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    निर्धन

    पसंद नहीं वर्षा के दिन
    नहीं भाती पूस की रात
    मिट्टी का घर है उसका
    निर्धनता है उसकी ज़ात

    श्रम की अग्नि में जब वह
    पिघलाता है कृशकाय तन
    तब उपार्जन कर पाता है
    अपने बच्चों के लिए भोजन

    उसकी छोटी-सी भूल पर भी
    उठ जाता सबका उस पर हाथ
    दर्शक सब उसकी व्यथा के
    नहीं देता कोई उसका साथ

    मुख से नहीं बताता है कभी
    हरेक बात अपने अंतर्मन की
    व्यथा समझना हो तो पढ़ लो
    भाषा उसके सजल नयन की

    ✍️ आलोक कौशिक

    आलोक कौशिक
    शिक्षा- स्नातकोत्तर (अंग्रेजी साहित्य) पेशा- पत्रकारिता एवं स्वतंत्र लेखन सम्पर्क सं.- 8292043472

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