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    पीड़ा

    -बीनू भटनागर-

    poem

    पीड़ा के खोल कर द्वार,

    बहने दो अंसुवन की धार।

    धैर्य के जब खुल गये बांध,

    पीड़ा ही पीड़ा रैन विहान।

    पीड़ा तन की हो या मन की,

    सुध ना रहती किसीभी पलकी।

    पीड़ा सहने की शक्ति भी,

    पीड़ा ही लेकर आती है,

    पीड़ा बिना कहे आ जाती,

    जाने को है बहुत सताती।

    कैसे पीड़ा को अपनाये कोई,

    पीडा बहुत सही मैं रोई।

    पीड़ा से ध्यान हटे तो कैसे!

    पीड़ा जब धनीभूत  हो ऐसे!

    बीनू भटनागर
    बीनू भटनागर
    मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

    1 COMMENT

    1. आपकी यह कविता बहुत ही गहराई से आई है। बधाई। शुभकामनाएँ भी कि इस पीड़ा को दूर करने का सफ़ल उपाय मिले।

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