स्वामी शंकराचार्य जी का वैराग्य विषयक वैदिक मान्यताओं के अनुरूप उपदेश

मनमोहन कुमार आर्य

‘विवेक चूडामणि’ स्वामी शंकराचार्य जी का लगभग दो हजार वर्ष पूर्व लिखा गया उनके सभी ग्रन्थों में एक प्रधान ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ मोक्षाभिलाषी एवं स्वाध्याय प्रेमियों के लिए महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसका लाभ तभी हो सकता है जब कि हम वैदिक त्रैतवाद के सिद्धान्त को भली प्रकार से समझते हों। ग्रन्थ में अनेक स्थानों पर अद्वैत मत की मान्यताओं का समर्थन व मिश्र्रण मिलता है जिसे वैदिक धर्मी ऋषि दयानन्द का अनुयायी जान लेता है और उसे स्वीकार नहीं करता। स्वामी शंकराचार्य जी के अन्य वचन पढ़कर उनके वैदुष्य का ज्ञान होता है जो कि पुराणकारों की मान्यताओं से सर्वथा भिन्न प्रकार का है व अधिकांशतः वेदसम्मत है। ग्रन्थ की समाप्ति पर स्वामी शंकराचार्य जी ने अपने गुरु का नाम, अपना नाम व ग्रन्थ का नाम लिख कर कह है कि विवेक-चूडामणि ग्रन्थ समाप्त होता है। लगभग इसी प्रकार स्वामी दयानन्द जी ने भी सत्यार्थप्रकाश की समाप्ति पर वचन लिखे हैं जहां स्वामी विरजानन्द जी व उनके शिष्य ग्रन्थकर्ता के रूप में अपने नाम का उल्लेख कर लिखा है कि सुन्दर प्रमाणों से युक्त सुभाषा से विभूषित सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ समाप्त होता है। स्वामी शंकराचार्य जी ने वैराग्य-निरूपण के कुल 6 श्लोक लिखे हैं। हम इन श्लोकों का हिन्दी भाषान्तर प्रस्तुत कर रहे हैं।

 

शंकराचार्य जी कहते हैं कि विरक्त पुरुष का आन्तरिक और बाह्य संग दोनों प्रकार के संग का त्याग करना ठीक है। वह विरक्त पुरुष मोक्ष की इच्छा से आन्तरिक और बाह्य संग को त्याग देता है।

 

इन्द्रियों का विषयों के साथ बाह्य संग और अहंकारादि के साथ आन्तरिक संग, इन दोनों का ब्रह्मनिष्ठ विरक्त पुरुष ही त्याग कर सकता है।

 

हे विद्वन्! वैराग्य और बोध-इन दोनों को पक्षी के दोनों पंखों के समान मोक्षकामी पुरुष के पंख समझो। इन दोनों में से किसी भी एक के बिना केवल एक ही पंख के द्वारा कोई मुक्तिरूपी महल की अटारी पर नहीं चढ़ सकता (अर्थात् मोक्ष प्राप्ति के लिये वैराग्य और बोध दोनों की ही आवश्यकता है)।

 

अत्यन्त वैराग्यवान् को ही समाधि का लाभ होता है। समाधिस्थ पुरुष को ही दृढ बोध होता है तथा सुदृढ बोधवान् का ही संसार-बन्धन छूटता है। जो संसार-बन्धन से छूट गया है उसी को नित्यानन्द का अनुभव होता है।

 

जितेन्द्रिय पुरुष के लिए वैराग्य से बढ़कर सुखदायक और कुछ भी प्रतीत नहीं होता और वह यदि कहीं शुद्ध आत्मज्ञान के सहित हो तब तो स्वगीय साम्राज्य के सुख का देने वाला होता है। यह मुक्तिरूप कामिनी का निरन्तर खुला हुआ द्वार है। इसलिए हे वत्स! तुम अपने कल्याण के लिये सब ओर से इच्छा रहित होकर सदा सच्चिदानन्द ब्रह्म में ही अपनी बुद्धि स्थिर करो।

 

विष के समान विषम विषयों की आशा को छोड़ दो, क्योंकि यह स्वरूप-विस्मृतिरूप मृत्यु का मार्ग है तथा जाति, कुल और आश्रम आदि का अभिमान छोड़कर दूर से ही कर्मों को नमस्कार कर दो। देह आदि असत् पदार्थों में आत्मबुद्धि को छोड़ो और आत्मा में अहंबुद्धि करो क्योंकि तुम वास्तव में इन सबके द्रष्टा हो। यहीं पर स्वामी दयानन्द ने अपनी अद्वैत मान्यता को भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने कहा कि तुम मल तथा द्वैत से रहित जो परब्रह्म है, वही हो। यह अवैदिक विचारधारा है जिसका वैदिक त्रैतवाद से मेल नहीं है। आर्यसमाज के अनुयायी इस विचार व मान्यता को छोड़कर शेष का ग्रहण कर सकते हैं जो प्रायः वैदिक धर्म के अनुकूल प्रतीत होता है।

 

स्वामी शंकराचार्य जी लगभग दो या ढाई हजार वर्ष पूर्व केरल प्रदेश में उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न हुए थे। उन दिनों देश का धार्मिक वातावरण आज से सर्वथा भिन्न था। संसार में ईसाई तथा इस्लाम मत वा पन्थ का आविर्भाव नहीं हुआ था। स्वामी शंकराचार्य जी ने बौद्ध व जैन मत की नास्तिकता की मान्यताओं का खण्डन कर वैदिक धर्म को विजय दिलाई थी। किन्हीं कारणों से वह त्रैतवाद के स्थान पर अद्वैतवाद के समर्थक थे। उन दिनों अधिकांश लोग वैराग्य व मोक्ष आदि पर विचार करते थे और उसकी प्राप्ति के लिए साधनायें करते थे। आज का समय उस समय से सर्वथा भिन्न है। आज भौतिकवाद चरम सीमा पर है। संसार में व देश में अगणित मिथ्या मत व पंथ स्थापित हो गये हैं जिनका उद्देश्य अविद्या व अज्ञान को हटाकर सत्य मत व धर्म को स्थापित करना नहीं अपितु अपना स्वार्थ सिद्ध करना है। कुछ मत अपने अनुचित लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए हिंसा को भी बुरा नहीं मानते। वह लोभ व बल सहित छल का प्रयोग करते हैं और हिन्दुओं का धर्मान्तरण करते हैं। देश में जन्मना जातिवाद अपनी चरम पर है। देश में जातीय संघर्ष हो रहे हैं। लोग अपनी अपनी जाति के लिए सुविधायें एवं सत्ता में भागीदारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बहुत से स्वार्थी लोग उनके इन अराष्ट्रीय विचारों का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन भी करते हैं। देश कमजोर हो रहा है। इसका लाभ नास्तिकों व हिंसा के समर्थक लोगों को मिलना है। इसकी प्रमुख राजनीतिक दलों को भी चिन्ता नहीं है। उन्हें अपना ही दलीय हित येन केन प्रकारेण सत्ता की प्राप्ति ही प्राप्तव्य लगता है। आर्यसमाज आज एक निष्क्रिय संस्था सी बन गया है। इसका मुख्य कारण आपस की फूट है व दूसरा अयोग्य लोगों का पदाधिकारी आदि बनना है। जिस भंवर में आज देश फंसा हुआ है उसे देखकर भविष्य की चिन्ता होती है। आर्यसमाज स्थिति पर नियंत्रण करने में सक्षम नहीं है। ईश्वर से ही प्रार्थना है कि वह वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा करे। हमारा कर्तव्य है कि हम अपने मतभेद भूलकर उस राजनीतक दल व संगठन को सहयोग दें जिससे देश का हित व सर्वाधिक रक्षा हो सकती है। ओ३म् शम्।

 

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