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    सामाजिक दूरी – हक़ीक़त और फ़साना और

    निर्मल रानी
    भारत में कोविड-19 की दूसरी लहर अपना भयावह ताण्डव दिखाकर हालाँकि कमज़ोर पर चुकी है। परन्तु पूर्वोत्तर के आसाम जैसे कुछ राज्य अभी भी इस प्रकोप का सामना कर रहे हैं। महाराष्ट्र में भी अभी तक इस जानलेवा वॉयरस का विस्तार ख़त्म नहीं हो सका है। परन्तु कोविड के चलते पूर्व में हो चुके लॉकडाउन के कारण देश की बिगड़ी अर्थ व्यवस्था व देश में फैली भयंकर बेरोज़गारी जैसे वातावरण से उबरने के लिये सरकार धीरे धीरे सभी क्षेत्रों में लॉकडाउन से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। आहिस्ता आहिस्ता जहाँ देश की घरेलू हवाई उड़ानों को पूरी क्षमता के साथ संचालित किया जा रहा है वहीं रेल मंत्रालय भी शीघ्र ही सभी यात्री रेल गाड़ियों को कोविड पूर्व की स्थिति में अर्थात पूरी क्षमता के साथ चलाने जा रही है। परन्तु इन कोशिशों के बीच कोविड-19 की तीसरी लहर का ख़तरा अभी भी बरक़रार है और सरकार द्वारा इससे बचने के लिये अपनाये जाने वाले उपायों संबंधी चेतावनी अभी भी हवाई अड्डों,रेलवे स्टेशन्स बस अड्डों जैसे भीड़ भाड़ वाले मुख्य मुख्य स्थानों पर जारी की जा रही है।
    परन्तु क्या इन चेतावनी पर जनता अमल भी कर पा रही है ? क्या सरकार द्वारा ऐसी व्यवस्था भी की गयी है जिससे सामाजिक दूरी का पालन किये जाने जैसे निर्देशों का जनता चाहते हुए भी पालन कर सके ? या फिर इस तरह के निर्देश केवल विश्व स्वास्थ्य संगठन व दुनिया को दिखने के लिये दिये जाते हैं ? आम तौर पर देश की ग़रीब व आम साधारण जनता को भीड़ बढ़ाने का ज़िम्मेदार ठहरा दिया जाता है। यदि आप घोर कोरोना काल के दौरान बिहार,बंगाल,मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में हुए चुनावों व उपचुनावों के दृश्यों को याद करें तो यही पायेंगे कि जो ज़िम्मेदार नेता जनता को कोविड-19 की निर्देशावली का पालन करने की अपील करने के लिये जनता का सैकड़ों करोड़ों रुपया प्रचार तंत्र पर लगा रहे थे वही नेता अपने अपने दलों की रैलियों व चुनाव सभाओं में आम लोगों की भारी भीड़ को भी आमंत्रित व संबोधित करते फिर रहे थे। उनकी अपनी स्टेज पर सामाजिक दूरी बनाये रखने व मास्क का उपयोग करने जैसे निर्देशों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं।
    पिछले दिनों मुझे दिल्ली-गुवाहाटी-दिल्ली की हवाई यात्रा करने का अवसर मिला। प्रातः सात बजे एयर एशिया के विमान से टर्मिनल-3 से उड़ान निर्धारित थी। विभिन्न क्षेत्रों की उड़ानों के लिये प्रवेश द्वार एक ही था। यहाँ तक कि राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के यात्री एक ही पंक्ति में खड़े थे। विश्वास कीजिये कि शायद रेलवे के साधारण यात्रियों या बस अड्डों पर भी इतनी भीड़ देखने को नहीं मिलती जितनी इंदिरा गाँधी एयरपोर्ट के टर्मिनल 3 पर दिखाई दी। यात्री एक दूसरे पर चढ़े जा रहे थे। धक्का मुक्की के आलम में लोग एक दूसरे से आगे निकलने की कोशिश करते तो झगड़ा लड़ाई की नौबत तक आ जाती। उधर सरकार व एयर पोर्ट अथॉरिटी की तरफ़ से ज़मीन पर सामाजिक दूरी बनाये रखने का निर्देश देने वाले गोल निशान पूरी मुस्तैदी से बनाये गए थे। कोविड निर्देशावली वाले पोस्टर व घोषणाओं में कोई कंजूसी नहीं बरती गयी थी। परन्तु सामाजिक दूरी का पालन करते हुए जहाँ मात्र 50 लोगों के खड़े होने की जगह थी वहीँ एक हज़ार से ज़्यादा लोग एक दूसरे से धक्का मुक्की करने के लिये मजबूर थे। क्योंकि विमान में प्रवेश की सभी को जल्दी थी। दिल्ली ही नहीं बल्कि गुवाहाटी के लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भी इसी तरह की घोर दुर्व्यवस्था देखने को मिली। जहाँ प्रचार व घोषणाओं में तो कोविड गाईड लाइन की पालना करने का ढिंढोरा तो ज़रूर पीटा जा रहा था परन्तु हवाई अड्डा प्रशासन की ओर से अव्यवस्था फैलाने में भी कोई कमी नहीं थी। उधर विमान में प्रवेश करने और उसमें बैठने के लिये भी सामाजिक दूरी नाम की किसी निर्देशावली का पालन नहीं किया जाता। क्योंकि विमान अपनी पूरी क्षमता के साथ उड़ रहे हैं। एक सीट छोड़ कर आधे विमान की सवारी के साथ उड़ान भरना विमान कंपनी के लिये संभव नहीं।
    आसाम हालाँकि इस समय कोविड प्रभावित राज्यों में प्रमुख है। यहाँ एयर पोर्ट से लेकर गुवाहाटी तथा कामाख्या देवी रेलवे स्टेशन के रास्ते आसाम में प्रवेश करने वाले लोगों के टीका लगाने के प्रमाण पत्र सख़्ती से जांचे जा रहे हैं। जिनके पास प्रमाणपत्र है उन्हें तो गुवाहाटी में प्रवेश करने की इजाज़त है परन्तु जिन्होंने टीकों की दोनों ख़ुराक नहीं लगाई है उनका कोरोना टेस्ट कर असम में प्रवेश दिया जा रहा है। ज़ाहिर है तमाम यात्री अभी चूँकि टीका नहीं लगवा सके हैं या नहीं लगवाना चाह रहे हैं उनकी तादाद भी कम नहीं। बस जहाँ उन यात्रियों की जांच चल रही है वहां भी सामाजिक दूरी बनाए रख पाना संभव नहीं। क्योंकि जगह कम है और यात्री ज़्यादा। इसी तरह ब्रह्मपुत्र नदी के उस पार और नदी के टापुओं पर रहने वाले लाखों लोग प्रतिदिन गुवाहाटी आते जाते हैं। उनके साथ मोटर साईकिल,स्कूटर,साईकिल,व्यव्साय संबंधी तमाम सामान आदि सब कुछ होता है। उनको लाने ले जाने वाले स्टीमर व छोटे जहाज़ ओवर लोड होकर चलते हैं। यहां भी जगह कम,यात्री ज़्यादा और कोई भी सामाजिक दूरी नज़र आती है ,न ही कोई मास्क लगाने की ज़रुरत महसूस करता है।
    इसी तरह आप असम के किसी भी पर्यटन स्थल पर चले जायें,किसी होटल में जायें हर जगह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी कोविड संबंधी निर्देशावली बोर्ड व पोस्टर लगाने में और स्थान के वैक्सीनेटेड होने के बोर्ड लगाने में कोई कसर बाक़ी नहीं रखी गयी है साथ साथ इन्हीं जगहों पर इसी कोविड निर्देशावली की धज्जियाँ भी बख़ूबी उड़ाई जा रही हैं। ऐसे में ईश्वर न करे यदि कोविड की तीसरी लहर आती है तो इसके लिये जनता को ही दोषी ठहराया जायेगा। जबकि व्यवस्था भी इसके लिये कम दोषी नहीं। कहना ग़लत नहीं होगा कि कोविड निर्देशावली की सामाजिक दूरी के अमल को लेकर हमारे देश में हक़ीक़त कुछ और है और फ़साना कुछ और।

    निर्मल रानी
    निर्मल रानी
    अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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