लेखक परिचय

सुरेश चिपलूनकर

सुरेश चिपलूनकर

लेखक चर्चित ब्‍लॉगर एवं सुप्रसिद्ध राष्‍ट्रवादी लेखक हैं।

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सुदर्शन प्रकरण ने फ़िर से इस बात को रेखांकित किया है कि या तो संघ का अपना खुद का टीवी चैनल और विभिन्न राज्यों में 8-10 अखबार होने चाहिये, या फ़िर वर्तमान उपलब्ध मीडियाई भेड़ियों को वक्त-वक्त पर “समयानुसार कभी हड्डी के टुकड़े और कभी लातों का प्रसाद” देते रहना चाहिये। संघ से जुड़े लोगों ने गत दिनों सुदर्शन मसले के मीडिया कवरेज को देखा ही होगा, एक भी चैनल या अखबार ने सोनिया के खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं कहा, किसी अखबार ने सोनिया से सम्बन्धित किसी भी पुराने मामले को नहीं खोदा… जिस तरह मुकेश अम्बानी के खिलाफ़ कुछ भी नकारात्मक प्रकाशित/प्रसारित नहीं किया जाता, उसी प्रकार सोनिया-राहुल के खिलाफ़ भी नहीं, ऐसा लगता है कि आसमान से उतरे देवदूत टाइप के लोग हैं ये… लेकिन ऐसा है नहीं, दरअसल इन्होंने मीडिया और सांसदों (अब विपक्ष भी) को ऐसा साध रखा है कि बाकी सभी के बारे में कुछ भी कहा (बल्कि बका भी) जा सकता है लेकिन “पवित्र परिवार” के विरुद्ध नहीं। जब जयललिता और दयानिधि मारन जैसों के अपने मालिकाना टीवी चैनल हो सकते हैं, तो संघ या भाजपा के हिन्दुत्व का झण्डा बुलन्द करने वाला कोई चैनल क्यों नहीं बनाया जा सकता? भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने कभी सोचा है इस बारे में?

मीडिया के अन्तर्सम्बन्धों और उसके हिन्दुत्व विरोधी मानसिकता के सम्बन्ध में एक पोस्ट लिखी थी “मीडिया हिन्दुत्व विरोधी क्यों है… इन रिश्तों से जानिये”,  इसी बात को आगे बढाते हुए एक अपुष्ट सूचना है (जिसकी पुष्टि मैं अपने पत्रकार मित्रों से चाहूंगा) – केरल की लोकप्रिय पत्रिका मलयाला मनोरमा के निदेशक थॉमस जैकब के पुत्र हैं अनूप जैकब, जिनकी पत्नी हैं मारिया सोहेल अब्बास। मारिया सोहेल अब्बास एक पाकिस्तानी नागरिक सोहेल अब्बास की पुत्री हैं, अब पूछिये कि सोहेल अब्बास कौन हैं? जी हाँ पाकिस्तानी खुफ़िया एजेंसी ISI के डिप्टी कमिश्नर, इनके परम मित्र हैं मिस्टर सलाहुद्दीन जो कि हाफ़िज़ सईद के आर्थिक मैनेजर हैं, तथा मारिया सोहेल अब्बास हाफ़िज़ सईद के दफ़्तर में काम कर चुकी हैं…। यदि यह सूचनाएं वाकई सच हैं तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि स्थिति कितनी गम्भीर है और हमारा मीडिया किस “द्रोहकाल” से गुज़र रहा है।

भाजपा नेताओं को यह भी सोचना चाहिये कि पिछले 10 साल में सोनिया ने इक्का-दुक्का “चहेते” पत्रकारों को मुश्किल से 2-3 इंटरव्यू दिये होंगे (स्वाभाविक है कि इसका कारण उनके बहुत “सीमित ज्ञान की कलई खुलने का खतरा” है), (राहुल बाबा का ज्ञान कितना है यह नीचे दिये गये वीडियो में देख सकते हैं…) राहुल बाबा भी प्रेस कांफ़्रेंस में उतना ही बोलते हैं जितना पढ़ाया जाता है (यानी इन दोनों की निगाह में मीडिया की औकात दो कौड़ी की भी नहीं है) फ़िर भी मीडिया इनके पक्ष में कसीदे क्यों काढ़ता रहता है… सोचा है कभी? लेकिन भाजपाईयों को आपस में लड़ने से फ़ुरसत मिले तब ना… और “हिन्दू” तो खैर कुम्भकर्ण हैं ही… उन्हें तो यह पता ही नहीं है कि इस्लामिक जेहादी और चर्च कैसे इनके पिछवाड़े में डण्डा कर रहे हैं, कहाँ तो एक समय पेशवा के सेनापतियों ने अफ़गानिस्तान के अटक तक अपना ध्वज लहराया था और अब हालत ये हो गई है कि कश्मीर, असम, उत्तर-पूर्व में नागालैण्ड, मिजोरम में आये दिन हिन्दू पिटते रहते हैं… केरल और पश्चिम बंगाल भी उसी राह पर हैं… लेकिन जब हिन्दुओं को घटनाएं और तथ्य देकर जगाने का प्रयास करो तो ये जागने से न सिर्फ़ इंकार कर देते हैं, बल्कि “सेकुलरिज़्म” का खोखला नारा लगाकर अपने हिन्दू भाईयों को ही गरियाते रहते हैं। पाखण्ड की इन्तेहा तो यह है कि एक घटिया से न्यूज़ चैनल पर किसी भीड़ द्वारा तोड़फ़ोड़ करना अथवा शिवसेना द्वारा शाहरुख खान का विरोध करना हो तो, सारे सियार एक स्वर में हुँआ-हुँआ करके “फ़ासिस्ट-फ़ासिस्ट-फ़ासिस्ट” का गला फ़ाड़ने लगते हैं, अब वे बतायें कि संघ कार्यालयों पर कांग्रेसियों के हमले फ़ासिस्टवाद नहीं तो और क्या है?

राहुल बाबा का सामान्य ज्ञान देखिये…  http://www.youtube.com/watch?v=gdZ3VpBX_sM

रही-सही कसर गैर-भाजपाई विपक्ष पूरी कर देता है। गैर-भाजपाई विपक्ष यानी प्रमुखतः वामपंथी और क्षेत्रीय दल… इन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कांग्रेस क्या कर रही है, क्यों एक ही परिवार के आसपास सत्ता घूमती रहती है, महाराष्ट्र का भ्रष्ट मुख्यमंत्री संवैधानिक रुप से अपना इस्तीफ़ा लेकर प्रधानमंत्री के पास न जाते हुए सोनिया के पास क्यों जाता है? करोड़ों (अब तो बहुत छोटा शब्द हो गया है) अरबों के घोटाले हो रहे हैं… लेकिन इस निकम्मे और सीमित जनाधार वाले गैर-भाजपाई विपक्ष का मुख्य काम है किस तरह भाजपा को रोका जाये, किस तरह हिन्दुत्व को गाली दी जाये, किस तरह नरेन्द्र मोदी के प्रति अपने “फ़्रस्ट्रेशन” को सार्वजनिक किया जाये। इस गैर-भाजपाई विपक्ष को एक भोंदू युवराज, प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार है लेकिन भाजपा का कोई व्यक्ति नहीं। इसी से इनकी प्राथमिकताएं पता चल जाती हैं। कलमाडी, चव्हाण और अब राजा, अरबों के घोटाले हुए… लेकिन कभी भी, किसी में भी सोनिया-राहुल का नाम नहीं आया, क्या इतने “भयानक” ईमानदार हैं दोनों? जब सभी प्रमुख फ़ाइलें और निर्णय सोनिया-राहुल की निगाह और स्वीकृति के बिना आगे बढ़ नहीं सकतीं तो कोई मूर्ख ही ऐसा सोच सकता है कि इन घोटालों में से “एक बड़ा हिस्सा” इनके खाते में न गया हो… लेकिन “मदर इंडिया” और “पप्पू” तरफ़ किसी ने उंगली उठाई तो वह देशद्रोही कहलायेगा।

कुछ और बातें हैं जो आये दिन सुनने-पढ़ने में आती हैं, परन्तु उनके बारे में सबूत या पुष्टि करना मुश्किल है, इनमें से कुछ अफ़वाहें भी हैं… लेकिन यह तो भाजपा का काम ही है कि ऐसी खबरों पर अपना खुफ़िया तन्त्र सक्रिय और विकसित करे ताकि कांग्रेस को घेरा जा सके, लेकिन भाजपा वाले ऐसा करते नहीं हैं, पता नहीं क्या बात है?

उदाहरण के तौर पर – जब कांग्रेसियों ने हजारों भारतीयों के हत्यारे वॉरेन एण्डरसन को छोड़ा, उसी के 6 माह बाद राजीव गाँधी की अमेरिका यात्रा के दौरान, आदिल शहरयार नामक व्यक्ति को अमेरिका में छोड़ा गया जो कि वहाँ हथियार तस्करी और फ़्राड के आरोपों में जेल में बन्द था। आदिल शहरयार कौन? जी हाँ… मोहम्मद यूनुस के सपूत। अब यह न पूछियेगा कि मोहम्मद यूनुस कौन हैं… मोहम्मद यूनुस वही एकमात्र शख्स हैं जो संजय गाँधी की अंत्येष्टि में फ़ूट-फ़ूटकर रो रहे थे, क्यों, मुझे तो पता नहीं? भाजपा के नेताओं को तो पता होगा, आज तक उन्होंने कुछ किया इस बारे में? क्या एण्डरसन की रिहाई के बदले में आदिल को छोड़ना एक गुप्त अदला-बदली सौदा था? और राजीव गाँधी को आदिल से क्या विशेष प्रेम था? क्योंकि जिस तरह से एण्डरसन के सामने मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री स्वागत में बिछे जा रहे थे, उससे तो यह खेल दिल्ली की सत्ता द्वारा ही खेला गया प्रतीत होता है।

इसी प्रकार संजय गाँधी एवं माधवराव सिंधिया दोनों की हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मृत्यु भी रहस्य की परतों में दबी हुई है, आये दिन इस सम्बन्ध में अफ़वाहें उड़ती रहती हैं कि सिंधिया के साथ उस फ़्लाइट में, मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी जाने वाले थे, लेकिन अन्तिम क्षणों में अचानक दोनों किसी काम के कारण साथ नहीं गये। माधवराव सिंधिया की सोनिया से दोस्ती लन्दन से ही थी, जो कि राजीव की शादी के बाद भी कायम रही… लेकिन राजेश पायलट के साथ-साथ कुमारमंगलम, राजशेखर रेड्डी और जीएमसी बालयोगी… सभी युवा, ऊर्जावान और कांग्रेस में “उच्च पद के दावेदार” नेताओं की दुर्घटना में मौत हुई… कैसा गजब का संयोग है, भले ही यह अफ़वाहें ही हों, लेकिन कभी भाजपाईयों ने इस दिशा में कुछ खोजबीन करने की कोशिश की? या कभी इस ओर उंगली उठाई भाजपाईयों ने?

एक बात और है जो कि अफ़वाह नहीं है, बल्कि दस्तावेजों में है, कि जिस वक्त सोनिया गाँधी (1974 में) इटली की नागरिक थीं, वह भारत की सरकारी कम्पनी ओरियंटल इंश्योरेंस की बीमा एजेण्ट भी थीं और प्रधानमंत्री कार्यालय में काम कर रहे अधिकारियों के बीमे दबाव देकर करवाती थीं, साथ ही वह इन्दिरा गाँधी के सरकारी आवास को अपने कार्यालय के पते के तौर पर दर्शाती थी, यह साफ़-साफ़ “फ़ेरा कानून” के उल्लंघन का मामला है (यानी एक तो विदेशी नागरिक, फ़िर भी भारतीय सरकारी कम्पनी में कार्यरत और ऊपर से प्रधानमंत्री निवास को अपना कार्यालय बताना… है किसी में इतना दम?) भाजपा वालों ने कभी इस मुद्दे को क्यों अखबारों में नहीं उठाया?

तात्पर्य यह है कि कांग्रेसी तो अपना “काम”(?) बखूबी कर रहे हैं, टीवी पर सिखों का हत्यारा जगदीश टाइटलर संघ को गरिया रहा था… हज़ारों मौतों से सने एंडरसन को देश से बाहर भगाने वाले लोग सुदर्शन के पुतले जला रहे थे… अरुंधती के देशद्रोही बयानों पर लेक्चर झाड़ने वाले लोग सुदर्शन को देशद्रोही बता रहे थे (मानो सोनिया ही देश हो)… IPL, गेहूं, कॉमनवेल्थ, आदर्श, 2G स्पेक्ट्रम जैसे महाघोटाले करने वाले भ्रष्ट और नीच लोग, RSS को देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे थे… तात्पर्य कि अपने “पैगम्बर” (उर्फ़ सोनिया माता) के कथित अपमान के मामले में कांग्रेसी अपना “असली चमचा रंग” दिखा रहे थे, परन्तु सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा के बड़े नेता क्या कर रहे थे? इतने राज्यों में सरकारें, लाखों कार्यकर्ताओं के होते हुए भी तत्काल “माफ़ी की मुद्रा” में क्यों आ गये? कहाँ गई वो रामजन्मभूमि आंदोलन वाली धार? क्या सत्ता की मलाई ने भाजपा नेताओं को भोथरा कर दिया है? लगता तो ऐसा ही है…

गोविन्दाचार्य जैसे वरिष्ठ सहित कई लोगों ने सुदर्शन जी को गलत ठहराया है, मेरे पिछले लेख में भी काफ़ी असहमतियाँ दर्शाई गईं, नैतिकता और सिद्धान्तों की दुहाईयाँ भी सुनी-पढ़ीं… परन्तु अभी भी मेरा व्यक्तिगत मत यही है कि सुदर्शन जी सही थे। खैर… मेरी औकात न होते हुए भी, अन्त में भाजपा नेताओं को सिर्फ़ एक क्षुद्र सी सलाह देना चाहूंगा कि, कांग्रेस के साथ किसी भी किस्म की रियायत नहीं बरतनी चाहिये, किसी किस्म के मधुर सम्बन्ध नहीं एवं सतत “शठे-शाठ्यम समाचरेत” की नीति का पालन हो…।

जैसा कि ऊपर मीडिया के अन्तर्सम्बन्धों के बारे में लिखा है… सच यही है कि भारत देश संक्रमण काल से गुज़र रहा है, “वोट आधारित सेकुलरिज़्म” की वजह से कई राज्यों में परिस्थितियाँ गम्भीर हो चुकी हैं, कई संदिग्ध कारणों की वजह से मीडिया हिन्दुत्व विरोधी हो चुका है… जबकि देश की 40% से अधिक जनसंख्या युवा हैं जिनमें “सच” जानने की भूख है… अब इन्हें कैसे “हैण्डल” करना है यह सोचना वरिष्ठों का काम है… हम तो सोये हुए हिन्दुओं को अपने लेखों के “अंकुश” से कोंच-कोंचकर जगाने का कार्य जब तक सम्भव होगा करते रहेंगे…

10 Responses to “सुदर्शन प्रकरण में मीडिया की भूमिका और भाजपा नेतृत्व की कमजोरियाँ…”

  1. कृष्ण कुमार सोनी (रामबाबू)

    सुरेश जी,
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने प्रचार माध्यमों (इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया) को अब तक ज्यादा महत्व नहीं दिया है,जिसके कारण संघ द्वारा किये जा रहे देश हित के कार्यों को पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया.
    एक तरफ तो नाटकीय तरीके अपनाकर राहुल गाँधी एक तगारी में धोड़ी सी मिटटी उठाकर फेंकता है तो सारे देश का मीडिया उसको मुख्य खबर बनाकर प्रचारित करता है.दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राष्ट्रीय आपदावों में बिना किसी भेदभाव के पीड़ितों की व्यापक सेवा व सहयता करता है तो देश के मीडिया तंत्र को न तो यह दीखता है नहीं वह दिखाने का प्रयास करता है.
    . राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने आरम्भ से लेकर अब तक राष्ट्रहित में व्यापक कार्य किये हैं,किन्तु इन सब कार्यों को व्यापक प्रचार न मिल पाने के कारण संघ के इन राष्ट्रहित एवं जनहित के कार्यों की जानकारी सभी को नहीं मिल पाती. मेरा मानना है की संघ को प्रचार माध्यमों को भी प्राथमिकता देनी चाहिए एवं प्रचार तंत्र को मजबूत करने के लिए स्वयं के टी.वी.चैनल व समाचार पत्र प्रारंभ करना चाहिए . संघ प्रचार माध्यमों का ज्यादा उपयोग कर जनजागरण, अपने उद्देश्यों में पूर्ण सफलता प्राप्त कर सकेगा

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    श्री सुरेश चिपलूनकर जी का यह आलेख बिचार -विमर्श के योग्य है …संघ को अपने अखवार निकलने चाहिए ….केबिल चेनल ओपरेट करना चाहिए ….इससे असहमति का प्रश्न ही नहीं है .
    एक बात तो सुरेश जी आपने अनजाने ही मान ली की भारत का मीडिया पवार और पैसे के सामने था -था -थैया करता रहता है .और ये बात सभी दौर की केन्द्रीय सरकारों पर लागू होती है .आजादी के ६४ सालों में से ५५ साल तो कांग्रेस ने राज किया .६-७ साल संघ सनुशंगियों ने किया …२-३ साल का शाशन मिली जुली मोर्च की सरकारों का रहा . तकनीकी विकाश और वैज्ञनिक प्रगति को वैश्विक सरमायेदारी ने क्रीत दास बना लिया …मीडिया में पूँजी लगाने वाले लोग किसी भी सरकार से कैसे टकरा सकते हैं ? वे देश भक्ति ,हिदुवाद या साम्यवाद के प्रति कोई व्यक्तिगत पूर्वाग्रह भले ही पाल लें किन्तु अपना विजनेस चलने के लिए मुनाफा जरुरी है और मुनाफे के लिए वह सत्ता मुखापेक्षी रहता है …सुरेश जी को पांचजन्य और आर्गेनिज़र से ही काम चलाना होगा .

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  3. keshav bhtli

    सुदर्शन जी ने कुछ भी गलत नहीं कहा था अगर कांग्रेस समझती है की सचाई कुछ और है तो बताए की सही क्या है .सचाई सामने आनी चाहिए .भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद कहना कांग्रेस को महंगा पर सकता है यह दोधारी तलवार है.हां बीजेपी को इन साडी बातों का जवाब दने के लिए अपने मीडिया सम्बन्ध सुधरने होंगे या अपना कोई समाचार पत्र और चैनल चलाना चाहिए ताकि अपना पक्ष रख सके

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  4. Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'

    आदरणीय श्री चिपलूनकरजी,

    मैंने आपके उक्त आलेख में से केवल निम्न पाँच पंक्तियाँ उठाई हैं।
    १-“इस गैर-भाजपाई विपक्ष को एक भोंदू युवराज, प्रधानमंत्री के रुप में स्वीकार है लेकिन भाजपा का कोई व्यक्ति नहीं।”
    २-अब हालत ये हो गई है कि कश्मीर, असम, उत्तर-पूर्व में नागालैण्ड, मिजोरम में आये दिन हिन्दू पिटते रहते हैं… केरल और पश्चिम बंगाल भी उसी राह पर हैं… लेकिन जब हिन्दुओं को घटनाएं और तथ्य देकर जगाने का प्रयास करो तो ये जागने से न सिर्फ़ इंकार कर देते हैं,
    ३-इतने राज्यों में सरकारें, लाखों कार्यकर्ताओं के होते हुए भी तत्काल “माफ़ी की मुद्रा” में क्यों आ गये? कहाँ गई वो रामजन्मभूमि आंदोलन वाली धार? क्या सत्ता की मलाई ने भाजपा नेताओं को भोथरा कर दिया है? लगता तो ऐसा ही है…
    ४-गोविन्दाचार्य जैसे वरिष्ठ सहित कई लोगों ने सुदर्शन जी को गलत ठहराया है,
    ५-कैसा गजब का संयोग है, भले ही यह अफ़वाहें ही हों, लेकिन कभी भाजपाईयों ने इस दिशा में कुछ खोजबीन करने की कोशिश की? या कभी इस ओर उंगली उठाई भाजपाईयों ने?
    =================================

    इनके अलावा भी अनेक पंक्तियाँ उठाई जा सकती थी, लेकिन मेरा इरादा केवल इतना सा है कि इन सब बातों से क्या आपको नहीं लगता कि कहीं न कहीं भाजपा या संघ या हिन्दुत्व के आन्दोलन में कोई ऐसी खामी जरूर है, जिसके कारण आपको स्वयं ऐसी बातें लिखने को विवश होना पडा है!

    आपने काँग्रेस पर हमला करने के लिये स्वयं ही अपुष्ट बतलाकर और अफवाह घोषित करके भी शाब्दिक हमला करने में कोई कमी नहीं छोडी।

    मुझे इस बात से व्यक्तिगत रूप से कोई फर्क नहीं पडता है, हाँ एक लेखक के नाते अवश्य मेरा ऐसा मत है कि किसी के भी विरोध में लिखने के लिये अफवाह और अपुष्ट बातों का सहारा लेना, विशेषकर आप जैसे ऊर्जावान और तथ्यों को आधार बनाकर, लिखने वाले लेखक के लिये शोभनीय नहीं है।

    मेरा यहाँ पर एक और भी सवाल है कि क्या हम कुछ ऐसा नहीं कर सकते, जिससे आपके अनुसार बतायी गयी सभी खामियों को दूर करके इस देश में ब्राह्मणशाही या मनुवाद पर आधारित नहीं, बल्कि भारतीय जरूरतों के अनुसार वास्तविक लोकतन्त्र कायम किया जा सके? जिसमें भारतीय संस्कृति की छाप हो?

    मेरा विनम्र मत है कि केवल हिन्दुत्व की बात करने से या धर्मनिरपेक्षता या विधर्मियों को गाली देने से यह कभी भी सम्भव नहीं होगा! हमें दूसरों की लकीर को छोटा करने के बजाय अपनी लकीर को लम्बा करने का सकारात्मक विचार क्यों बुरा लगता है?

    इतने बडे लक्ष्य की प्राप्ति के लिये, मेरे जैसे अनेक लोगों के मतानुसार सभी कमजोर भारतीयों को भी सभी क्षेत्रों में समान रूप से भागीदारी देने की बात को हृदय से स्वीकार करने में क्या बुराई है? आखिर न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना से देश और समाज का क्या बुरा होने वाला है? हो सके तो आप विचार करें! अन्यथा कोई बात नहीं, संवाद हमेशा कायम रहना चाहिये।
    शुभकामनाओं सहित।

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  5. Mayank Verma

    भाजपा और संघ को एक अत्याधुनिक पेशेवर मीडिया सेल (लगभग ५०० लोगो की ) की जरूरत है जो हर स्तर पर मीडिया को मेनेज कर सकें. जो कोई बहुत मुश्किल काम नहीं. लेकिन उसे बहुत वृहद स्तर पर काम करना होगा.
    अगर आप कांग्रेस के इस काम की रिसर्च करोगे तो पैरों तले जमीन खिसक जाएगी.

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  6. दिवस दिनेश गौड़

    Er. Diwas Dinesh Gaur

    आदरणीय सुरेश भाई … यकीनन यह एक कड़वा सच है, जिसे पढ़ते अथवा सुनते समय पीड़ा तो बहुत अधिक होती है| जब से मैंने होश संभाला है कांग्रेस पर तो कभी विश्वास रहा ही नहीं| अब तो धीरे धीरे बीजेपी नामक बाड़ भी देश रूपी खेत को खाए जा रही है| ऐसे में क्या किया जाए, किस पर भरोसा क्या जाए कुछ समझ नहीं आता|
    किन्तु फिर भी निराश होकर घर नहीं बैठ सकते| कुछ न कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा जिससे की यह राष्ट्र अपने खो रहे गौरव को बचा पाए|
    आपका प्रयास प्रशंसनीय है| आपके वचनों में सच्चाई है| राहुल गांधी का सामान्य ज्ञान तो आपने हमें दिखा दिया किन्तु देखना अब भी कई चमचे ऐसे आएँगे जिन्हें आपका यह लेख फासीवादी(?) हिन्दू समाज की सोच से प्रेरित दिखाई देगा| क्यों की जब तक ये लोग हिन्दुओं को दो चार गालियाँ न बक दें इनका रोटी पानी हज़म नहीं होता|
    आपके सफलतम प्रयास के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद|

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  7. रामदास सोनी

    रामदास सोनी

    श्री सुरेशजी,
    निश्चित तौर पर आज हिन्दु समाज स्वार्थी हो गया है। उसका परिवार, कारोबार, बीबी-बच्चे उसके लिए महफूज रहे सारा देश या धर्म जाये भाड़ में उसकी बला से। मैकाले प्रणीत शिक्षा के कारण एक तो हिन्दु समाज पहले ही आत्म विस्मृति के दौर से गुजर रहा है, रही-सही कसर नेहरू-गांधी परिवार के दरबारी भाटों ने पूरी कर दी है। सुदर्शनजी जैसा धीर-गंभीर व्यक्तित्व जिसने सारा जीवन भारत के पुनर्निमाण के कार्य में स्वाहा कर दिया। क्या जानता है भारत का मीडिया और भ्रष्ट कांग्रेसी कुनबा उनके बारें में। कांग्रेसी लोग तो सदा से खैर अव्वल दर्जे के चापलूस, धूर्त और मक्कार रहे है किंतु भारत के मीडिया के बारे में एक पत्रिका में एक बार छपा था कि भारत के मीडिया उद्योग से जुड़े लगभग सभी बड़े घराने आज चर्च के धन पर अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहे है और जब चर्च के धन से हमारा मीडिया चल रहा हो तो उससे हिन्दुत्व के पक्ष में लिखने की आशा करना तो बबूल के पेड़ पर आम की कल्पना करने जैसा है ना। आज भारत के सभी मीडिया चैनल और समाचार पत्रों में इस बात की होड़ लगी है कि अपने विदेशी आकाओं और मैडम एटोंनिया माइनो, बियेन्का, रॉल की स्तुति में कौन ज्यादा काशीदे निकाल सकता है। आज तक मुझे किसी समाचार पत्र या चैनल पर कभी यह समाचार देखने को नहीं मिला कि मीडिया एक तथ्यपरक रिपोर्ट दिखाए कि:-
    1- खण्डित भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का खानदान आखिर कौनसा था।
    2- लेडी माऊन्टबैटन के साथ किन शर्तो पर उन्होने भारत माता के अंग-भंग करने का प्रस्ताव स्वीकार किया था।
    3- जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुला में क्या सम्बंध था
    4- इन्दिरा गांधी द्वारा एक पारसी से विवाह किया गया या फिर एक मुसलमान से।
    5- सोनिया गांधी की वंशावली और उसका इतिहास क्या है।
    6- सोनिया द्वारा राजीव से विवाह करने की एवज में क्या राजीव को बपतिस्मा ग्रहण कर इसाई नही बनना पड़ा।
    7- इस अलौकिक खानदान में हर बार विवाह करने के बाद वैदिक रीति से पुनः शादी करने या करवाने का ढोंग क्यों रचा जाता रहा।
    8- भारत के जो मूर्धन्य पत्रकार आज सोनिया या उसके पवित्र खानदान की स्तुति कर रहे है क्या वे जानते है कि सोनिया के भारत में आगमन के पश्चात भारत में मिशनरी गतिविधियां कितनी बढ़ी है।
    जो व्यक्ति भारत की माटी से आज तक भावनात्मक रूप से न जुड़ा हो उसकी प्रशंसा में दिन -रात एक करना और भारत के नवनिर्माण में लगे युग-पुरूष को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करना अगर सही कार्य है तो पत्रकारिता की दुनिया में पीत पत्रकारिता और पाप जैसा कुछ भी नहीं है।

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  8. Himwant

    जब मिडिया हिन्दुत्व के विरुद्ध कोई गैरवाजिब स्टैण्ड लेता है तो उससे हिन्दुत्व को लाभ मिलता है। लोगो में हिन्दु भावनाए जाग्रत होती है। यह बात उन गधो को समझाने की जरुरत है। एक सिक्के के दो पहलु होते है। सभी क्रियाओ तथा घटनाओ के असर भी दोतरफा होते है।

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  9. Anil Sehgal

    सुदर्शन प्रकरण में मीडिया की भूमिका और भाजपा नेतृत्व की कमजोरियाँ…- by – सुरेश चिपलूनकर

    भाजपा नेतृत्व बने

    …………… A friend in need is a friend indeed ……………

    लम्बे रेस के घोड़े बनिए – दुख सुख के साथी

    – अनिल सहगल –

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