More
    Homeकला-संस्कृतिमनुष्य जीवन की उन्नति में पालन करने योग्य कुछ आवश्यक कर्तव्य

    मनुष्य जीवन की उन्नति में पालन करने योग्य कुछ आवश्यक कर्तव्य

    -मनमोहन कुमार आर्य
    हम मनुष्य कहलाते हैं। इसका कारण यह है कि परमात्मा ने हमें सत्य व असत्य का विचार करने के लिए बुद्धि दी है। परमात्मा ने ही मनुष्येतर सभी प्राणियों को बनाया है परन्तु उनको मनुष्यों जैसी सत्यासत्य का विवेचन करने वाली बुद्धि नहीं दी है। वह सत्य व असत्य का विचार नहीं कर सकते। वह प्राणी कोई भाषा बोल कर अपने मन की बात अपनी जाति के दूसरे प्राणियों को बता भी नहीं सकते। परमात्मा ने मनुष्यों को काम करने व पत्र आदि लिखने के लिए दो हाथ दिये हैं। पशुओं व पक्षियों के पास मनुष्यों के हाथ जैसी कर्म इन्द्रिय भी नहीं है। इस प्रकार से मनुष्य अन्य सभी प्राणियों से भाग्यशाली है। वह अपनी बुद्धि व हाथों की सहायता से अपने जीवन को स्वस्थ बनाते हैं और सुखपूर्वक 70 से 100 वर्ष की आयु प्राप्त कर सुख भोगते हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि यदि हमारा पूरा जीवन संयमपूर्वक व्यतीत हो तथा हमें रसायनिक खाद के स्थान पर जैविक खाद से उत्पन्न अन्न, वनस्पतियां एवं फल आदि खाने को मिलें, देशी गाय का दूध पीने को मिले, तो हम आशा कर सकते हैं कि हमारा जीवन और भी अधिक स्वस्थ, बलवान होगा व सुखपूर्वक व्यतीत हो सकता है।

    इससे पहले कि हम मनुष्य के कर्तव्यों की चर्चा करें, हम ऋषि दयानन्द जी द्वारा सत्यार्थप्रकाश में दी गई मनुष्य की सबसे अधिक सुसंगत परिभाषा प्रस्तुत करते हैं। वह लिखते हैं कि मनुष्य वही है कि ‘जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्वसामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वे महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रियाचरण और अधर्मी चाहे चक्रवत्र्ती सनाथ, महा-बलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उसको (मनुष्य को) कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी भले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे।’ मनुष्य की यह परिभाषा ऋषि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ के अन्त में ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ के अन्तर्गत प्रस्तुत की है। हम यदि अपने आपको मनुष्य कहते व मानते हैं तो हमें देखना चाहिये कि क्या हम इस परिभाषा के अनुसार मनुष्य होने की आवश्यकताओं की पूर्ति करते है या नहीं? इस परिभाषा में मनुष्य के कर्तव्यों को भी प्रस्तुत किया गया है। 
    
    मनुष्य के कर्तव्यों पर विचार करते हैं तो मनुष्य के कर्तव्यों का बोध व ज्ञान हमें वेदाध्ययन व ऋषि दयानन्द के सत्यार्थप्रकाश, पंचमहायज्ञविधि, संस्कारविधि, व्यवहारभानु, गोकरूणानिधि आदि ग्रन्थों से होता है। मनुष्य के प्रमुख कर्तव्यों में ईश्वर को जानना व उसकी प्रतिदिन प्रातः व सायं उपासना करना भी है। जो लोग इस कर्तव्य की पूर्ति नहीं करते वह ईश्वर के सत्य ज्ञान व उपासना से जीवन भर वंचित रहते हैं और अज्ञान के अन्धकार में पड़े रहकर मिथ्या पूजा में समय नष्ट कर अपने जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति में विफल रहते हैं। हमें अपने स्वास्थ्य को उत्तम स्थिति प्रदान करना, उसे रोगों से बचाना व शरीर को बलशाली बनाना भी हमारे कर्तव्यों में सम्मिलित है। इसके लिए हमें प्रातः 4.00 बजे सोकर उठ जाना चाहिये और प्रातः शौच, भ्रमण व व्यायाम आदि से निवृत्त होकर ईश्वरोपासना के अन्तर्गत ऋषि दयानन्द लिखित पद्धति से ‘सन्ध्या’ करनी चाहिये। सन्ध्या के बाद दूसरा प्रमुख कर्तव्य अपने शरीर की शुद्धि के साथ घर आदि की शुद्धि व वायु व जल की शुद्धि के लिए दैनिक अग्निहोत्र वा देवयज्ञ करना होता है। इसकी विधि भी ऋषि दयानन्द जी ने लिखकर हमें प्रदान की है। ऐसा करके हम अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। हमारे शरीर के निमित्त से वायु व जल आदि में जो प्रदुषण होता है, उस पाप से हम अग्निहोत्र यज्ञ करने से बचते हैं। हमारा तीसरा प्रमुख कर्तव्य अपने माता, पिता व आचार्यों सहित वृद्ध जनों के प्रति होता है। माता-पिता के कारण ही हमारा इस सृष्टि में जन्म होना सम्भव हुआ है। यदि हमारे माता-पिता हमें जन्म न देते व हमारे पालन में कष्ट व पीड़ायें सहन कर हमारा पालन न करते तो आज हमारे इस मनुष्य जीवन का अस्तित्व इस रूप में कदापि न होता। हमारा आज जो अस्तित्व है, उसका कारण हमारे माता-पिता की हमारे रक्षण, पोषण एवं ज्ञान प्राप्ति में की गई निःस्वार्थ सेवायें एवं कार्य हैं। इन्होंने हमारे पालन करने में अनेकानेक कष्ट सहे हैं। अतः हमारा कर्तव्य है कि हम भी इनकी सेवा करें। अन्न, भोजन, चिकित्सा व इनकी आज्ञा पालन से इन्हें सन्तुष्ट रखे। हमारे होते हुए इन्हें किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये। यदि हमारे माता-पिता हमारे आचारण व व्यवहार से पूर्ण सन्तुष्ट हैं तो हमारा जीवन सफल है अन्यथा हमारा जीवन सफल नहीं है। 
    
    माता-पिता की अन्न, जल, वस्त्र, औषधि आदि से सेवा व आज्ञापालन के साथ हमें अपनी बुद्धि का विकास भी करना है। इसके लिए हमें विद्वान आचार्यों की आवश्यकता होती है। हम गुरूकुल में पढ़े या स्कूल कालेजों में, वहां हम आचार्यों व गुरुओं के द्वारा शिक्षा व ज्ञान प्राप्त करते हैं। हमारी बोलचाल की भाषा भी आचार्यों की शिक्षा से परिष्कृत होती है। आचार्यों की शिक्षा से हमारी बुद्धि ज्ञान-सम्पन्न होती है। आचार्यों की शिक्षा से ही हम अध्यापक, आचार्य, विद्वान, उपदेशक, प्रचारक, डाक्टर, इंजीनियर, वाणिज्यिक कार्य, नेता, लिपिक, सेवक व अन्य कार्यों को करते हैं जिससे हमें धन व जीवन जीने के साधन प्राप्त होते हैं। आचार्यों का भी हम विद्यादान रूपी ऋण होता है। अतः हमें उनके प्रति भी आदर व सम्मान का भाव रखना है और साथ ही आवश्यकता पड़ने पर उनकी अपने माता-पिता के समान व उससे भी अधिक सेवा करनी है व आवश्यकता होने पर उनका पालन भी करना है। ऐसा करके हम माता-पिता व आचार्यों के ऋण से उऋण होते हैं और उनका ऋण उतरने, पाप न चढ़ने से हमारा इस जीवन के बाद पुनर्जन्म वर्तमान जन्म जैसा व इससे भी उत्तम होता है। आचार्यों के बाद विद्वान अतिथियों का सेवा सत्कार करना भी हमारा धर्म है। अतिथि वह होते हैं जो हमारे हित व उपकार के लिए भ्रमण करते हुए हमारे पास आते हैं। हमारे निवास पर ठहरते हैं। हमारी दिनचर्या व व्यवहार आदि के विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं तथा हमारा उचित मार्गदर्शन करते हैं। अतिथिगण प्रायः वृद्ध व अनुभवी होते हैं। उन्होंने हमसे अधिक जीवन जिया हुआ होता है। वह लालची नहीं होते और न ही अपरिग्रही होते हैं। उनको हम भोजन व वस्त्र आदि तो देते ही हैं परन्तु जो धन देते हैं वह भी वह परोपकार व दूसरों की शिक्षा, सेवा आदि में लगा देते हैं। इससे समाज व देश में ज्ञान व विज्ञान की वृद्धि होती है। समाज का उत्थान करना न केवल विद्वानों व सरकार का ही कर्तव्य है, अपितु सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। अतः एक प्रकार से विद्वान अतिथि हमारे ही कर्तव्य पालन में हमारा मार्गदर्शन एवं प्रेरणा कर रहे होते हैं। उनकी जितनी भी सहायता हम कर सकें, हमें करनी चाहिये। 
    
    हम यहां बलिवैश्वदेवयज्ञ की चर्चा करना भी चाहते हैं। परमात्मा ने प्रकृति व सृष्टि में पशु व पक्षी आदि अनेक योनियों में प्राणियों को बनाया है। इनके पास न हमारी जैसी बुद्धि है, न हाथ हैं और न ही बोलने के लिए भाषा है। वह फिर भी किसी प्रकार से हमारी हानि नहीं करते अपितु किसी न किसी प्रकार हमारे लिए सहायक ही होते हैं। अतः इनके जीवन निर्वाह में भी हमें उनका सहयोगी होना चाहिये। इनके भोजन, चारे व अन्न आदि की जितनी व जैसी भी व्यवस्था हम कर सकते हैं, हमें स्वयं व अन्यों की सहायता से करनी चाहिये। परजन्म में यदि किसी कारण हमारा इन्हीं पशुओं आदि की योनियों में जन्म हो गया तो कम से कम हमें भूखे नहीं मरना होगा। यदि हम शाकाहारी हैं और समाज को शाकाहारी बनाने का प्रचार करते हैं तो इससे हमें यह लाभ होगा कि पुनर्जन्म के बाद कोई मनुष्य भोजन के लिए हमारी हिंसा करके मांस नहीं खायेगा। पता नहीं जिन पशुओं का मांस खाया जाता है उन्होंने अपने पूर्वजन्म में कैसे कर्म किये थे, कहीं यह मांसाहारी व पशुओं के काटने वाले तो नहीं थे? इसी लिए इस पशुजन्म में उनको यह असह्य पीड़ा झेलनी पड़ रही है। यदि हम इस जन्म में बलिवैश्वदेवयज्ञ करते हैं तो पुनर्जन्म में हमें समाज में प्रचलित बलिवैश्वदेवयज्ञ की परम्परा के कारण भोजन आदि की प्राप्ति हो सकेगी। सभी अहिंसक पशु पक्षियों को भोजन कराना भी मनुष्यों का कर्तव्य है जिसे हमें करना चाहिये। 
    
    समाज व राष्ट्र के प्रति भी हमारे कर्तव्य होते हैं। ऋषि दयानन्द ने वेदों अर्थात् ईश्वरीय ज्ञान व शिक्षा के आधार पर आर्यसमाज का नौंवा नियम बनाया है जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक मनुष्य को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये। दसवां नियम है कि सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम पालने में सब स्वतन्त्र रहें। इन नियमों का पालन करेंगे तो समाज व देश का हित होगा और इससे हमारा समाज व देश उन्नति को प्राप्त होंगे। समाज टूटेगा नहीं अपितु मजबूत होगा। हम अशिक्षितों व निर्बलों पर उपकार करेंगे, उन्हें भोजन व सम्मान देंगे तो दलित व अगड़े-पिछड़ों की समस्या समाज में उत्पन्न नहीं होगी। समाज का क्षरण रुकेगा तथा धर्म व संस्कृति शक्तियुक्त होंगे। ऐसे अनेक कर्तव्य मनुष्यों के हैं। हमें वेदाध्ययन व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन कर अपने कर्तव्यों को जानना चाहिये और उनका पालन भी करना चाहिये। ऐसा करके हम देश व समाज सहित अपना भी भला करते हैं। परमात्मा वेदविहित कर्तव्यों को करने वाले मनुष्यों से सन्तुष्ट होता है और हमें सुख, समृद्धि व शान्ति देता है। अतः हमें वेद निर्दिष्ट कर्तव्यों का पालन करने वाला बनना चाहिये। इसी में हमारे जीवन की सार्थकता है
    मनमोहन आर्य
    मनमोहन आर्यhttps://www.pravakta.com/author/manmohanarya
    स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    12,262 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read