लेखक परिचय

गिरीश पंकज

गिरीश पंकज

सुप्रसिद्ध साहित्‍यकार गिरीशजी साहित्य अकादेमी, दिल्ली के सदस्य रहे हैं। वर्तमान में, रायपुर (छत्तीसगढ़) से निकलने वाली साहित्यिक पत्रिका 'सद्भावना दर्पण' के संपादक हैं।

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पुलिस विभाग की कुछ महान आत्माओं का अपना एक गीत है—”इस वर्दी में बड़े-बड़े गुण”. लाख सुखों का इक अड्डा है, आ भरती हो जा.. आ भरती हो जा”. उस दिन की बात है जब एक पुलिस वाला”देश भक्ति, जन सेवा”के लिये गंगाजल की कसम खा रहा था तो लोग चकरा गए. पुलिसवाला और गंगाजल की कसम ?

एक ने कहा -”एक तो पुलिस वाला गंगाजल या किसी भगवान् की कसम खाने से रहा और अगर खा भी लिया तो इसका साफ-साफ मतलब यही है कि वह सच से ‘चार सौ बीस’ किलोमीटर दूर।”

दूसरे ने कहा -”क्या अब पुलिस वालों में इतनी नैतिकता बची है, कि वे सच्ची कसम खाएँ ? गरीबों को सताएंगे, अमीरों से वसूली करेंगे. और जब पत्रकारों या नेताओं की ‘बत्ती’ पड़ेगी तो कसम खाएँगेकि हमने ऐसा नहीं किया. उनके लिए गंगाजल,महानदी और नाली के पानी में कोई फर्क नहीं होता।”

तीसरे ने पूछा -”यार, लोगबाग अपने-अपने भगवान, अल्लाह या गॉड की झूठी कसमें क्यों खाते है ?”

चौथे ने मुसकराते हुए जवाब दिया -”जिसे मालेमुफ्त खाने की आदत पड़ जाये, वही सबसे ज्यादा कसमें खाता है ताकि वर्दी या पद सलामत रहे। वर्दी न रही तो ‘दिलेबेरहम’ कैसे हो सकेगा? वर्दी है तो धौंस है, वरना दो कौड़ी के भी नहीं रहेंगे। चालाक लोग झूठी कसम खा कर कुर्सी बचा लेते हैं। सच बोल दें तो फुटपाथ पर आ जाएँ ।”

सभी लोग इस बात पर सहमत थे।

बात-बात पर अपनी करतूतों पर सफाई देने वाले कुछ पुलिस वाले मुफ्तखोरी का अंतरराष्ट्रीय शौक पाल लेते हैं । इसी तरह का एक शौक़ीन पुलिसवाला क्या-क्या नहीं खाता था फोकट में। सड़क से गुजरे तो उसकी भूख बढ़ जाया करती थी। फल का ठेला दिखे तो अंगूर उठा कर खा ले। ठेले वाला मन ही मन गाली देता है- ‘साले, तेरे बाप का ठेला है क्या’, लेकिन प्रकट में बोले- ‘सब कुछ तो आपका ही है, सर’।

चाय-ठेला देख कर चाय पी ले। फिर कुछ देर बाद आइसक्रीम भी माँग कर खा ले। सब उनको अपने बाप-दादों के ठेले और दुकानें लगती हैं। जहाँ जी किया, चले गए. माँग लिया: नहीं-नहीं छीन लिया कहना ज्यादा सही होगा। खाया-पीया और डकार ले कर आगे बढ़ गए। इसलिए नहीं कि पुलिसवाला कोई महान आत्मा है। वरन् इसलिए कि उसके तन पर खाकी वर्दी है। हाथ में डंडा है। इसीलिए वह शहर भर का पंडा है। खा-पीकर मुसटंडा है। यह वर्दी का फंडा है.यही हथकंडा उसके बढ़ाते हुए पेट का और उनके घर-बार, बाल-बच्चों का, बीवी और रखैलों का भाग्य विधाता है।

एक ने पूछा -”इस तरह से फ़ोकट का माल खानेवाले लोग आखिर जीते कैसे हैं ?”

दूसरे ने उत्तर दिया -”जी लेते हैं बेचारे…क्योंकि दुनिया में आये हैं तो जीना ही पड़ेगा.ऐसे लोगों के पास एक चीज का सर्वथा अभाव रहता है। वो चीज है आत्मा। आत्मा के बिना हर कोई चैन से जी लेता है. ऐसे लोग सम्मानित भी होते रहते हैं।”

तीसरे ने चट से कहा-”उदाहरण सामने है। रावणी-गोत्र के पुलिसवाले ने एक व्यक्ति का हाथ तोड़ दिया। लेकिन उस पर कार्रवाई तो दूर, अगले के नाम के आगे-पीछे श्री-जी भी लगाया जाता रहा। बाद में उसका प्रमोशन भी हो गया. क्या ये चोर-चोर मौसेरे भाई वाली फिक्सिंग का नतीजा है? इनको कुछ सबक सिखाया जाना चाहिए.”

चौथे ने कहा -”अरे यार, तुम तो ऐसी बातें करने लगे, गोया पुलिस व्यवस्था रूपी दुम ‘सीधीच्च’ हो जाएगी। श्वान की दुम और ‘वर्दी-चरित्तर’ के सीधे होने की कोई उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। हताशा-निराशा ही हाथ लगेगी भाया।”

तीसरा मौन हो गया। उसे लगा कि उसके यार-दोस्त ठीक ही बोल रहे हैं। आजादी के इतने वर्षों में ये नहीं सुधरे तो अब क्या सुधरेंगे। उल्टे मुँह में सुविधाओं का खून लग गया है। थाने मे बलात्कार तो जैसे इनका”नित्य’-कर्म”बन गया है. थाने का नाम होगा धरमजयगढ़. मगर वहां अधर्म की जय-जय करते रहेंगे.बलात्कार भी करेंगे और ऐसा आतंक फैलायेंगे कि पीड़ित औरत वर्दी का चेहरा भी पहचानने से इनकार कर देगी. वर्दी की आड़ में गरीबों का रक्तपान करके मच्छर-खटमलों को भी मात देने वाले, बहुत से पुलिस वाले न सुधरे हैं, न सुधरेंगे। इन पर चिंतन ही बेकार है।

एक ने सुझाव दिया -”लेकिन सरकार चाहे तो इन पुलिसवालों को ‘राइट’ कर सकती है। पुलिसवालों के अधिकारों में कटौती कर दी जानी चाहिए और जैसे ही पता चले कि पुलिस वाले ने किसी गरीब के हाथ-पैर तोड़े हैं, उसे तत्काल बर्खास्त कर देना चाहिए। ठीक है, एकदम से न करें। पहले निलंबित करें, फिर मामले की जाँच करें और जाँच में पुलिस का अधिकारी न रहे वरना वह तो यही रिपोर्ट देगा कि जिस व्यक्ति का हाथ या पैर टूटा था वह तो एक नंबर का अपराधी है। पुलिस वाले उसे पकडऩे दौड़ रहे थे कि वह छत से कूद पड़ा या गिर पड़ा और हाथ-पैर टूट गए।”

सबके सब अपने-अपने रास्ते चल दिए। ज्यादा मुखालफत ‘नाक के लिये खतरा’ यानी ‘खतरनाक’ भी हो सकती है. मैं भी अपनी बात यही रोकता हूँ, क्योंकि मुझे भी अपने हाथ-पैर नहीं तुड़वाने। लोग पुलिस को तो कुछ नहीं कहेंगे, मुझे ही गरियाएंगे कि कलम चलाते-चलाते हाथ लचक कर टूट गया होगा।

4 Responses to “व्यंग्य : इस खाकी वर्दी में बड़े-बड़े गुण…”

  1. shivraj

    आदरनीय संपादक जी, bahut achchha, आपने वोही लिखा है जो बोला जाता है sach kya है police jane ya us से pareshan hone वाले ya usko बनाने वाले. आप तो जानते ही है की jab 1857 के swadhinata संग्राम में अंग्रेजो को मुंह की खानी पड़ी तो १८६१ में उन्होंने अपना raj kayam rakhne के liye ek karele ka ped अर्थात police banaya जिसमे बड़े अधिकारी तो angrej hote the aur सिपाही देशी, एन सिपाहियों से काम लेने का एक ही तरीका था की enko gulami का एहसास करते रहा jaay और आवस्यकता पड़ने पर enhi से yahan के logo को pratadit karaya jay अर्थात police करेला ऊपर से neem चदा policing का तरीका punishment policing.वोही नीम चढ़ा करेला है hamari aaj की पुलिस. आप ही बताईये karele के ped पर tamatar कैसे lagege, आप है की tamatar की ummid kar rahe है. जो force to rule के liye banya gaya है woh to serve अर्थात सेवा कैसे करेगा. जिस पुलिस में welfare approach ही na हो वोह सम्वेदंसिल कैसे होगी. अंग्रेजी खून और बिरासत से चलने wali पुलिस kab देशी पुलिस banegi, कैसे banegi shayad ही kabhi kisi ne socha हो, gora sahab के aadesho पर mar mitne wala सिपाही देशी janata के sath kab और कैसे nyay kar payega, uski kya koi samasya है, वोह kitne ghante काम karta है वोह kahan rahta है uske rahne की kya byawastha है pariwar के sath kitna samay deta है, rajneeti की kya ummide है, aadi. ham bhi yahi mante है की jab rakshak ही bakshak हो jayega तो samaya होगी, uniform pahan kar koi niyam kanun tode thik nahi, uchit तो yahi hoga की ham apne desh की byawastha अर्थात loktantra के anurup people oriented पुलिस की rachna करे, use samvedanshil banayen, use jimmedar banaye, use tadnusar suvidhayen de. phir kuchh galat हो तो koi samjhouta nahi, uniform pahan kar galat karne wala dusre kanun todne walo से jyada gunahgar है. usi hisab से dand diya jay tabhi yeh uniformed force में sudhar hoga. haan hame yah bhi dhyan dena hoga की samj में जो bhi हो रहा है usse koi bhi system achhuta nahi rah payega, bina wardi pahan kar जो log bahut kuchh kar rahe है, unka kya hoga. bahut kuchh hona baaki है, hamari subhkamnayen है की hamare desh की पुलिस का aage aisa pradarshan na हो jaisa आपने लिखा है.
    shivraj, aligarh

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  2. Pramendra

    यह कटु सत्य ही है इसे लिये इएस देस मे ९०% पोलिसे बराशत्त है

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  3. मिहिरभोज

    व्यंग तो अच्छा है …श्रीमान हम भी दो चार हो चुके हैं इन सब चीजों से….पर कभी टेबल के उस तरफ भी जाकर देखा है हमने…भ्रष्ट पुलिस वाले कम हैं और व्यवस्था ज्यादा है….कितने दबावों मैं काम करते हैं ये लोग…पूरी दुनिया के मानवाधिकार हैं पुलिस वालों को छोङकर …जीवन भर चाहे वो पुलिस का सिपाही होगा या अफसर उनके काम के घंटे फिक्स नहीं होते…हर छुटभैया नेता उनकी फीत उतारता घूमता है…नेता उन्हें षड्यंत्रों का शिकार बनाते हैं और षड्यंत्रों मैं भागीदार भी…और फंसने पर मरता है पुलिस वाला और भी बहुत सी चीजें है….वो वेतन के लिए हडताल नहीं कर सकते…अपने ऊपर होने वाली ज्यादतियों का प्रतिकार नहीं कर सकते हैं…..इस खाकी वर्दी के नीचे ऐसे बहुत से राज छिपे हैं बंधु….पर हम भी एक ढर्रे पर सोचने के आदि हो चुके हैं…..क्यों कि हम लिख सकते हैं इसलिए हम पढरहें है ….लिखते रहो….

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