सामाजिक समरसता एवम् डॉ .भीमराव अांबेडकर

डॉ .प्रेरणा चतुर्वेदी

भारतीय संस्कृति की आत्मा समरसता परिपूर्ण है .धर्म सापेक्षीकरण ,धर्म निरपेक्ष करण ,सर्वधर्म समभाव, मानवतावाद ,बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय, आदि अवधारणा सामाजिक समरसता की पोषक रही हैं. विविधता में एकता का भाव समरसता का प्रतिनिधित्व करता है. ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ यह भारतीय संस्कृति का अमर वाक्य व्यष्टि  नहीं  समष्टि के कल्याण ,सुख -समृद्धि एवं हित की बात करता है और जहां एक नहीं अनेक मानवों बल्कि मानव ही नहीं,  प्रत्येक प्राणी सजीव ,निर्जीव सभी के हित की बात की जाए .वही समरसता का उच्च  आदर्श बनता है. मानव समाज में व्याप्त वाह्य आडंबर, कर्मकांड ,दैविक- दैहिक -भौतिक  पापों और तापों से मुक्ति का भाव भी इसी में समाहित है.

‘मैं ‘शब्द व्यक्तिवाद का प्रतीक है .जबकि ‘हम ‘शब्द में सामाजिक समरसता का आधार छिपा है .समरस समाज में ऊंच -नीच, जातिगत भेदभाव, क्षेत्र ,वर्ण -धर्म संप्रदाय की संकीर्णताएं व संघर्ष नहीं है .

जब तक समाज में क्षेत्रीयतावाद, संप्रदायवाद, भाषावाद ,अस्पृश्यतावाद का प्रहार होता रहेगा .तब तक एकजुट समाज , विकसित समाज ,उन्नत समाज ,समतामूलक समाज की कल्पना व्यर्थ होगी.

वास्तव में यदि भारत को विश्वगुरु बनना है तो अपनी अंतिम ऊर्जा को जागृत कर सामाजिक जीवन को एकरस -समरस करना ही होगा ,अन्यथा केवल आर्थिक और प्रौद्योगिकी आधार पर विकसित विचारधाराओं के बल पर मानव सुख की कल्पना बेमानी होगी .

समस्त विकृतियों, विषमताओं ,आक्रोश से मुक्त समरस समाज का मार्ग ही राष्ट्र कल्याण का मार्ग हो सकता है.

समता का आविर्भाव समानता के बिना नहीं हो सकता .’समान शीलेषु व्यसनस्य सख्यम् ‘उक्ति प्रसिद्ध है .फिर समानता लाने के लिए कुछ स्वार्थों का बलिदान भी करना पड़ता है.

जिस आंतरिक आत्मीयता के भरोसे इस प्रकार अपनी व्यक्तिगत आशा -आकांक्षा तथा स्वार्थ के बलिदान के लिए भी व्यक्ति सिद्ध रहता है .अपने समाज -बंधुओं के हित की संवेदना जिस आंतरिक संस्कार के कारण व्यक्तियों के ह्रदय को झंकृत करती है .उसी को समरसता कहते हैं .समरसता की ऐसी भावना के आधार पर ही विविधताओं से भरा भारत वर्ष में उसका हिंदू समाज अपने एकरस जीवन का निर्वाह प्राचीन समय से कर रहा है .जब -जब भारत में सामाजिक समरसता की पूर्णता देखी गई. तब -तब उसके वैभव सामर्थ्य और प्रतिष्ठा की जगत में पराकाष्ठा होती गई .जब- जब किसी दोष, दुर्बलता अथवा वाह्य कारणों से समरसता के पूर्ण बिम्ब का क्षय हुआ. तब -तब भारतवर्ष श्रीहीन ,विद्याहीन, दुर्बल  होकर विदेशी आक्रांताओं द्वारा पददलित एवं खंडित हुआ.

भारत की आन्तरिक एकता की आधारभूत इस समरसता को जगाने तथा विषमता और उसके कारणों को हटाने के भगीरथ प्रयास अनेक महान मनीषियों द्वारा प्रवर्तित हुए व अभी भी कम या अधिक मात्रा में चल रहे हैं .

समरसता का मूल उद्देश्य ही भेदभाव -अस्पृश्यता को दूर कर विविध समाजों को एकत्रित करना व संगठित करना है. सामाजिक व्यवस्था में ‘समता’ एक श्रेष्ठ तत्व है. भारतीय संविधान में इसे प्राथमिकता दी गई है और इस तत्व शब्द का अर्थ समझाया गया है कि- सभी को समानता का अधिकार प्राप्त है .वास्तव में आज सामाजिक समरसता सर्वोपरि आवश्यकता है. समरसता का यह भावात्मक तत्व है और इसमें बंधुभाव के तत्व को असाधारण महत्ता दी जाती है .

डॉक्टर बाबा साहब भीमराव रामजी अांबेडकर कहते थे,- बंधुता यही स्वतंत्रता तथा समता का आश्वासन है. स्वतंत्रता तथा समता की रक्षा कानून से नहीं होती. समरसता पूर्वक व्यवहार से स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व इन तीनों तत्वों द्वारा साध्य तक पहुंचा जा सकता है. यद्यपि इन तत्वों के आधार पर हिंदू समाज की रचना नहीं हुई. समरसता स्थापित करने हेतु सामाजिक न्याय का तत्व भी उतना ही जरूरी है .

आज प्राणियों में बढ़ती स्वार्थपरता के कारण ही समाज समर भूमि बन रहा है  .इस समर से मुक्ति मात्र समरसता से ही मिल सकती है .

समाज के सभी वर्गों में समानता लाने के लिए महानायकों ने सामाजिक परिवर्तन का आह्वान किया. विशेषकर समाज के अंत्योदय वर्ग को मताधिकार एवं समाज में बराबरी का अधिकार दिलाने हेतु बहुजन समाज के महापुरुषों ने आजीवन कठिन संघर्ष किया .इन महापुरुषों के सतत संघर्ष की एक लंबी श्रृंखला रही है. जिनमें गौतम बुद्ध ,संत कबीर ,संत रविदास ,महात्मा ज्योतिबा फुले ,नारायण गुरु, छत्रपति शाहूजी महाराज एवं बाबा साहब डा.भीमराव अांबेडकर आदि का नाम विशेष उल्लेखनीय है.  सामाजिक समता, सामाजिक न्याय ,सामाजिक अभिसरण जैसे समाज परिवर्तन के मुद्दे को प्रधानता दिलाने वाले विचारवान कार्यकर्ता व नेता डॉ . बी.आर.आंबेडकर का भारत के इतिहास में प्रमुख स्थान है. सामाजिक जीवन में उनका प्रवेश बीसवीं सदी पर मूलगामी प्रभाव डालने वाला सिद्ध हुआ .

डॉ अंबेडकर का जीवन संघर्ष ,साहित्य एवं दर्शन देखने से पता चलता है कि दलितों का उनसे बढ़कर कोई हमदर्द नहीं था .उन्होंने मात्र ‘स्व’ का विकास नहीं किया. बल्कि अपने पूरे समाज का विकास कैसे हो ,उसे शिक्षा, समानता ,अधिकार कैसे मिले ? इसके लिए वे चिंतित एवं प्रयत्नशील रहे .उन्होंने दो हजार वर्षों से सोयी हुई  दलित चेतना को जागृत किया. ऐसे मूक,गूंगे एवं भाग्यवादी समाज काे सशक्त नेतृत्व किया. जो अत्यंत कठिन काम था. उन्होंने दलित समाज को शक्ति एवं दिशा प्रदान की.

डॉ. बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर उच्च कोटि के राष्ट्रभक्त और सामाजिक समरसता के  सूत्रधार थे. उनके  चिंतन में हिंदू समाज की एकात्मकता का दर्शन स्पष्ट दिखाई देता है .वे कैसे समाज सुधारक थे जो सदियों से वंचित पीड़ित बंधुओं का मर्मज्ञ था को समझकर जीवन पर्यंत उनके उत्थान के लिए प्रयत्नशील रहे

बाबा साहेब कहा करते थे कि -‘समता के बिना स्वतंत्रता निरर्थक है. वे यह जानते भी थे कि हिंदू समाज के कुछ तत्व उनकी गिनती हीन श्रेणी में करते थे. कालाराम मंदिर सत्याग्रह को उन्होंने सामाजिक समरसता का साधन मात्र माना.

डॉ आंबेडकर खिलाफत आंदोलन के कटु आलोचक  थे .उनकी मान्यता थी कि- ‘मुसलमान भारत को अपनी मातृभूमि तथा हिंदुओं को सगे भाइयों के रूप में कभी भी मान्यता नहीं देंगे .उनका विचार था कि मुस्लिम समाज हिंदू अस्पृश्य समाज से कभी भी समता का व्यवहार नहीं करेगा .

पाकिस्तान बनने के पश्चात उधर के वंचित बंधुओं से उन्होंने कहा कि- ‘मैं पाकिस्तान में फंसे वंचित समाज से कहना चाहता हूं कि उन्हें जो मिले उसी मार्ग व साधन से हिंदुस्तान आ जाना चाहिए ‘.

डॉक्टर बाबा साहेब आंबेडकर के जुझारूपन और कठोर भाषा के बाह्य आवरण के पीछे भारत माता के प्रति उनकी एकांतिक निष्ठा थी. उनका विचार था कि सामाजिक समानता और न्याय के द्वारा देश में संगठित सामर्थ्य का निर्माण किया जा सकता है. वह वंचितों के सुधार और समस्याओं का चिंतन हिंदू समाज दर्शन के संदर्भ में किया करते थे. इतिहास में डॉक्टर आंबेडकर का स्थान सामाजिक समरसता के प्रणेता के रूप में अमर रहेगा.

डॉ अंबेडकर ने दलित, शोषित ,उपेक्षित लोगों के उद्धार के लिए 26 जनवरी, 1950 को देश में लोकतंत्रात्मक शासन प्रणाली काे बनाकर बालिग मताधिकार का प्रवधान बनाया .भारतीय संविधान में दलित समाज के हित का ध्यान रखकर अनुच्छेद- 14 के तहत उनके पिछड़ेपन को दूर करने की व्यवस्था की .

अनुच्छेद -14 ,15, 16 समानता के अधिकार से ही संबंधित है. अनुच्छेद -14 में घोषणा की गई कि–‘ भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता से या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा .’.

अनुच्छेद- 15 में कहा गया- ‘किसी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म ,वंश, जाति ,लिंग, जन्म स्थान या इनमें से किसी आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा और किसी नागरिक को इसमें से किसी के आधार पर दुकानों, सार्वजनिक भोजनालय ,पूर्णत: या अन्शत: राज्य विधि से घोषित या साधारण जनता के प्रयोग के लिए समर्पित कुओं, तालाब ,स्नानघरों , सड़कों और सार्वजनिक समागम के स्थानों के उपयोग से वंचित नहीं किया जाएगा .’

अनुच्छेद- 17 छुआछूत के व्यवहार को कानूनन दंडनीय अपराध घोषित करता है.

डॉ भीमराव अांबेडकर समाज के सभी अन्याय पूर्ण और दमनकारी स्वरूपों के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक मात्र नहीं थे, अपितु भारतीय समाज में उभर रही नवचेतना तथा बहुजन जागृति के एक महान मसीहा के रूप में प्रतिष्ठित हैं .बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉक्टर आंबेडकर दलित, शोषित ,पीड़ित ,पिछड़ों के सामाजिक सुधार हेतु जीवन भर संघर्षरत रहे. अनेक अवरोधक तत्वों का सामना करते हुए तथा सामाजिक आर्थिक अन्याय एवं अत्याचार से पीड़ित मानवता के हिमायती और उद्धारक के सजीव मार्गदर्शक के रुप में डॉक्टर आंबेडकर को व्यापक मान्यता प्राप्त हुई .उनका संपूर्ण जीवन मानव अधिकारों के प्रति समर्पित और चिंतन पूर्णत: मानवीय मूल्यों पर आधारित था.

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जनसंघ के अध्यक्ष थे उन्हाेंने पत्रकारिता – लेखन के माध्यम से सामाजिक समरसता लाने का जीवन- पर्यंत संघर्ष और कार्य किया. अंत में  भारतीय राजनीति में मूल्यों की स्थापना करने हेतु शहीद हो गए .उनके सपनों के भारत में मन ,बुद्धि और आत्मा का समन्वय एक समरस  समाज  व वर्ग विहीन समाज का स्वप्न था .ठीक उसी प्रकार राष्ट्ररत्न बोधिसत्व बाबा साहब भीमराव रामजी आंबेडकर ने दलित ,उपेक्षित तथा विपन्न वर्गों के लिए  कार्य किया .आज दलित समाज में चहुंआेर प्रकाश दिखाई दे रहा है .यह बाबा साहब के प्रयासों का ही फल है. दलित समाज भी स्वयं के अंदर हिंदू समाज का एक अंग महसूस करता है. आज संपूर्ण भारत में सामाजिक समरसता पर प्रहार हो रहे हैं. ऐसे समय में  डॉ बी आर अंबेडकर के विचारों की सामाजिक समरसता संबंधी अवधारणा की प्रासंगिकता बढ़ गयी है .आज सरकार और गैर सरकारी संगठनों की भूमिका  भी बढ़ गई है. हमें आशा के साथ इस कार्य को आगे बढ़ाना है.

 

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