लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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railwaysप्रमोद भार्गव

भारतीय रेल विश्व का सबसे बड़ा व्यावसायिक प्रतिष्ठान है,लेकिन इस ढांचे को किसी भी स्तर पर विश्वस्तरीय नहीं माना जाता। गोया इसकी सरंचना को विश्वस्तरीय बनाने की दृष्टि से कोशिशें तेज जरूर हो गई हैं। सुविधा संपन्न तेज गति की प्रीमियम और बुलेट ट्रेनों की बुनियादी शुरूआत भी हो गई है। अब नई चुनौतियों के रूप में रेल यात्रा को आधिकारिक रूप से सुविधाजनक,सुरक्षित व यात्री फ्रेंडली बनाने पर जोर संभवतः 25 फरवरी को आने वाले रेल बजट में दिखाई देगा। स्टेशनों के आधुनिकीकरण की चुनौती भी नई चुनौतियों में शामिल है। किंतु इसका विपरीत पहलू यह भी हो सकता है कि इन सुविधाओं की कीमत यात्रियों से ही वसूली जाए ? इस नाते इस बजट में वरिष्ठ नागरिकों को वातानुकूलित डिब्बों में मिलने वाली छूट से वंचित किया जा सकता है। साथ ही यदि इस साल सांतवें वेतन आयोग की सिफारिशें रेलवे में लागू होती है तो रेलवे 32,000 करोड़ के इस अतिरिक्त बोझ की भरपाई के लिए यात्री किराए में 10 और मालभाड़े में 5 प्रतिशत तक की बढ़ोत्तरी हो सकती है। रेलवे 14 प्रतिशत किराया पिछले साल भी बढ़ा चुकी है। रेलवे को घाटे से उबारने के लिए सेवा-भाव से छुटकारे के उपाय भी दिखाई दे सकते हैं। नई चुनौतियों के अनुरूप रेलवे ढले,इस लक्ष्य में यह आशंका भी है कि कहीं आम आदमी ही नहीं,निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति की पहुंच से भी रेलवे की दूरी न बढ़ती चली जाए ?

देश में आज भी रेल सार्वजनिक छोटी व लंबी यात्रा का सबसे सस्ता माध्यम है। एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा का इससे सुगम दूसरा कोई माध्यम नहीं है। आर्थिक उदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद मध्यवर्गीय युवा आजीविका के लिए दूरांचलों में रोजगार करने को विवष हुआ है। इसलिए रेलों में आवाजाही के लिए भीड़ बढ़ने के साथ उच्चस्तरीय मांगें भी बढ़ी हैं। ऐसा इसलिए भी हुआ है,क्योंकि चीन व जापान समेत पूरी दुनिया में रेलवे में विस्तार,गति और सुविधाएं हैरतअंगेज हैं। इनकी तुलना में हम वाकई  पिछड़े हैं। बावजूद इस होड़ में हम शामिल होते हैं और केवल खास आदमी की जरूरतों का ख्याल बजट में रखते हैं तो आम आदमी को रेलवे से बहिष्कृत कर देने की शर्त पर ही संभव होगा। जबकि सुविधा और सुरक्षा की जरूरत आम आदमी को भी है।

आम आदमी रेल का टिकट ले भी ले तो उसे सीट की बात तो छोड़िए,ठीक से खड़े होने की जगह भी नसीब नहीं होती। इस आपूर्ति के लिए 4,500 डिब्बों की अतिरिक्त जरूरत है। जिससे हरेक रेल में अतिरिक्त डिब्बे जोड़े जा सकें। अतिरिक्त रेल लाइनें बिछाने के साथ इकहरी लाइनों का दोहरीकरण भी जरूरी है,जिससे रेलगाड़ियों की संख्या बढ़ाई जा सकें। इन बुनियादी सुविधाओं को जमीन पर उतारने की बजाय हमारे यहां अहमदाबाद से मुबंई बुलेट ट्रेन चलाने की बात पर कहीं ज्यादा जोर है। यात्री गाड़ियों को लेकर अकसर रोना रोया जाता है कि ये रेलें केवल आम आदमी की सुविधा एवं सेवा की दृष्टि से घाटे में चलाई जा रही हैं। नतीजतन इन्हें नियमित चलाने के लिए एक यात्री रेल पर दो मालगाड़ियां चलानी पड़ती हैं। इन गाड़ियों का घाटा बढ़ा’-चढ़ाकर इसलिए जताया जाता है,जिससे नई यात्री रेलें चलाने का दबाव न बनाया जाए। फिलहाल रेलवे के पास 60 हजार सवारी डिब्बे हैं,जिनमें करीब दो करोड़ तीस लाख मुसाफिर रोजाना सफर करते हैं। ये संख्या न्यूजीलैंड और आस्ट्रेलिया की आबादी के बराबर है। इनमें से वातानुकूलित डिब्बों में महज 2 फीसदी यात्रियों की आवाजजाही होती है। ऐसे में यह कैसे विश्वास कर लिया जाए की सामान्य शयनयान और डिब्बों में सफर करने वाले 98 फीसदी यात्रियों का घाटा 2 फीसदी कुलीन यात्री पूरा कर रहें हैं ? क्यों नहीं रेल बजट में सामान्य और विशेष डिब्बों से होने वाली आय और खर्च का लेखा-जोखा अलग से दिया जाता ? यहां गौरतलब यह भी हैं कि सामान्य सवारी और शयनयानों में क्षमता से कई गुना यात्री सफर करते हैं। इस आय को यदि वातानुकूलित यान की आय से जोड़ा जाए तो लगभग बराबर बैठती है। यही नहीं टिकट निरीक्षक लाचारी के मारे इन्हीं यात्रियों अवैध वसूली करते हैं। इस रिश्वतखोरी को रोकने के उपाय किसी रेल बजट में दिखाई नहीं देते ?

सवारी गाड़ियों को चलाने में यदि घाटा है भी तो उसकी भरपाई पास की सुविधा प्रतिबंधित करके की जानी चाहिए ? रेलवे में विशिष्ट व अति विशिष्ट लोगों को 28 प्रकार के निशुल्क और रियायती पास दिए जाते हैं। देश के सभी वरिष्ठ नागरिकों को खैरात में यात्रा के लिए 30 प्रतिशत की छूट लंबे समय से जारी है। यह छूट हर दर्जे के यात्री किराए में तो है ही,करोड़पतियों को भी मिल रही है। उन पेंशनधारियों को भी मिल रही है,जो बिना कुछ किए धरे 50-60 हजार रूपए बतौर पेंशन ले रहे हैं। किसलिए ? ये मुफ्त यात्री रेलवे पर बोझ होने के साथ घाटे का सबब भी बन रहे हैं। हालांकि अब रेलवे ने प्रथम श्रेणी के वातानुकूलित डिब्बों में इस छूट को बंद करने के संकेत दिए हैं। ऐसा होता है तो यह रेलवे के हित में होगा।

रेलवे सुरक्षा इंतजामों के प्रति  भी भेदभाव बरत रही है। रेलवे में 11,463 बिना चौकीदार के पार-पथ हैं। इन पर आए दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं। जनहानि के साथ बड़ी मात्रा में धनहानि भी होती है। अनेक रेलवे स्टेशनों पर एक से दूसरे प्लेटफाॅर्म पर आवागमन के लिए पैदल पार-पुल नहीं हैं। इससे जल्दबाजी में यात्री पटरियों से गुजरते हैं और रेल या मालगाड़ी की चपेट में आ जाते हैं। ये बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की बजाय रेलवे देश के प्रमुख स्टेशनों पर विद्युत स्वचलित सीढ़ियां ;एक्सेलेटरद्ध का जंजाल  बुनने में लगी है।  एक ऐक्सेलेटर की स्थापना में करोड़ों रूपय खर्च होते हैं और बड़ी मात्रा में बिजली की जरूरत पड़ती है। जबकि इतनी ही राशि में कम से 5 पार-पथों को मानव व बैरियर युक्त बनाया जा सकता है। इससे कम पढ़े-लिखे लोगों को बड़ी संख्या में रोजगार भी मिलेगा। हालांकि इन पथों के निर्माण में पिछले डेढ़ साल के भीतर तेजी आई है।

रेलवे के विकास से जुड़ा एक्सिस कैपिटल की ताजा अध्ययन रिपोर्ट आई है। ‘रेलवे 360 डिग्रीः एक्चुअली व्हाइट हैपेन‘ नामक इस अध्ययन रिपोर्ट में रेलवे का 2030 तक का रोडमैप तैयार किया गया है। इसके मुताबिक रेलवे को अब पहले की तरह चलाना संभव नहीं रह गया है। अब इसे नई चुनौतियों के अनुरूप ढलना होगा। इसके तहत रेलों की चाल बढ़ाना,रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण करना और यात्री सुविधाओं में जबरदस्त इजाफा करना शामिल है। चूंकि 2018-19 से 70 फीसदी मालगाड़ियां अलग से बनाए जा रहे ट्रेक पर चलने लग जाएंगी,जिसकी प्रबंधन की जबावदेही रेलवे की ही सहायक संस्था डीएफसीसीएल को सौंप दी जाएगी। मालगाड़ियों से होने वाली कमाई भी इसी संस्था के खाते में जमा होगी। ऐसा शायद इसलिए किया जा रहा है,जिससे माल और यात्रीगाड़ियों से होने वाले लाभ-हानि को अलग-अलग करके दर्शाया जा सके। साफ है,लेखे-जोखे की इस प्रक्रिया से यात्री गाड़ियां घाटे का सौदा दिखने लग जाएंगी और रेलवे को इस घाटे की भरपाई के लिए हर साल यात्री किराए में वृद्धि का बहाना मिल जाएगा।

रेलवे में एकमुष्त निजीकरण करने की बजाय टुकड़े-टुकड़े कई विभागों को निजी हाथों में सौंपने का सिलसिला शुरू हो गया है। जलपान,स्वच्छता,माल ढुलाई,निजी कोच खरीद जैसे 17 क्षेत्रों में 100 फीसदी एफडीआई की मंजूरी दी जा चुकी है। संकेतक प्रणाली के आधुनिकीकरण और रख-रखाव,लाॅजिस्टिक पार्क निर्माण,लोकोमोटिव और कोच के निर्माण से लेकर दु्रत गति की प्रीमीयम व बुलेट रेलों का ताना-बाना विदेशाी पूंजी निवेश और निजीकरण के बल पर ही बुना गया है। कालांतर में इसके परिणाम अच्छे दिखाई दे सकते हैं। इसी दिशा में अगली कड़ी के तहत राज्यों के सहयोग से रेल परियोजनाओं का विस्तार किया जाएगा। कैबीनेट ने इस फैसले को मंजूरी दे दी है। इस योजना के अनुसार प्रत्येक संयुक्त उद्यम में रेलवे और राज्य सरकार की ओर से 50-50 करोड़ रुपए की आरंभिक चुकता पूंजी का योगदान किया जाएगा। इस हिसाब से कुल 100 करोड़ का निवेष होगा। इस दृष्टि से सीमेंट,स्टील व ऊर्जा संयंत्रों के लिए कच्चे माल की ढुलाई के मकसद से रेल संपर्क बनाने में मदद मिलेगी। देश के सुदुर अचंलों में यात्री सेवाओं का विस्तार भी संभव हो सकेगा। नए बजट में इस बाबत कुछ परियोजनाओं की घोशणा संभावित हैं। बैंकों से रेल आरक्षण की सुविधा भी इस बजट में मिल सकती है। फिलहाल पायलट प्रोजेक्ट के रूप में रेलवे ने एक निजी बैंक के साथ करार भी किया है। रेलवे ग्रामीण क्षेत्रों में अपने आरक्षित टिकट बेचने के लिए डाकघरों को पहले ही अपने कुनबे में शामिल कर चुकी है।

निजीकरण के ये उपाय तत्काल तो ठीक लग रहे हैं,लेकिन कालांतर में ये बेरोजगारी का सबब बन सकते हैं। क्योंकि रेलवे में 1980 के पहले तक करीब 40 लाख कर्मचारी हुआ करते थे,जिनकी अब संख्या घटकर 13.5 लाख रह गई है। जबकि इस कालखंड में रेल व मालगाड़ियों की संख्या बढ़ी है और रेलवे संरचना का विस्तार हुआ है। ऐसे में छोटे कर्मचारियों की संख्या घटना एक बड़ा सवाल है ? ऐसे विषमतापूर्ण विकास को लेकर रेलवे से जुड़े श्रम संगठन लगातार विरोध जता रहे हैं,लेकिन आला अफसर कानों में अंगूली ठूंसे हुए हैं। बरहहाल रेलवे में आम आदमी से जुड़ी सुविधाओं को घाटे का सौदा बताकर खास आदमी को सुविधाएं उपलब्ध कराने का भेद-भाव नहीं होना चाहिए ?

 

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