसे विकसित करने के लिए कोई विजन नहीं है। झारखंड के उद्योग मंत्री बताते है कि बेरोजगारी केा दूर करने में तसर उद्योग की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है। राज्य में कुटीर उद्योग के रूप में इसकी व्यापक संभावनाएं है। कुटीर उद्योग को बढ़ावा देकर राज्य की दशा उभारी जा सकती है। झारखंड सिर्फ खनिज संपदा के लिए हीं प्रसिद्ध नहीं है। बल्कि कुटीर उद्योग के क्षेत्र में भी रोजगार के लिए भी अवसर है। झारखंड में उद्योग विभाग द्वारा तसर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए झारक्राफ्ट कार्यरत है। (चरखा फीचर्स)

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