लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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गिरीश पंकज

स्वास्थ्यमंत्री गुलामनबी आज़ाद के बयान के बाद समलैंगिक संबंधों के पक्षधर लोगों ने बड़ा बवाल मचा कर रखा है. जबकि आज़ाद ने ऐसा कुछ नहीं कहा है, जिससे इतनी हाय-तौबा मचे. उन्होंने यही तो कहा है कि समलैंगिक सम्बन्ध बनाना एक तरह की बीमारी है.और अप्राकृतिक भी है. इसमे गलत बात कुछ भी नहीं. बेशक यह एक मानसिक बीमारी है, और अब तो यह भविष्य की भयंकर सामाजिक बीमारी भी बनने जा रही है. समलैंगिकता दो हताश, असफल, नाउम्मीद लोगों द्वारा आपसी सहमति से किया गया व्यभिचार है, इससे बचने की जरूरत है. इसे हम अपने मौलिक अधिकार की तरह न ले. कुछ चीज़े प्रतिबंधित ही रहें तो बेहतर हो. बलात्कार के लिये सजा है. कल को ऐसे मानवाधिकारी भी सामने आ सकते हैं जो कहेंगे कि यह व्यक्ति का अपना अधिकार है. उसके मन में उत्तेजना उठी, उसने बलात्कार कर लिया. हर मन में काम-वासना होती है, इसमे गलत क्या है? कल यह भी माँग उठ सकती है कि चोरी, डकैती को भी अधिकार बनाया जाये. जो ताकतवर है, वो किसी को लूट सकता है. रिश्वत को भी कानूनी बना दिया जाये. अगर इसी तरह समाज की सोच गतिमान रही, तो वह समय भी आयेगा, जिसे हम जंगल-राज का नाम दे सकते है.

मैंने अनेक देशों की यात्राएं की हैं. वहाँ कभी-कभार खुले -आम वासना का खेल खेलते लोग भी देखे है. लेकिन बहुत कम. पश्चिम में भी व्यभिचारियों से निपटने के कानून बने हैं.भारत में भी अपनी वासना की तृप्ति के लिये लोग बाग़-बगीचे, होटलों आदि का सहारा लेते हैं. यह मानवीय कमजोरी है. लेकिन कोई इसकी खुलेआम पैरवी नहीं कर सकता. जिस दिन ऐसा हो जायेगा, समाज को हम पत्थर-युग में देखेंगे. अभी सडकों पर केवल कुत्तों को ही खुले आम सहवास में रत देखा जा सकता है, अगर हम इसी तरह मनुष्यों को काम-वासना के सवाल पर उदारता दिखायेंगे तो कलको मनुष्य भी सडकों पर श्वानवत हरकतें करते नज़र आने लगेंगे. इसलिये वर्जनाएं ज़रूरी होती है. अगर नैतिकता के दायरे में या वर्जना में नहीं रहना चाहते, तो घरों के शौचालयों या बाथरूमों में दरवाजे क्यों लगाते हैं? पूरी दुनिया में यह व्यवस्था. ऐसे इसलिये है कि कहीं न कहीं हम अपने आप को सभ्य, शालीन बनाये रखते है. जिस चीज को परदे में रहना चाहिये, उसे परदे में ही रखना ही बेहतर होता है. इसलिये समलैंगिकता के सवाल को भी वर्जनात्मक नज़रिए से देखने-समझने की ज़रुरत है.

प्रकृति ने ही स्त्री-पुरुष की व्यवस्था पहले से रच दी है. उसी के सहारे संसार चल रहा है. लेकिन धीरे-धीरे मनुष्यों के बीच ऐसे लोग भी विकसित होने लगे जिनका विपरीत लिंग के प्रति कोई आकर्षण नहीं रहा. उन्हें समलिंगी ही भाने लगे. अपने इस सोच को उन्होंने ऐसा प्रचारित किया गोया वे कोई क्रांति कर रहे हैं. स्त्री और पुरुष दोनों में ही ऐसे लोगों कि संख्या बढ़ी और अब तो पूरी दुनिया में समलैंगिकों की बाढ़ -सी आ गई है. समलैंगिकों को सामाजिक मान्यता देने की बात हो रही है. वे आपस में शादी भी कर सकतें है. यह एक तरह की अराजक मानसिकता है और सच कहा जाये तो मानसिक बीमारी और अप्राकृतिक काम ही. इसे रोकना चाहिए, हतोत्साहित किया जाना चाहिए. कुछ लोग ऐसा करना चाहते हैं तो वे करें, लेकिन पूरे समाज को क्यों लपेटने की कोशिश कर रहे हैं? ऐसे अभियानों से बाल मन पर बुरा असर पड़ता है.नए बच्चे जो अभी समझदार होने वाले हैं, उनके सामने जब समलैंगिकता जैसे मामले ”प्रगतिशील व्यवहार’ की तरह पेश किये जायेंगे तो उन्हें लगेगा, यह भी एक रास्ता हो सकता है. समझदार और बालिग लोग एक साथ रह सकते हैं. लेकिन वे ऐसा तो माहौल न बनायें, जिससे समाज में अशांति फ़ैल जाये. अगर सम्लान्गिता ही अन्तिम्पदाव बन जाये तो ये दुनिया कितनी बदसूरत हो जायेगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है.

मीडिया के कुछ उत्साही लोग सम्पादकीय लिख कर स्वास्थ्य मंत्री को कोस रहे हैं, गोया उन्होंने कितनी पिछड़ी हुई बात कर दी है, जबकि उन्होंने बिल्कुल ठीक मुद्दा उठाया है. इन्हीं सब कारणों से तो एड्स जैसी बीमारी बढ़ी है. मैं सोचता हूँ कि यौन कुंठा के शमन के लिये ये लोग सही जोड़ा बनाने की प्रतिभा क्यों नहीं विकसित कर पाते? नाग-नागिन के जोड़े बन जाते है, कुत्ता भी एक कुतिया तलाश कर लेता है. सारे जव्बर विपरीत्लिंगी सेक्स ही करते हैं. पशु ऐसा कर सकता है, क्या मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता? कर सकता है. करता रहा है, मगर जब दिमाग में घृणित सोच पनपने लगे तो समलैंगिकता भी आन्दोलन बना दिया जाता है. वेश्यावृत्ति को मान्यता दी जानी चाहिए, यह माँग तो समझ में आती है मगर समलैंगिकता को वैधानिक दर्जा देने की माँग चौकाती है कि हम प्रगति के ये कैसे मुकाम पर आ गए है, कि अप्राकृतिक काम को अधिकार बनाने पर तुले हैं? पतन को, हिन्सा को सामाजिक स्वीकृति की माँग करने वाले तेज़ी के साथ बढ़े है. फिल्मों में खुले आम माँ-बहन की गलियाँ दी जा रही है, टीवी पर भी ये गलियाँ कभी-कभार सुनी जा सकती हैं. ये तो भलमनसाहत है कि कई बार गालियों की जगह ”बीप-बीप” सुना दिया जाता है. कुछ तथाकथित प्रगतिशील इसे भी गलत बताएंगे और कहेंगे कि यह अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता को रोकने की साजिश है. समलैंगिकता के अभिशाप से समाज को मुक्त करने के लिये कड़े कानून बनाना चाहिए. इसे मौलिक अधिकार का दर्ज़ा देने की भूल भी नहीं करनी चाहिए. गुपचुप तो बहुत से खेल चलते रहे हैं, मगर इन्हें कानूनी दर्ज़ा नहीं दिया जा सकता,

8 Responses to “समलैंगिता शारीरिक नहीं, मानसिक बीमारी है..”

  1. आर. सिंह

    आर.सिंह

    दिवेदी जी .ऐसे तो मेरी टिप्पणी के बारे में जाने या अनजाने कुछ कटाक्ष आयें हैं,पर मैंने ऐसे कटाक्षों और टिप्पणियों पर ध्यान देना छोड़ दिया है,अतः प्रत्युतर की सम्भावना भी नहीं है.पर आपने जब सीधा प्रश्न किया है तो मेरा कर्तव्य हो जता है की मैं आगे भी कुछ कहूं.मेरी टिप्पणी का निष्कर्ष उसकी अंतिम पंक्ति में है.उसको फिर से पढने का कष्ट कीजिए.समाज के नीचता और बेह्याप्न का मैं कभी भी न समर्थक रहा न मेरा व्यक्तिगत आचरण वैसा है,पर इतना मैं अवश्य कहता हूँ की हमें यदि उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होना है,तो हमें हिपोक्रेसी यानी नैतिक दोगलेपन (हिपोक्रेसी का यह मेरा हिंदी अनुवाद है.) से ऊपर उठना होगा.मैं मुख में राम और बगल में छुरी वाली नैतिकता का प्रबल विरोधी हूँ,पर आज का हमारा आचरण मुझे यह कहने को वाध्य करता हैं की हम वह नहीं हैं जो दिखाने की कोशिश कर रहें हैं.यह अवश्य है की खुले रूप में स्त्री पुरुष का सम्बन्ध हो या समलैंगिक सम्बन्ध हो(इसमें पुरुष का पुरुष से और नारी का नारी से सम्बन्ध शामिल है)मैं दोनों को व्यभिचार ही मानता हूँ और अगर किसी भी पुरुष का किसी भी नारी से विवाहेतर सम्बन्ध जायज है तो समलैंगिक सम्बन्ध को नाजायज ठहराने का का हमें कोई अधिकार नहीं.अगर वह सम्बन्ध दो वयस्कों के बीच का आपसी मामला है तो मैं इसको भी वैसा ही मानता हूँ..मेरे विचार से ये दोनों सम्बन्ध व्यभिचार की श्रेणी में आते हैं.अतः दोनों के लिए दंड विधान एक होने चाहिए.रह गयी बात चोरी या अन्य प्रकार के जुर्मों से इसकी तुलना की बात तो मैं यही कहूँगा की ये दोनों जुर्मों की अलग श्रेणियां हैं और समाज पर इनका प्रभाव भी भिन्न है.अंत मैं यह कहना चाहूंगा की खुले आम इसकी स्वीकृति भले ही आज की बात हो पर मैं तो इसको बचपन से देखता आ रहा हूँ और मैंने कहीं लिखा भी है की देहात के स्कूलों मैं भी कोई सुंदर छात्र विरले ही शिक्षकों के हवश का शिकार होने से बचता था.फिर भी जो गलत है वह गलत ही रहेगा,पर गलत को गलत कहने के लिए हमें अपने चरित्र पर भी ध्यान देना होगा की हम इसके हकदार हैं भी?

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  2. K. S. Dwivedi

    आर सिंह जी.
    अगर कोई बुराई पुरानी हो जाये तब भी वो बुराई ही रहती है. इस बात के सबूत मिले हैं की चोरी पुरातन काल से होती चली आ रही है.. तो क्या उसे बुराई नहीं मानना चाहिए??
    दूसरी बात: लज्जा या परदा या शर्म… इनके भी कुछ मायने हैं… हम सब अपनी नित्य क्रिया करते हैं लेकिन छिप कर… तो क्या हम सब को ये सब भी खुलेआम करना चाहिए, आधुनिकता के नाम पर??
    समलैंगिक सम्बन्ध सही हैं या गलत पता नहीं, लेकिन अप्राकृतिक जरूर हैं… और प्रकृति से छेड़छाड़ के परिणाम हमेशा भयावह रहे हैं…

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  3. Ram narayan suthar

    वास्तव में यह एक मानसिक बीमारी ही है बेशर्मी का सरेआम प्रदर्शन पशिम की ही देन है और अब ये सम्लेगिगता नाम का व्यभिचार पशिम द्वारा समाज पर और थोपा जा रहा है
    ये व्यभिचार की परिसीमा है

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  4. ajit bhosle

    सभी महानुभावों की टिप्पणियाँ पढी, मेरी नज़र में भी यह एक मानसिक बीमारी है, जिसे कुछ चालाक व्यापारियों द्वारा बढाया जा रहा है, मै समझता हूँ बहुत कम लोग जानते होंगे की इसका बेहद बड़ा बाज़ार है दो साल पहले मैं थाई-लेंड गया था, मेरे साथ मेरी पत्नी कुछ मित्र एवं उनकी पत्निया एवं बच्चे थे हम लोग बेंकोक एक दूकान में गलती से चले गए वहां पर जो कृत्रिम मानवीय अंग देखे (ज़ाहिर है गुप्त-अंग) इतनी शर्म आयी कुछ बयान नहीं कर सकता, ये व्यापारी पूरी दुनिया में अपना व्यापार फैलाना चाहते हैं और इसमें इतना मार्जिन है की ये लोग किसी को भी खरीद सकते और मीडिया तो पूरी तरह बिकने को तैयार बैठा है, आप खुद गौर करिए इसके विरोध में कितना छपता है. जबकि इसका कडा विरोध जरूरी है.

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    • गिरीश पंकज

      girish pankaj

      खुशी की बात है की मेरे विचारों को अनेक बौद्धिक पाठकों ने पसंद किया. इनमें अधिकाश अच्छे लेखक भी है. ऐसे विचारों का प्रचार-प्रसार होना ही चाहिए. दुनिया को बचाना है तो यह ज़रूरी भी है.

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  5. डॉ. मधुसूदन

    मधुसूदन उवाच

    डॉ. ग़ुलाम मुर्तजा शरीफ,— अमेरिका, जानकारी के लिए पूछना चाहता हूं, कि आप M D डॉकटर है, या Ph d डॉक्टर हैं? और क्या यह विकृति हॉर्मोन्स के असंतुलन के कारण होती है? महाभारत काल में भी ऐसे उदाहरण पढे हुए स्मरण है।

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  6. डॉ. राजेश कपूर

    dr.rajesh kapoor

    भाई गिरीश जी समाज में कम या अधिक कदाचार सदा से रहा है. निसंदेह अप्राकृतिक कर्म मानसिक विकृति का परिणाम है. जो लोग इन विकृत व अप्राकृतिक कर्मों का समर्थन करते हैं वे भी मानसिक विकार का शिकार हैं और अपनी विकृत दबी काम कुंठाओं की अभिव्यक्ति कर रहे हैं. तामसिक बुधि के कारण सही-गलत का विवेक वे गंवा चुके हैं जिसके कारण विकृत व अप्राकृतिक कर्मों की वकालत कर रहे हैं.
    अरे बुधि के शत्रु बंधुओ समाज में बलात्कार, चोरी, ह्त्या, पशुओं से दुश कर्म जैसे अनुचित कर्म विकृत मानसिकता के चाँद लोग करते आये हैं, तो क्या इन सब दुराचारी कर्मों को मान्यता दे देनी चाहिए ? अप्राकृतिक काम क्रीडाएं विकृत मानसिकता के चन्द लोग अपवाद स्वरुप करते रहे हैं पर ऐसा पागलपन कभी नहीं था की उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा या मान्यता दिलवाने के लिए प्रयास हो. ऐसा करने वाले या तो मानसिक रोगी हैं और या फिर महान कुटिल. ये वे लोग हैं जो स्वयं तो पतित हैं ही और सुधर नहीं सकते अतः अपमान व लांछन से बचने के लिए सभी को अपने जैसा बनाना चाहते हैं. जानते है वे कौन लोग हैं ? वे हैं ईसाई पंथ के वे नन, पादरी जिन्हें आजीवन काम सुख से वंचित रहना पड़ता था. सम लिंगी काम वासना को उन्ही लोगों ने मुख्यतः फैलाया और उसे मान्यता दिलवाने के प्रयास भी इन्ही पश्चिमी लोगों द्वारा शुरू हुआ और आज भी वे ही लोग इसके पीछे हैं. भारत व अफ्रीका को पतित व कमजोर बनाने का गुप्त प्रयास भी इसके पीछे है. यूरोपीयों की अपनी खोजों से सिद्ध हो चुका है कि समलिंगी एड्स तथा अन्य प्रजनन रोगों के शिकार अधिक आसानी से बनते हैं. तो क्या सम लेंगिकता को बढ़ावा देने वाले एड्स को बढ़ावा देने के लिए काम नहीं कर रहे ? इन सब बातों को समग्र रूप देखना होगा.

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  7. आर. सिंह

    आर.सिंह

    यह शारीरिक बीमारी हो या मानसिक,पर यह बीमारी, मेरे विचार से ,सृष्टि के आरम्भ से ही है.सुंदर लडकों को लडकियों के रूप में इस्तेमाल करने का चलन आज या केवल वर्तमान समय का नहीं है.ऐसे आज लोग खुल कर इसके समर्थन में आ रहे हैं. आप यही कह सकते हैं की पहले जो काम परोक्ष में होता था,वह आज खुलेआम हो रहा है.सामाजिक मान्यता मिले या नहीं ,जो लोग अपने आनन्द के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं वे तो करेंगे हीं.अभी बहुत दिन नहीं गुजरे जब बिहार में लौंडा नाच होता था और यार लोग रजामंदी न होने पर उन छोकरों को उठा ले जाते थे.आज जब वे छोकरें आपस में ऐसा खुलम खुल्ला करने पर उतारू हो गये तो एतराज क्यों?

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