‘प्रवक्ता, प्रावदा, और प्रॉवोक’- संस्कृत स्रोत

विशेष : कुछ पाठक-मित्रों के अनुरोध पर, सुविधा के लिए, एक बिंदु लेकर ही, कुछ सौम्यता से, और सीमित विस्तार से ही, प्रस्तुति की है।

(१) ”प्रवक्ता, प्रावदा, और प्रॉवॉक” इन तीनों शब्दों को आप ने निश्चित ही सुना होगा। पहला शब्द तो अपने प्रिय प्रवक्ता का ही नाम, और नित्य परिचय का शब्द है। दूसरा ”प्रावदा” है, रशियन समाचार (News Agency) संस्था का नाम । और तीसरा अंग्रेज़ी का क्रियावाचक शब्द हैं।

प्रश्न : इन तीनों को एक साथ रखने में क्या उद्देश हो सकता है?

सोचिए कि, क्या, इन तीनों उदाहरणों में कोई समानता दिखाई देती है ?

(२) यहां पहला शब्द, ’प्रवक्ता’ एक शुद्ध संस्कृत, दूसरा ’रशियन’ और तीसरा ’अंग्रेज़ी’ है। ऐसे तीन अलग अलग भाषा के शब्दों को चुनकर साथ रखने में क्या उद्देश्य हो सकता है ?

(२अ) वैसे श्वान, युवान, मध्वान के बारे में संस्कृत सुभाषित भी है। सुभाषितकार प्रश्न पूछता है, वैयाकरणी पाणिनी ने इन तीनों असंबद्ध शब्दोंको एक ही वर्गमें कैसे, और क्यों डाला है? ठीक उसी प्रकारका प्रश्न है, कि लेखकने इन तीन अलग अलग भाषाके शब्दों को एक साथ रखकर क्या करने की ठानी है?

तो, निम्न परिच्छेदों में इस प्रश्नका उत्तर देनेका प्रयास मैं करूंगा, साथमें कुछ और सरल अंगेज़ी शब्दों के उदाहरण भी प्रस्तुत करूंगा।

(३) पहले तो यह जान ले, कि, इन तीनों शब्दों का पहला भाग, ”प्र” है। जो हमारी देववाणी संस्कृतका उपसर्ग (कुछ, शब्दों के पहले लगने वाला शब्दांश ) है। इसी उपसर्ग के आधार पर अनेक शब्दों को उपजाया जाता है।

अभी आप पूछेंगे, यह ”प्र” का उपसर्ग (जिसे अंग्रेज़ी में prefix कहा जाता है) किस भाँति संसार की तीन प्रमुख भाषाओं में (अपभ्रंशित होते होते) बदलते बदलते जा पहुंचा ? इस का उत्तर शायद काल की गर्त में कहीं छिपा हो, पता नहीं। आज इस कडी को जानने की कोई सर्वमान्य विधि नहीं दिखाई देती। पर इतना तो माना जाता है, कि जो तीन मूल भाषाएं मानी जाती है, वे हैं लातिनी, युनानी और संस्कृत। इस में संस्कृत इन तीनों में भी सबसे प्राचीन मानी जाती है। यह विधान, कुछ १० वर्ष पहले, प्रकाशित The True History and the Religion of India, A Concise Encyclopedia of Authentic Hinduism नामक पुस्तक के संदर्भ के आधारपर किया, जा सकता है। और संस्कृत के बदले हुए, अपभ्रंशित रूप संसारकी अन्य भारत-यूरोपीय या भारोपीय (Indo european) भाषाओं में मिल पाए हैं।

भारत की भी बहुसंख्य (लगभग सारी) भाषाएं पारिभाषिक शब्दावली संस्कृत से ही लेती है।

(४) अंग्रेजीका provoke का ’प्रो’ संस्कृत ’प्र’ से लिया गया है, और voke भी वाक् से ही लिया लगता है। वाक का संस्कृत अर्थ वाणी से संदर्भित है। पर provoke का आज कल का प्रचलित अर्थ है, उत्तेजित करना, यह अर्थका अल्पसा अपभ्रंश प्रतीत होता है। उसमें यदि यह कहा जाय, कि ”बोलने के लिए उत्तेजित करना, तो सारी बात सहज समझमें आती है।

जैसे उच्चारण का अपभ्रंश (बदलाव) होता है, वैसे ही, संस्कृतके अनेक शब्दोंका अर्थ-अपभ्रंश (अर्थ का बदलाव) भी हुआ है। इस के अनेक उदाहरण है, पर इस लेख की सीमा में, उन्हें समाना उचित नहीं लगता। उपसर्गों को, धातु (क्रिया) के, संज्ञाओं के, और विशेषणों के आगे जोड़ कर नए-नए शब्द उपजाने का अनुपम (संसार भर में किसी के पास इतना शुद्ध, शब्द रचना शास्त्र नहीं है, जो) शास्त्र हमारे पास है। अन्य भाषाओं को उधारी के बिना कोई उपाय नहीं। हमें क्वचित ही उधार लेने की आवश्यकता है। इस को आगे, अनुकूलता से, छोटे छोटे लेखों द्वारा लिखने का विचार है।

(५) अब प्रवक्ता का अर्थ भी आगे बढकर बोलना, विशेष रूप से प्रस्तुत करना, इत्यादि भी लिया जा सकता है।

प्र+वक्ता= प्रवक्ता, वैसे ही अंग्रेज़ी का प्रो+ वाक = प्रोवॉक, (उच्चारण भेद भाषा की प्रकृति के कारण भी हो सकता है)

’प्र’ इस उपसर्गके निम्न अर्थ होते हैं।

(क) प्र- very much (अर्थ -आधिक्य)—> जैसे प्रगाढ(अधिक गाढा, गहरा), प्रलंब (अधिक लंबा)।

(ख) प्र – on,(उपरी)–जैसे प्रभारी (उपरी भार निर्वाहक), प्रशासक (उपरी शासक)।

(ग) प्र- onwards, forth, या forward,( सामने की दिशामें,आगे या, आगे की दिशामें) –जैसे प्रचलन, प्रवहन, प्रवाह।

(घ) away,(दूर) –प्रस्थान (दूर स्थान निकलना), प्रवास (दूर वास)।

(च) excessive,(अतिशय, अत्यंत), प्रकोप (अति क्रोध), प्रबल (अतिशय बल), प्रशंसा (अति स्तुति)।

(छ) –great (बडा, महान) जैसे प्रबंध(बडा आयोजन), प्रकल्प (बडी योजना), प्रदीप(बडा दीप), ।

(झ) –पहले (Before) जैसे प्रशिक्षा,

(६) रशिया में उपयोग में लिया जाता ”प्रावदा” भी प्र+वद= प्रवद प्रतीत होता है। वद का अर्थ बोलना भी होता है। तो प्रवद का अर्थ भी हुआ आगे बढ के बोलना। यह तो प्रवक्ता भी अर्थ है। मुझे रशियन का तिलमात्र ज्ञान नहीं है, इस लिए यह एक ही उदाहरण रखता हूं। इस शब्दके अर्थ के विषय में, रशिया से मेरी युनिवर्सीटी में आए हुए, एक गणित के प्राध्यापक से मैं ने चर्चा की थी; उसी के आधार पर यह लिखा है।

(७) वैसे हमारी पारंपरिक समृद्ध संस्कृत भाषा में २२ उपसर्ग हैं। केवल एक ”प्र” उपसर्ग के विषय में ही इस लेख में हेतु पूर्वक लिखा गया है। उद्देश्य है, कि प्रवक्ता के पाठक पहले जाने, कि हमारी परंपरा की विश्व को देन क्या है। और परंपरा कितनी समृद्ध है। इस से एक आत्म गौरव जगेगा, तो हीनता ग्रंथि का स्थान एक गौरवमयी अनुभूति लेगी। हमारी मानसिक दासता में कुछ कमी आएगी। हम प्रगति (देखा, प्र+ग ति) के पथ पर आगे बढ पाएंगे।

विडंबना तो यह है, कि, जब हमारा एक पढा लिखा सुसंस्कृत(?) राज्य़पाल इसी संस्कृत को, जिस का विश्व की अनेक भाषाओ में योगदान हुआ है, ऐसी गौरवमयी भाषा को, एक बैल गाडी-युग की भाषा समझ बैठा? इसी से, व्यथित मन में प्रश्न उठता है, कि क्या हम ६३ वर्षों से वास्तव में स्वतंत्र है ? जिस स्वतंत्र देश का एक राज्यपाल, ज एक ब्राह्मण (इसमें कोई वर्ण भेद की बात नही।) परिवार में पैदा हुआ था, जिसे संस्कृत का कुछ त ो ज्ञान होना ही, चाहिए था, वह इतना अज्ञानी कैसे? और हम ६३ वर्षों से स्वतंत्र है? विश्व की सबसे बडी जनतंत्रवादी सत्ता है। राज्य पाल भी पढा लिखा है।

संस्कृत के विषय में जो अतुलनीय, चमत्कार से भरी हुयी संसार भर के श्रेष्ठ विद्वान,जो,किसी भी गंदी राजनीति से प्रेरित नहीं लगते, ऐसे विद्वानों की उक्तियां बहुत प्रेरणादायी है। उन्हे,आगे किसी लेख में उद्धृत करने का विचार है।

(८)अब, अंग्रेज़ीमें जो ’pro’gress का pro है, promote का pro है, provoke का pro है, proclaim का pro है, procure का pro है, profess का pro है, prograam का pro है, यह सारे हमारे ’प्र’गति, ’प्र’जा, ’प्र’जनन, ’प्र’स्थापन, प्रक्रम, ….. इत्यादि (पाठक और भी ढूंढ सकते हैं।)सारे शब्दोंके अग्रभाग का प्र हमारा ही है, यह उन्हों ने हम से उधार ले कर अंग्रेज़ी के शब्द रचे हैं।आज तक मेरे (वयक्तिक सीमित) अध्ययन में मुझे इस तर्क के विपरित कुछ मिला नहीं है। एन्साक्लोपेडिया में भी पढा हुआ स्मरण यही है।

एक ही उद्धरण दे कर समाप्त करूंगा। वह किसी पराए का नहीं लूंगा। अपने ही महर्षि योगी अरविंद का उद्धरण है।वे, कहते हैं–

”………संस्कृत अकेली ही (दूसरी तुलना नहीं), उज्ज्वलाति-उज्ज्वल है, पूर्णाति-पूर्ण है, आश्चर्यकारक रीतिसे पर्याप्त है, अनुपम (जिसकी कोई उपमा नहीं) साहित्यिक साधन है,….मानव मस्तिष्क का अद्भुत आविष्कार है …. साथ साथ गौरवदायिनी है, माधुर्य से छलकती भाषा है, लचिली है, बलवती है, असंदिग्ध रचना क्षमता वाली, और पूर्ण, गुंजन युक्त उच्चारण वाली है, और सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने की कà ��षमता रखने वाली.भाषा है।………………….”।

एक ऐसी भाषा हमें मिली हुयी है, जिसका ”इंडो युरोपियन ” गुटमें एक सदस्य के रूपमें होना, संसार भरके १८ भाषा परिवारों में इंडो-युरोपीय गुटको सभीसे अग्रिम और अधिकतम विकसित स्थान प्रदान करता है।

मेरे सीमित ज्ञान के आधार पर,मेरा दृढ मत है, कि, यह स्थान वास्तव में संस्कृत के उस गुट में होने के कारण ही संभव हो पाया है।संस्कृत नें सारे इंडो-युरोपीय भाषा परिवारको सिंचित किया है।

एक ओर कठिनतम भाषा जिसमें चित्र लिपि को सीखते सीखते जीवन बीतता है, वह चीनी है– (८ हजार चित्र सीखे बिना वहां कोई शिक्षित नहीं, और कुल चालीस -पचास हजार पर समाप्ति) — और दूसरी ओर हवाईयन जैसी भाषा जिसके केवल १८ उच्चार मे समाने वाले सारे अक्षर (शब्द) है। ह व इ अ ल ह इत्यादि। अंग्रेज़ीके भी तो १९ व्यंजन और ५ स्वर। बंधुओं जिस ढेरपर हम बैठे हैं वह हिरोंका ढेर है, कूडेका नहीं है।

ऐसा, शब्द रचना शास्त्र, एक पूर्ण विकसित रूप में हमारे पास है। जाने-माने निरपेक्ष (objective) विद्वान संस्कृत की प्रशंसा करते थकते नहीं है। हमारे शत्रुओं की ईर्ष्‍या का भी यह एक कारण है। पर हमारी बैलगाड़ी ?

8 thoughts on “‘प्रवक्ता, प्रावदा, और प्रॉवोक’- संस्कृत स्रोत

  1. संस्कृत सभी भाषाओँ की मूल है इसी भाषा के शब्द सांस्क्रतिक यात्रा करते हए देश देशांतर में पहुंचे हैं भारत का विश्व इतिहास पी एन ओके जी की पुस्तक में यह सब विस्तार से बताया गया है बीएस अध्ययन की भारतीय दृष्टि अपनाने की आवश्यकता है और इस पर तीव्रता से वैज्ञानिक विधि से कार्य करने की आवश्यकता है

    1. धन्यवाद वेद जी —पी. एन. ओक को मैं ने पढा है।
      भाषा वैज्ञानिकी विधि में प्रमाण, आपको (१) प्रत्यक्ष –(२) यास्क लिखित निरुक्त के स्थूल ३ नियमों के अनुसार देना चाहिए, जो अंतमें धातुओं पर पहुँच जाता है।(३)आप अनुमान से प्रारंभ कर सकते हैं, पर अनुमान ही पूर्ण प्रमाण नहीं मान सकते।
      अनुमान आप को दिशा दे सकता है।
      इसी लिए विशेषतः वैज्ञानिकी मण्डलियाँ पी. एन. ओक को स्वीकृति नहीं देती।
      क्या आप का शोध क्षेत्र भाषा वैज्ञानिकी का है?
      आप मेरे शब्द वृक्ष वाले आलेख देखने की कृपा करें।कुछ अधिक स्पष्टता होगी।

      पी. एन. ओक का, अपने दृष्टिकोण से भारत में गौरव जगाने के काम में योगदान नकारा नहीं जा सकता। अधिकतर सामान्य समाज को इससे अधिक समझ भी नहीं होती।

      मधुसूदन

  2. बहुत सुन्दर व् ज्ञानवर्धक लेख है जो हमारी गौरवशाली परम्परा की याद दिलाता है व् अस्म्धिग्ध रूप से भारतीय प्रभाव को रेखांकित करता है

  3. राजीव जी– हमारी युनिवर्सिटिका फॅकल्टि का डिन, अपने नाम की द्वार पर लगाई पट्टी देवनागरी में (और रोमन में) लगाता था(कुछ साल पहले दिवंगत हुआ)। उसने ६०-७० वाले दशकमें अहमदाबादमें मिलोंके प्रबंधनपर पी. एच. डी. की थी। भारतसे बहुत प्रभावित था। जैसे आप कहते हैं–कि,
    “सुखद आश्चर्य हुआ जब कुछ कार्मिक स्तर के बड़ी मशीनों को चलाने वाले लोगों के उपस्थित होने की वजह से मुझसे हिन्दी में बोलने को कहा गया”—
    कुछ अधिक कहूंगा। ऐसे विषय के व्याख्यान की सफलता के लिए,पारिभाषिक शब्दावली पर **शब्द रचना शास्त्र जानने वाले-और उसी विषय के विशेषज्ञ** ऐसे बहु संख्य व्यावसायिकों को लगाया जाए।*** यह शासन की ओरसे, और बहुत बडी और विस्तृत योजना बना के (critical path method) *निर्णायक पथ पद्धति* के उपयोगसे, होना चाहिए। पारिभाषिक शब्दावली की सीढी पार किए बिना महासत्तापद कठिन प्रतीत होता है। शासन को कौन बताए?

  4. सर्वश्री सुमित जी, विकास जी, और राजीव जी–आप सभी के विचारों से सहमति। आपकी प्रबुद्ध टिप्पणियों से ऊर्जा का अनुभव करता हूं। और मेरे त्यागी, समर्पित संस्कृत शिक्षकों को स्मरण करता हूं, जिनकी आदर्श पढाई के कारण, आज मैं कुछ लिख पाया। कितने कितने कंधो पर खडे होकर हम ऊंचा अनुभूत करते हैं।
    राजीवजी के शब्दों से —“हम सजग न हुए तो अगले कुछ वर्षों में हमारी भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं … संस्कृत से हिन्दी का परिवर्तन हमारी संस्कृति को जीवित रखता है किन्तु हिन्दी से अंग्रेज़ी का परिवर्तन ऐसा नहीं होगा, हमारी संस्कृति भी विलुप्त हो जायेगी …ऐसा ही अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी है.”—पूर्ण सहमति।
    बिना भाषा न देश न संस्कृति टिक सकती है।

  5. कल ही मैं एक उच्च तकनीकी विषय पर भारत में स्थित एक फ्रांसीसी कंपनी में प्रशिक्षण देने गया था. सुखद आश्चर्य हुआ जब कुछ कार्मिक स्तर के बड़ी मशीनों को चलाने वाले लोगों के उपस्थित होने की वजह से मुझसे हिन्दी में बोलने को कहा गया . . . बाद में विचार करने पर लगा कि देखो, यदि हम सजग न हुए तो अगले कुछ वर्षों में हमारी भाषाएं विलुप्त हो सकती हैं … संस्कृत से हिन्दी का परिवर्तन हमारी संस्कृति को जीवित रखता है किन्तु हिन्दी से अंग्रेज़ी का परिवर्तन ऐसा नहीं होगा, हमारी संस्कृति भी विलुप्त हो जायेगी …ऐसा ही अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी है.

  6. भाषा संकट के इस दौर में अपनी भाषा के प्रति सजग मधुसूदन जी को हार्दिक साधुवाद। संस्‍कृत शब्‍दों के दूसरी भाषा में विकास-क्रम पर मधुसूदन जी प्रकाश डालते रहें और हमारा ज्ञानवर्धन करते रहें, उनसे यही निवेदन।

  7. प्रो. मधुसूदन जी ने ‘प्रवक्‍ता’ शब्‍द को व्‍याख्‍यायित करते हुए ‘प्र’ उपसर्ग पर जिस तरह से प्रका‍श डाला है, उससे हमें देववाणी संस्‍कृत पर गर्व होता है। पता नहीं हमारे तथाकथित विद्वान भारत को कहां ले जाएंगे, यह सोचकर ही डर लगता है। देश के प्रतिष्ठित विश्‍वविद्यालय जवाहरलाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में उर्दू, अरबी और पर्सियन चालीस से पढ़ाया जा रहा है लेकिन संस्‍कृत की पढ़ाई वहां नहीं होती थी। बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि संस्‍कृत की पढ़ाई से सांप्रदायिकता और पोगापंथ को बढ़ावा मिलेगा। जबकि विश्‍व के प्रमुख विश्‍वविद्यालयों में संस्‍कृत की पढ़ाई होती है। धन्‍यवाद के पात्र हैं तत्‍कालीन एनडीए सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी, जिन्‍होंने संस्‍कृ‍त की पढ़ाई शुरू की। मधुसूदन जी से निवेदन कि भाषा विज्ञान पर निरंतर प्रकाश डालते रहें।

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