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    गणतंत्र के लक्ष्य की ओर बढ़ते कदम

    अरविंद जयतिलक

    26 जनवरी 1950 को भारत ने संसार को एक नए गणराज्य के गठन की सूचना दी। संविधान की भावना के अनुरुप ही भारत एक प्रभुतासंपन्न गणतंत्रात्मक धर्मनिरपेक्ष समाजवादी राज्य बना। देश में संविधान का शासन है और संसद सर्वोच्च है। देश की आजादी के उपरांत हमारा उद्देश्य एक शक्तिशाली, स्वतंत्र और जनतांत्रिक भारत का निर्माण करना था। ऐसा भारत जिसमें सभी नागरिकों को विकास और सेवा का समान अवसर मिले। ऐसा भारत जिसमें जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, आतंकवाद, नक्सलवाद, छुआछुत, हठधर्मिता और मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के लिए स्थान न हो। इसीलिए हमारे संविधानविदों ने संविधान गढ़ते वक्त दुनिया के बेहतरीन संविधानों से अच्छे प्रावधानों को ग्रहण किया। मसलन ब्रिटेन से संसदीय प्रणाली ग्रहण की। संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान से मौलिक अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय कनाडा के संविधान से भारत का राज्यों का संघ होना, आयरलैंड के संविधान से राज्य-नीति के निदेशक सिद्धांत, आस्टेªलिया के संविधान से समवर्ती सूची, जर्मनी के संविधान से राष्ट्रपति की संकटकालीन शक्तियों को स्रोत तथा दक्षिण अफ्रीका के संविधान से संवैधानिक संशोधन की प्रक्रिया जैसी महत्वपूर्ण बातें ग्रहण की। गौर करें तो भारतीय संविधान की यह सभी विशेषताएं भारतीय संविधान को उदारवादी और विकासवादी बनाती हैं। भारतीय संविधान भारत में सभी नागरिकों को ढ़ेरों अधिकार दे रखा है जिससे उन्हें अपने व्यक्तित्व को संवारने की आजादी मिली हुई है। भारतीय संविधान में जाति, धर्म, रंग, लिंग, कुल, गरीब व अमीर आदि के आधार सभी समान है। जनमत पर आधारित भारतीय संविधान ने संसदीय शासन प्रणाली में सभी वर्गों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान किया है। सत्ता प्राप्ति के लिए खुलकर प्रतियोगिता होती है और लोगों को चुनाव में वोट के द्वारा अयोग्य शासकों को हटाने का मौका मिलता है। भारतीय संविधान ने राज्य के लोगों की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप करने का अधिकार केंद्र या राज्य सरकारों को नहीं दिया है। संविधान के तहत राजनीतिक दल सभाओं, भाषणों, समाचारपत्रों, पत्रिकाओं तथा अन्य संचार माध्यमों से जनता को अपनी नीतियों और सिद्धांतों से अवगत कराते हैं। विरोधी दल संसद में मंत्रियों से प्रश्न पूछकर, कामरोको प्रस्ताव रखकर तथा वाद-विवाद द्वारा सरकार के भूलों को प्रकाश में लाते हैं। सरकार की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखते हुए उसकी नीतियों और कार्यों की आलोचना करते हैं। भारतीय संविधान के मुताबिक संघीय शासन की स्थापना के बावजूद भी प्रत्येक नागरिक को इकहरी या एकल नागरिकता प्राप्त है और इससे राष्ट्र की भावनात्मक एकता की पुष्टि होती है। भारत का प्रत्येक नागरिक चाहे वह देश के किसी भी भाग में रहे भारत का ही नागरिक है। यहां संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह राज्यों की कोई पृथक नागरिकता नहीं है। धर्म या भाषा पर आधारित सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी इच्छानुसार शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने तथा धन का प्रबंध करने का अधिकार है। संविधान ने सुनिश्चित किया है कि शिक्षण-संस्थाओं को सहायता देते समय राज्य किसी शिक्षण संस्था के साथ इस आधार पर भेदभाव नहीं करता है कि वह संस्था धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक वर्ग के प्रबंध में है। इसी तरह भारतीय नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार हासिल है। इस व्यवस्था ने भारतीय नागरिकों को शासन-प्रशासन से सीधे सवाल-जवाब करने की नई लोकतांत्रिक धारणा को जन्म दी है। इस व्यवस्था से सरकारी कामकाज में सुशासन, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ा है जिससे आर्थिक विकास को तीव्र करने, लोकतंत्र की गुणवत्ता बढ़ाने और भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने में मदद मिल रही है। सूचना के अधिकार से सत्ता की निरंकुशता पर भी अंकुश लगा है। भारतीय संविधान ने भारत के स्वरुप को एक मृदु राज्य में तब्दील कर दिया है। उसी का नतीजा है कि भारत के प्रत्येक राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोग का गठन हुआ है। इन आयोगों को विधिवत सुनवाई करने तथा दंड देने का अधिकार प्राप्त है। एक मृदृ राज्य के रुप में तब्दील हो जाने के कारण ही सत्ता का विकेंद्रीकरण और स्थानीय स्तर पर स्वशासन की व्यवस्था सुनिश्चित हुआ है। निश्चित रुप से मृदु राज्य के रुप में तब्दील होने से भारत का तीव्र गति से विकास हो रहा है और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता भी बनी हुई है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि मृदु राज्य की वजह से भारत ने अपने गणतंत्र के लक्ष्य को हासिल कर लिया है। एक वास्तविक गणतंत्र में अमीरी-गरीबी की खाई चैड़ी नहीं होनी चाहिए। लेकिन सच्चाई है कि देश में अभी भी करोड़ों लोग गरीबी, भूखमरी, कुपोषण के शिकार हैं। इससे कई तरह की सामाजिक-आर्थिक बुराइयों का जन्म हुआ है। इस स्थिति ने विकास के लक्ष्य को पूरी तरह हासिल करने में बाधा पैदा की है। दूसरी ओर राष्ट्र की एकता, अखण्डता और सुरक्षा प्रभावित हो रही है। इस स्थिति का लाभ उठाकर देश विरोधी तत्वों द्वारा देश में अशांति, असुरक्षा और संघर्ष का वातावरण निर्मित किया जा रहा है। अपनी जनता को सुरक्षा एवं निर्भयता सुनिश्चित करवाना, कानून को पुष्ट करना एवं ऐसे लोग जो इसमें बाधा उपस्थित कर रहे हैं उनसे सख्ती से निपटना एक गणतांत्रिक सरकार का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व होता है। अच्छी बात यह है कि देश की सरकारें इस कसौटी पर खरा हैं। लेकिन सच्चाई यह भी है कि आज अगर सरकारें देश में आधारभूत सुविधाओं को उपलब्ध करवाने के प्रयास में विफल है तो निसंदेह अन्य कारणों में एक महत्वपूर्ण कारण योजनाओं का जमीन पर सही ढंग से क्रियान्वयन न होना है। इसमें सुधार की जरुरत है। हमें इस बात की भी चिंता होनी चाहिए कि देश अभी भी आतंकवाद, नक्सलवाद, अलगाववाद, छद्म युद्ध, विद्रोह, विध्वंस, जासूसी गतिविधियों, साइबर क्राइम, मुद्रा-जालसाजी, कालाधन और हवाला जैसी चुनौतियों से मुक्त नहीं हो सका है। देश आज भी बाहर से प्रायोजित आतंरिक सुरक्षा के चुनौतियों का सामना कर रहा है और धन, संपत्ति व जान-माल की क्षति के रुप में इसका भारी मूल्य चुका रहा है। लेकिन अच्छी बात है कि देश की सेना और जवान सीमा से लेकर देश के भीतर जेहादी आतंकवाद से कड़ाई से निपट रहे हैं। सख्त कानून की वजह से आतंकवाद को कुचलने में कामयाबी मिली है। सांप्रदायिक राजनीतिक को देश की जनता ने किनारे लगा दिया है। अब पहले की तरह भ्रष्टाचारी कानून के शिकंजे से बचने में कामयाब नहीं हो रहे हैं। उन्हें कड़ी सजा मिल रही है। हां यह सच्चाई है कि अभी भी राजनीतिक व सामाजिक मोर्चे पर कई तरह की समस्याएं विद्यमान हैं जो गणतंत्र की राह की बाधा हैं। सच यह भी है कि गणतंत्र की स्थापना के सात दशक बाद भी देश के तमाम राजनीतिक दल सत्ता हासिल करने के लिए छद्म धर्मनिरपेक्षता की आड़ लेकर सामाजिक एकता को भंग करने की फिराक में हैं। यही नहीं वे अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए जहर उगल रहे हैं। व्यवस्था पर अनावश्यक दोष मढ़ रहे हैं। यह उचित नहीं है। उन्हें समझना होगा कि सियासत से बड़ा देश होता है। यहां ध्यान देना होगा कि देश में बच्चों, गरीबों और महिलाओं पर अत्याचार तो थमा है लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। ऐसे लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए जो इन्हें निशाना बना रहे हैं। उचित होगा कि अब सरकार जनसंख्यानीति की दिशा में आगे बढ़े। ऐसा इसलिए कि जनसंख्या वृद्धि कई तरह की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं का कारण बन रही है। अगर जनसंख्या पर नियंत्रण लगे तो बेरोजगारी, गरीबी, भूखमरी और अपराध जैसी गंभीर समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। देश को समान नागरिक संहिता की भी जरुरत है ताकि समाज में कानूनी तौर पर एकरुपता बनी रहे। अब वक्त आ गया है कि देश गणतंत्र के लक्ष्य की ओर कदम तेजी से बढ़ाए ताकि हम उसके पवित्र उद्देश्यों को आसानी से हासिल कर सकें।

    अरविंद जयतिलक
    अरविंद जयतिलकhttps://www.pravakta.com/author/arvindjaiteelak
    लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं और देश के प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर इनके लेख प्रकाशित होते रहते हैं।
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