लेखक परिचय

क्षेत्रपाल शर्मा

क्षेत्रपाल शर्मा

देश के समाचारपत्रों/पत्रिकाओं में शैक्षिक एवं साहित्यिक लेखन। आकाशवाणी मद्रास, पुणे, कोलकाता से कई आलेख प्रसारित।

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क्षेत्रपाल शर्मा

( श्री वार्ष्णेय कालेज ,अलीगढ में 23.12.2011 को मिलीटरी साइंस विभाग में सुभाष बोस और स्वतंत्रता संग्राम विषय पर व्याख्यान का संक्षेप )

बैरकपुर से चली सैनिक क्रांति विफ़ल हो चुकी थी . फ़िर भी अंदर ही अंदर आग भड़क रही थी .और तेवीस जनवरी अठारह्सो सतानवे को कटक में श्री नाम धन्य वकील जानकी नाथ बोस और प्रभावती देवी के घर नौवीं संतान के रूप में सुभाष का जन्म हुआ.इन्हें अच्छी शिक्षा दी गई और ये स्काटिश चर्च और प्रेसीडेन्सी कालेजकी शिक्षा के बाद आई.सी एस में पास हुए लेकिन देशप्रेम के कारण ये बीच में वह सेवा छोड़ आए और कांग्रेस में शामिल हुए. इनके गुरो श्री देश बन्धु चितरंजन दास थे. इनका मानना था कि नेता अपने बीच का हो, थोपा हुआ न हो . प्रमाण लोकप्रियता का यह है कि यह दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए लेकिन विचारों की पवित्रता के कारण इन्होंने त्यागपत्र दे दिया और एक अलग पार्टी बनाई.ये देश से निर्वासित भी हुए . और उन्हीं निर्वासितों की एक फ़ोज आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाई जिसने दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध लड़ा. सन पैंतालीस में ध्रुव राष्ट्र हार गए और नेताजी को एक युद्ध अपराधी घोषित किया गया लेकिन सन पैंतालीस अगस्त में इनके एअर क्रेश में मारे जाने की कथित जानकारी मिली .बांकपन इतना था कि ये इटली में मसोलिनी और जर्मनी में हिटलर से मिले और इनको जापान का समर्थन तो हासिल था ही.इनका मानना था कि सरकार एक मजबूत दल की हो . इनके वि्चारों को फ़ासी वाद माननाभारी भूल होगी ये मसोलिनी के स्तर के समाजवाद के पक्षधर थे.कांग्रेस के हरिपुर अधिवेशन में इनका घोष था कि अंग्रेज छह महीने में भारत छोड़ दें.क्या पता अगर वे कांग्रेस के साथ ही रहते तो देश और पहले ही आज़ाद हो चुका होता .ये फ़ोर्स के हिमायती थे.ये चाहते तो सुविधा भी भोग लेते लेकिन स्वार्थ से बड़ा इनके लिए परमार्थ था

श्री वार्ष्णेय कालेज ,एवं प्रोफ़ेसर सहदेव शर्माजी का आभार इस बात के लिए व्यक्त करते हुए कि एसा अवसर सुलभ कराया कि मैं इस सुन्दर कांड सरीखे पाठ में शामिल हो सका , मैंने यह रेखांकित किया कि हमारे मनीषी जो जीवन दर्शन दे गए हैं हम उन को मानें .हम इसराइल को क्यों देखें , जब कि वीर शिवाजी ने सबल दुश्मन के खिलाफ़ छापामार युद्ध किया.हर नागरिक एक सैनिक है . आठों पहर लड़े सो शूरा, आज जो महिलाओं के गले से सुबह शाम चेन छीनी जा रही है ( समाज के आपसी घटों के ह्रास का लक्षण )और पुलिस चोरी हो जाने पर पीड़ित से कए कि मामले पर संदेह है( तो यह नागरिक सुरक्षा का ह्रास है ),बाबू रिश्वत मागे ( यह परस्पर विश्वास का अभाव है), तो विचार करें कि इस तरह के दिनों के लिए हम आज़ादी चाह रहे थे.शायद नहीं .तो हम अनजान और बावरे बेखबर न रहेंजो बौरा डूबन डरा , रहा किनारे बैठ , समाज के आगे बढकर काम आएं.यह आप तभी कर पाएंगे जब नागरिकों के कर्म और संकल्प स्वस्छ होंगे. जब इनसे सामना (कौम्बेट) करने की युक्ति भी आपके पास होगी.जैसे आप अपनी गली में आए अन्जान व्यक्तियों पर सवाल करके उनका परिचय और मंतव्य जानें और निष्प्रयोज्य होने पर दुत्कारें. अन्याय होने पर रोकें आदि.गलत लोगों का तरीके से बहिष्कार करें.उनका महिमामंडन कदापि न करें

मैंने सुन्दर कांड के पाठ का और अक्रूर जी केश्री कृष्ण के बुलावे की ओर संकेत किया.

सुन्दर कांड इसलिए विशिष्ट है कि यह पता चल चुका कि सीताजी लंका में बंधक हैं और बाधा है तो समुद्र से है . जब उसको केवल भय दिखाया गया तो उसने यह राज उगला कि नल और नील से बांध बनवा लें , इस तरह शक्ति का दुरुपयोग भी नहीं किया और क्या बंदर और क्या गिलहरी सब के सहयोग से उद्दिष्ट प्राप्त किया .शक्ति का दुरुपयोग राक्षस वृत्ति के लोग करते हैं दूसरी तरफ़ मथुरा में मांबाप बंधक हैं और चाड़ूर जो राज्य द्वारा पोषित लड़ाका था वह नियम विरुद्ध वार करता था तो श्रीकृष्ण ने उसकी तरह ही उस पर वार किया जिससे वह दूसरों को मारता था .वैसा वार उसी पर किया .जन सामान्य का आतताइयों से परित्राण किया .इस तरह युक्तिपूर्वक काम आगे बढाया. राजनीतिक विश्लेषक एन्ड्रूज मोन्ट्गुमरी के अनुसार गांधीजी ने भी नेताजी का देशप्रेम अद्वितीय माना था .आज हम अमर जवान नेताजी के व्यक्तित्व से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण के काम में आगे आएं.अंत मैं मैं एक शेर के साथ विराम लूंगा

मंजिलें उनको मिलती हैं

जिनके सपनों में जान होती है

पंखों से कुछ नहीं होता

होसलो से उड़ान होती है

जय हिंद

One Response to “सैनिक (नागरिक) का कर्तव्य (धर्म) है कि युक्तिपूर्वक संकटों पर विजय पाए”

  1. dharmendra kumar gupta

    श्री क्षेत्रपाल शर्मा द्वारा लिखित आलेख -“सैनिक (नागरिक) का कर्तव्य (धर्म) है कि युक्तिपूर्वक संकटों पर विजय पाए” पढ़ा .इसे पढ़कर एक कहावत याद आती है- ‘अपना मन चंगा तो कठौती में गंगा’.वास्तव में यह मन की शुद्धता ही है जो कर्मों के अच्छे/बुरे के लिए जिम्मेदार है . व्यक्ति का मानसिक खाका एक दो दिन में तैयार नहीं होता. उसका विकास माहौल पर निर्भर करता है, जिन्हें हम संस्कार कहते हें. संस्कार से ही संस्कृति शब्द बना है. हमारे जातीय संस्कार यथा धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष जीवन प्रणाली का हिस्सा रहे हें.यह एक जीवंत लाइफ स्टाइल रही है. हमारे यंहां चरित्र निर्माण पर बल दिया गया है.इसी लिए प्राचीन काल में शिष्य गुरु के साथ जंगलों में राजशी सुखों से दूर शिक्षा ग्रहण करते थे . यह चरित्र निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा थी.अच्छे चरित्र वाला मनुष्य ही अच्छा सैनिक, नागरिक जो भी वह बनाना चाहे बन, सकता है.बुनियाद है उसूल. ,जो चरित्र का हिस्सा हें.उद्देश्य की पवित्रता महत्वपूर्ण है. यदि जायज संसाधन न हों तो उद्देश्य प्राप्ति के लिए किया गया हर उपाय जायज है. उद्देश्य की महानता अर्थवान है. -धर्मेन्द्र कुमार गुप्त इंदौर.

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