‘स्वामी दयानन्द में गुरु विरजानन्द की विद्या और पं. अमरनाथ जोशी के अन्न का तेज दिखाई देता है: आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय’

मनमोहन कुमार आर्य,

श्री मद्दयानन्द ज्योतिर्मठ आर्ष गुरुकुल, पौन्धा-देहरादून आर्ष शिक्षा पद्धति पर संचालित देश और आर्यसमाज का महत्वपूर्ण गुरुकुल है। इस गुरुकुल की स्थापना 18 वर्ष पूर्व स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी ने की थी। इस गुरुकुल का आचार्य 22 वर्षीय नवयुवक श्री धनंजय आर्य जी को बनाया गया था जो गुरुकुल गौतमनगर के स्नातक थे। आज भी आचार्य धनंजय जी ही इस गुरुकुल के आचार्य व प्राचार्य हैं। आरम्भ में गुरुकुल में चार ब्रह्मचारी थे और आज लगभग 110 ब्रह्मचारी हैं। अनेक ब्रह्मचारी स्नातक बनकर गुरुकुल से जा चुके हैं और अनेक स्थानों पर प्रवक्ता, सरकारी अधिकारी व सेवक या फिर आर्य समाजों में पुरोहित हैं। गुरुकुल उत्तरोत्तर प्रगति पर है। एक झोपड़ी से आरम्भ किये गुरुकुल में इस समय भव्य भवन, छात्रावास, यज्ञशाला, सभागार, ब्रह्मचारियों के अध्ययन की कक्षायें, कुछ ऋषि भक्तों की कुटियायें आदि हैं। गुरुकुल की अपनी एक गोशाला भी हैं जहां अच्छी नस्लों की गाय हैं। जल, विद्युत, मोबाइल, इंटरनैट आदि सभी प्रकार की सुविधायें हैं। आज गुरुकुल तक पहुंचने के लिए अच्छी सड़क भी उपलब्ध है। अपने वाहन से सुगमता से गुरुकुल पहुंचा जा सकता है। इस वर्ष इस गुरुकुल के 8 ब्रह्मचारी स्नातक बने हैं। कुछ ब्रह्मचारी शोध उपाधि प्राप्त कर चुके हैं और कुछ शोध कार्य में संलग्न हैं। यह गुरुकुल ऊंचे ऊंचे वृक्षों से आच्छादित वन के बीच में स्थित है। एक ओर एक सूखी नदी भी है जो वर्षा ऋतु में जल से भर कर बहती है। गुरुकुल का वार्षिकोत्सव प्रत्येक वर्ष जून के प्रथम रविवार व उससे पूर्व के दो दिन मिलाकर तीन दिन का मनाया जाता है। आर्यजगत के चोटी के विद्वान, भजनोपदेशक और पुस्तक विक्रेता, राजनेता व सेवानिवृत अधिकारी व ऋषि भक्त यहां आते हैं।

इस वर्ष उत्सव 1 से 3 जून, 2018 तक आयोजित किया जिसका सफल समापन 3 जून, 2018 को हुआ। समापन दिवस पर आज प्रातः ऋग्वेद पारायण यज्ञ हुआ और इसकी पूर्णाहुति लगभग 9.30 बजे सम्पन्न हुई। यज्ञ आर्य विद्वान डा. सोमदेव शास्त्री के ब्रह्मत्व मे ंहुआ जिसमें मंत्रोच्चार गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने किया। यज्ञ के बाद 10.00 बजे से समापन सत्र का आरम्भ हुआ जो अपरान्ह 1.30 बजे समाप्त हुआ। इसके बाद गुरुकुल के ब्रह्मचारियों ने व्यायाम, जुडो-कराटे आदि नाना प्रकार के लगभग असम्भव व कठिन करतब दिखाये। इस प्रस्तुति को देने के लिए ब्रह्मचारी विगत कुछ वर्षों से अभ्यास कर रहे थे। प्रातः 10.00 बजे आर्यसमाज के प्रसिद्ध भजनोदेशक श्री सत्यपाल सरल जी के भजन हुए। उन्होंने कुल तीन भजन गाये। व्याख्यान वेदी पर आज आर्यसमाज के 90 वर्षीय प्रसिद्ध भजनोपदेशक पं. ओम् प्रकाश वम्र्मा जी भी उपस्थित थे। उन्होंने एक भजन की कुछ पंक्तियां प्रस्तुत कीं। श्री वम्र्मा जी ने कहा कि अब मैं बूढ़ा हो गया हूं। युवावस्था में मैं सुन्दर था। स्वामी भीष्म जी आर्यसमाज के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने 100 वर्ष से अधिक आयु प्राप्त की। एक बार उन्होंने मुझे देखकर कहा था कि सुन्दर तो वह भी हैं परन्तु मेरी सुन्दरता उनसे अधिक है। वम्र्मा जी ने कहा इस गुरुकुल से मेरा सम्बन्ध इसकी स्थापना के समय से ही है। उन्होंने बताया कि पाणिनी कन्या गुरुकुल, वाराणसी और गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली का मैं आरम्भ से ही सहयोग करता कराता रहा हूं। मेरा गला ठीक है। आज इसकी परीक्षा के लिए मैं गीत प्रस्तुत कर रहा हूं। वम्र्मा जी ने कहा कि आर्यसमाज में आकर विद्वानों के विचार सुनकर और आर्यसमाज का साहित्य पढ़कर आत्मा को आनन्द आता है। उन्होंने यह भी कहा कि आर्यसमाज के सभी कार्यक्रमों में केवल आर्यसमाजी लोग ही आते हैं, दूसरे पौराणिक व अन्य लोग नहीं आते। वम्र्मा जी ने एक भजन की कुछ पंक्तियां गाकर सुनाई। बोल थे ‘आर्यों तुमको तड़फना और तड़फाना भी है, आर्य बनना ही नहीं और आग बरसाना भी है।।’ इसके बाद उन्होंने कुछ और शब्द कहे जो इस प्रकार थे ‘महर्षि ने की खिजमत अपने प्यारे देश की।’ पं. लेखराम जी को स्मरण कर उन्होंने कहा ‘सारे शहीदों में ऊंचा है नाम पं. लेखराम का। तेरी लगन निराली थी जैसी कहीं किसी में देखी न थी। बिछ़डों को मिलाने के लिए तूने जीवन खपा दिया।। लड़का तेरा बीमार था शुद्धि को तू तैयार था। मरने का पहुंचा तार था। पढ़कर के तार तूने यूं कहा, लड़का मरा तो क्या हुआ, दुनिया का ये तो है सिलसिला।।’ इसके बाद वम्र्मा जी ने कहा कि ‘सिर्फ सुनना ही नहीं है पैगाम तुमको वेद का, तुमको पैगाम वेद का दुनियां में फैलाना भी है।।’ 90 वर्ष की आयु और शरीर की जीर्णता में वम्र्मा जी ने जिस जोश से अपनी बातें कहीं, वह उनकी ईश्वर, वेद और ऋषि भक्ति का प्रमाण है।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने अपना व्याख्यान आरम्भ करते हुए कहा कि पौन्धा की धरती का कोई पुण्य रहा होगा तभी स्वामी प्रणवानन्द जी ने यहां पहुंच कर गुरुकुल का पौधा लगाया और उसे स्वयं व धनंजय के द्वारा सींच रहे हैं। उन्होंने कहा कि विद्या की प्राप्ति के लिए स्वामी दयानन्द ने मथुरा में गुरु विरजानन्द की कुटिया में प्रवेश किया था। दयानन्द जी की बातें सुनकर स्वामी विरजानन्द जी बोले थे कि मेरे पास तुम्हारे लिए रोटी का प्रबन्ध नहीं है। तुम पहले रोटी का प्रबन्ध कर लो। यदि हो जाये तो अध्ययन करने आ जाना। स्वामी दयानन्द सोचते हैं कि भोजन का प्रबन्ध कैसे हो? श्रोत्रिय जी ने मथुरा निवासी पं. अमरनाथ जोशी का उल्लेख किया। जोशी जी को इस बात का पता चला तो उन्होंने स्वामी दयानन्द को कहा कि तुम भोजन की चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारे भोजन का प्रबन्ध करुंगा। आर्य विद्वान श्री श्रोत्रिय जी ने कहा कि पं. अमरनाथ जोशी जी को जब कभी कहीं जाना होता था तो वह स्वामी दयानन्द जी को भोजन कराकर जाते थे। स्वामी दयानन्द जी जोशी जी के उपकार को मानते हैं। यदि जोशी जी स्वामी जी को न मिलते तो उन्हें स्वामी विरजानन्द जी से पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त न होता। श्रोत्रिय जी ने भाव विह्वल होकर तीव्र स्वर में कहा कि हे दयानन्द! तेरे जीवन में विद्या का जो तेज नजर आता है, उसमें स्वामी विरजानन्द जी द्वारा किया गया विद्यादान तो मुख्य है ही पर इसके साथ तुम्हारे उस तेज में पं. अमरनाथ जोशी के अन्न का तेज भी दिखाई देता है।

शीर्ष वैदिक विद्वान एवं प्रभावशाली वक्ता पं. वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि दान केवल विद्या का ही होता है और किसी का होता नहीं है। गुरुकुलों में भवन निर्माण व अन्य कार्यों के लिए दिये जैने वाले पैसे को इसलिए दान कहा जाता है वहां ब्रह्मचारी बैठकर वेद पढ़ता है। गो दान इस लिए दान है कि गुरुकुल का ब्रह्मचारी विद्या अर्जित करने में गोदुग्ध व घृत आदि से शारीरिक बल व शक्ति प्राप्त करता है। श्रोत्रिय जी ने कहा कि यदि गुरुकुल का ब्रह्मचारी कहीं जाकर वेद-वेदांग पढ़ाता है तो मैं कहूंगा कि यह तेज आचार्य धनंजय और गुरुकुल में अध्ययन कराने वाले अन्य आचार्यों का है। श्रोत्रिय जी ने एक बार जमशेदपुर जाते हुए रेल में शकंराचार्य स्वामी निरंजनदेव तीर्थ के साथ हुए अपने वार्तालाप को भी प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि मैंने शंकराचार्य से पूछा था कि शास्त्र का क्या महत्व है? उन्होंने कहा था कि यह प्रदीप वा दीये के समान हैं। आचार्यजी ने कहा कि मैंने युक्तियों से शंकराचार्य जी की बात का प्रतिवाद कर प्रमाणों को प्रस्तुत कर कहा कि वेद शास्त्र प्रदीप के समान नहीं अपितु सूर्य के समान है। विद्वान श्रोत्रिय जी ने कहा कि सूर्य सारे ब्रह्माण्ड में चमकता है। वह स्वयं को भी प्रकाशित करता है और संसार को भी प्रकाशित करता है। वेद भी ज्ञान से परिपूर्ण समस्त संसार को अपने ज्ञान से प्रकाशित करता है।

ऋषि भक्त पं. वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि ऋषि दयानन्द जी ने विष पीया, स्वामी शंकराचार्य, मीरा, और सुकरात ने भी विषपान किया था। विष पीकर यह सब अमर हो गये। उन्होंने भावों में भरकर कहा कि शंकर ने तो एक बार ही विष पीया परन्तु मेरे ऋषि दयानंद ने तो 17 बार विष पिया था। क्या ऋषि दयानन्द अमर नहीं हुए? श्रोत्रिय जी ने गौरव से भर कर कहा कि स्वामी दयानन्द ने अमरता को दासी बनाकर रख लिया था। वह जब तक जीवित रहे अमर बन कर वसुन्धरा पर विचरण करते रहे। आचार्य वेदप्रकाश जी ने कहा कि शंकर ने एक बार विष पीया था, वह शंकर नाम धारी थे परन्तु स्वामी दयानन्द ने 17 बार विष पीकर स्वयं को मूल शंकर सिद्ध किया। 17 बार विष पीने वाले मूलशंकर स्वामी दयानन्द विश्व में अपना उदाहरण स्वयं हैं। दूसरा उदाहरण कहीं मिलता नहीं है। श्रोत्रिय जी ने कहा कि मूल शंकर ने मूल वेद को पकड़कर उसका भाष्य किया और वेदों पर पड़े सभी आवरणों को हटाकर वेदों को सच्चे ज्ञान व विज्ञान का ग्रन्थ सिद्ध किया। श्रोत्रिय जी ने गुरुकुल पौंधा के ब्रह्मचारियों से आशा की कि वह दयानन्द जी के समान बनने का प्रयास करेंगे।

आर्य विद्वान श्रोत्रिय जी ने कहा कि कुम्हार दीया बनाता है। वह पशुओं व हजारों मनुष्यों द्वारा रोंदी गई मिट्टी को खोदकर अपने घर लाता है। उसे कूटता पीसता है और उसे बारीक कणों में परिवर्तित करता है। इस मिट्टी को जल से भिगोकर उसे रेशेदार बनाता है और उसके बाद उस मिट्टी से दीया बनाता है। अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि दीये ने ऊपर की दिशा में बढ़ने का व्रत लिया हुआ है। उन्होंने धनवानों की चर्चा की और कहा कि वह दिखाते हैं कि हम धनवान है, हममें धन की शक्ति है। उन्होंने धनवानों को दीये से प्रेरणा ग्रहण करने को कहा। धनवान की दीये से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि दीया, तेल व बाती मिलकर अन्धकार दूर करने के लिए तत्पर रहते हैं। कहीं अन्धेरा हो तो कोई पथिक आकर उस दीये को जलाकर अन्धकार दूर कर सकता है। श्रोत्रिय जी ने कहा कि दीये के समान एक जीवन हमारे देश में भी आया था, वह देश व मानव जाति के उद्धार के लिये जला था और उसने प्रकाश देकर मनुष्यों को सन्मार्ग दिखाया था। श्रोत्रिय जी ने प्रकाश एवं अन्धेरा का एक दृष्टान्त प्रस्तुत करते हुए कहा कि अन्धेरे ने दीये से कुछ स्थान उसे देने की प्रार्थना की। दीये ने कहा कि मैंने अपने भीतर जो सामथ्र्य प्राप्त की है वह अन्धकार मिटाने और प्रकाश करने के लिए है। तू प्रकाश में तो रह नहीं सकता इसलिये यदि रहना चाहता है तो आकर मेरे नीचे दास बन कर रह सकता है। इस उदाहरण से यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऋषि दयानन्द ने वेद प्रकाश करके अविद्यायुक्त मतों को दीये के नीचे का स्थान दिया है। वेदों के प्रकाश के सम्मुख कोई अविद्यायुक्त मत स्थिर नहीं रह सकता। सब अपनी अविद्या के कारण वेदों को स्वीकार न करके अन्धकार की तरह उससे दूर भागते हैं।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि जब कोई जिज्ञासु वेदज्ञान की सच्ची कामना करे तो गुरुकुल के ब्रह्मचारी को उसे विद्वान बनाकर उसे वेदज्ञान से प्रकाशित करना चाहिये। उन्होंने कहा कि ऋषि दयानन्द जी के जो कोई व्यक्ति सम्पर्क में आया वह उनसे ज्ञान प्राप्त कर प्रकाशित होता रहा। श्रोत्रिय जी ने दयानन्द जी से प्रकाश प्राप्त करने वालों स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, पं. लेखराम आदि महापुरुषों के नाम लिये। अपने वक्तव्य को विराम देते हुए आचार्य श्रोत्रिय जी ने वेदों के प्रचार प्रसार व धर्म व संस्कृति की रक्षा के लिए गुरुकुलों की सहायता करने की प्रेरणा व अपील की।

 

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