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    विश्व आर्थिक मंदी की आहट – 2023

    दुनिया आज भी 1929 में शुरू हुई और 1939 तक चली मंदी को भुली नहीं है। इसे महामंदी के नाम से भी जाना जाता है। इस दौरान दुनिया के अधिकतर हिस्सों में उत्पादन, आय, व्यापार और रोज़गार में भारी कमी आ गई थी, जिससे भारी संख्या में लोग भुखमरी और गरीबी का शिकार हो गये थे। इतना ही नहीं, उद्योग बंद होने से बड़े-बड़े उद्योगपति भी क़र्ज़ में डूब गए थे। आज भी जब देश की अर्थव्यवस्था चरमराने लगती है तो लोग महामंदी के उन काले दिनों को याद कर दहशत में आ जाते हैं। अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट होने को आर्थिक मंदी कहा जाता है। विकसित राष्ट्रों द्वारा किया जाने आयात और निर्यात पर अचानक टैक्स को बढ़ाना और घटाना आर्थिक मंदी का एक स्रोत है, इसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ता है। आर्थिक मंदी में वस्तुओं की खपत कम हो जाती है, जिससे उत्पादित माल की बिक्री नहीं हो पाती है। इसका विपरीत प्रभाव उत्पादित करने वाली कंपनियों पर पड़ता है। आर्थिक मंदी को इस प्रकार से समझा जा सकता है, जब लोगों के पास पैसे की कमी होती है, तो वह अपनी आवश्यकताओं को कम करने का प्रयास करते है। आवश्यकताओं को कम करने से उत्पादित माल की बिक्री नहीं हो पाती है। माल की बिक्री न होने से कम्पनी को लाभ कम होता है। कम्पनी अपने लाभ के अनुसार ही कर्मचारियों को रखना चाहेंगी, जिससे बड़ी- बड़ी कंपनियों में छटनी की जाती है, जिससे लाखों की संख्या में लोग बेरोजगार होते है। बेरोजगारी का असर उनके परिवार पर पड़ता है, जिससे वह अच्छा भोजन करने में असमर्थ होते है, इससे कुपोषण में वृद्धि होती है।

     आर्थिक मंदी का प्रमुख कारण धन का प्रवाह रुक जाना है। धन के प्रवाह से आशय है कि लोगों की खरीदने की क्षमता घट जाना है और इसलिए वह बचत भी कम कर पाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती है, जिससे महंगाई दर बढ़ जाती है और लोग अपनी आवश्यकता की चीजे नहीं खरीद पाते है। डॉलर के मुकाबले रुपये की घटती हुई कीमत भी इसका मुख्य कारण है। आयात के मुकाबले निर्यात में गिरावट होने से देश का राजकोषीय घाटा बढ़ जाता और विदेशी मुद्रा भंडार में कमी देखने को मिलती है। अमेरिका और चीन के बीच जारी ट्रेड वॉर की वजह से भी दुनिया में आर्थिक मंदी का खतरा तेजी से बढ़ रहा है, जिसका असर भारत पर भी हो रहा है। मंदी के समय निवेश कम हो जाता है क्योंकि लोगों की आय कम हो जाती है।

    आर्थिक मंदी का प्रभाव – आर्थिक मंदी से बेरोजगारी में वृद्धि होती है। लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा ही नहीं बचता है। आर्थिक विकास दर लगातार गिरती रहती है। औद्योगिक उत्पादन में गिरावट होती है। बचत और निवेश में कमी होती है। कर्ज की मांग घट जाती है।  महामंदी के कारणों और उसके प्रभावों पर चर्चा करने से पहले यह जानना ज़रूरी है कि, आर्थिक मंदी का अर्थ क्या होता है? दरअसल, आर्थिक मंदी अर्थव्यवस्था का एक कुचक्र है जिसमें फंसकर आर्थिक वृद्धि रुक जाती है और देश के विकास कार्यों में बाधा आ जाती है। इस दौरान बाज़ार में वस्तुओं की भरमार होती है लेकिन खरीदने वाला कोई नहीं होता है। उत्पादों की आपूर्ति अधिक व मांग कम होने से अर्थव्यवस्था असंतुलित हो जाती है।

    साल 1929 की वैश्विक महामंदी के कारण रहे-

      प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका और जापान में बड़े-बड़े कल कारखाने खोले गये थे। इन कारखानों में बड़ी मात्रा में उत्पादन होता था। इनमें युद्ध के दौरान जितनी वस्तुओं का निर्माण किया जाता था, उतनी ही वस्तुओं का निर्माण युद्ध के बाद भी जारी था। जिसका परिणाम यह हुआ कि, बाजा़र में वस्तुएं भरी पड़ी थीं लेकिन उन्हें खरीदने वाला कोई नहीं था। यह समस्या कृषि के क्षेत्र में सबसे ज़्यादा थी। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कृषि उपज के अति उत्पादन से अनाज की कीमतें बेहद निचले स्तर पर पहुंच गईं थी और किसानों की आय घट गई थी। अपनी आय के स्तर को बनाये रखने के लिये किसानों ने और अधिक उत्पादन करना शुरू कर दिया था। जिसके चलते ऐसी स्थिति आ गई थी कि बाज़ार में कृषि उपजों की आमद और बढ़ गई और कीमतें और भी कम हो गईं; लेकिन खरीदारों के न आने से अनाज पड़ा-पड़ा सड़ने लगा था।

    अमेरिकी शेयर बाज़ार में गिरावट- 23 अक्टूबर 1929 को न्यूयार्क-स्टॉक एक्सचेंज में शेयरों का मूल्य अचानक से 50 अरब डॉलर गिर गया था। अमेरिकी सरकार और पूँजीपतियों के प्रयास से स्थिति कुछ ठीक हुई लेकिन अगले महीने यानी नवंबर में फिर से शेयरों की कीमत बहुत घट गई थी। शेयर बाज़ार के इस तरह से धड़ाम होने पर बड़े-बड़े निवेशकों का दिवाला निकल गया था। इसके बाद अमेरिका में जो फैसले लिये गए उनका प्रभाव अन्य देशों पर भी बहुत गहरा पड़ा था।

    क़र्ज़ की समस्या- महामंदी का दूसरा कारण युद्धकालीन क़र्ज़ था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तत्कालीन यूरोपीय राष्ट्रों ने अमेरिका से बहुत बड़ी राशि क़र्ज़ के रूप में ली थी। यहाँ तक कि, ब्रिटेन जैसे शक्तिशाली देश भी अमेरिकी क़र्ज़ के बोझ तले दबे हुये थे। शुरुआत में अमेरिका युद्ध में शामिल नहीं हुआ था लेकिन वह अपने मित्रराष्ट्रों को लगातार क़र्ज़ दे रहा था। पर जब अमेरिकी उद्यमियों को संकट के संकेत मिले तो उनके होश उड़ गए और अमेरिका ने साल 1929 की शरद ऋतु में यह घोषणा कर दी कि अब वह किसी भी देश को क़र्ज़ नहीं देगा।

    यह भी जानना ज़रूरी है कि, वर्ष 1928 के पहले छह माह तक विदेशों में अमेरिका का क़र्जा़ एक अरब डॉलर था, जो कि साल भर के भीतर घटकर केवल चौथाई रह गया था। जो देश अमेरिकी क़र्जे़ पर अधिक निर्भर थे उन पर गहरा संकट मंडराने लगा था। साथ ही, पूरी दुनिया की क्रयशक्ति घट गई थी। इतना ही नहीं, अमेरिका की इस घोषणा से यूरोप के बड़े-बड़े बैंक धराशायी हो गये थे; ब्रिटेन समेत कई देशों की मुद्राओं की कीमतें बुरी तरह से गिर गईं थी; लैटिन अमेरिका एवं अन्य स्थानों पर कृषि उत्पादों और कच्चे मालों की कीमतों में भी कमी आ गई थी। दुनिया के अधिकांश देश इस महामंदी की चपेट में आ गये थे। बात करें औद्योगिक देशों की, तो अमेरिका को इस आर्थिक महामंदी की सबसे ज़्यादा मार झेलनी पड़ी थी। अमेरिका की अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से समृद्ध हो रही थी, उतनी ही तेजी से लुढ़क भी गई थी।

    मंदी के चलते अमेरिकी बैंकों ने घरेलू क़र्जे़ देना बंद कर दिया था और जो क़र्जे़ पहले दिये जा चुके थे,उनकी वसूली शुरू कर दी थी। लेकिन कीमतों में कमी के कारण किसान से लेकर उद्योगपति तक, सभी आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे और कई परिवार क़र्जे़ चुकाने में असमर्थ थे। ऐसे में उन परिवारों के मकानों और कारों समेत सभी ज़रूरी चीजें कुर्क कर ली गईं थी।

    हज़ारों बैंक क़र्जे़ वसूल न कर पाने, ग्राहकों की जमा पूंजी न लौटा पाने और निवेश की गई धनराशि में लाभ न मिलने पर दिवालिया हो गये थे और उन्हें बंद कर दिया गया था। इस प्रकार अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली भी ध्वस्त हो गई थी।  बड़ी संख्या में बैंक और कंपनियाँ बंद होने से तेजी से बेरोज़गारी बढ़ी और लोग काम की तलाश में दूर-दूर तक जाने लगे।

    दुनिया अभी 2020 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी भूली भी नहीं है कि फिर से 2023 में मंदी आने के ग्रह योग बन रहे हैं। इन्हीं ग्रह योगों को ध्यान में रखते हुए, या यूं कहिए कि 2023 में आने वाली विश्व आर्थिक मंदी के भय के चलते ही गूगल और मेटा, ट्विटटर जैसी बड़ी कंपनियों ने इससे निपटने को लेकर अभी से कॉस्‍ट कटिंग शुरू कर दी है। कुछ इसी प्रकार की विश्व आर्थिक मंदी 1991 में आई थी, जिस मंदी के दौरान भारत को अपना सोना गिरवी रखना पड़ा था। वर्ष 2023 में अमेरिका सहित कई देशों के मंदी की चपेट में आने की संभावनायें बन रही है। वर्ष 2023 में एक बार फिर से इसी प्रकार के ग्रह योग बन रहे हैं। विशेष रूप से अक्तूबर माह, 2023 में विश्व आर्थिक मंदी अपनी दस्तक दे सकती है, बल्कि ऊर्जा संकट, गैस संकट और पेट्रोल  और इंधन संकट भी इस समय में देखने में आ सकता है। इस मंदी से उबरने में करीब तीन वर्ष का समय लग सकता है। इस मध्य में बार बार आर्थिक मंदी की स्थिति बनती रह सकती है।

    इस वर्ष में केतु समस्याओं से निपटने की हिम्मत तो दे रहा हैं, परन्तु शनि का कुम्भ राशि में गोचर और वहां से उसका तीसरी दॄष्टि से मेष राशि में गोचर कर रहे गुरु पर प्रभाव के फलस्वरुप एक बार फिर से विश्व आर्थिक मंदी अपना कहर ढ़ा सकती है। गुरु ग्रह अर्थ है और शनि का गुरु को तीसरी दॄष्टि से देखना शुभ नहीं माना जाता है। 22 अप्रैल 2023 को गुरु मेष राशि में गोचर करने लगेंगे, और उन पर शनि का दॄष्टि प्रभाव आ जाएगा। इस ग्रह स्थिति का प्रभाव अप्रैल माह के बाद जल्द ही देखने में आ जाएगा। जब भी शनि-गुरु समसप्तक रहे हैं, तब तब की स्थिति विश्व के लिए बहुत कष्टकारी रही है। आने वाले समय को देखते हुए भारत को भी सावधान हो जाना चाहिए, और निवेशकों को सोच समझ कर निवेश करना चाहिए। 

    ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव
    ज्योतिष आचार्या रेखा कल्पदेव
    संपर्क : 8178677715, 9811598848 मैं एक वैदिक ज्योतिषी हूं. दिल्ली से हूं. और पिछले १५ वर्षों से ज्योतिष का कार्य कर रही हूं. कुंडली के माध्यम से भविष्यवाणियां करने में महारत रखती हूं. मेरे द्वारा लिखे गए धर्म, आध्यात्म और ज्योतिष आधारित आलेख देश-विदेश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में नित्य प्रकाशित होते है.

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