नोट बंदी

मोदी सरकार में आर्थिक विकास से सामाजिक विकास

ऐसे ही स्वीडन की कंपनियाँ मानती हैं कि भारत में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आने तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनने के बाद से लगातार यहाँ का व्‍यापारिक माहौल अच्‍छा हुआ है। यही कारण है कि पिछले साल में स्वीडिश कंपनियों और निवेशकों के रोजगार में 20 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। स्वीडिश चैंबर ऑफ कामर्स का भारत-स्‍वीडन व्यावसायिक माहौल सर्वे जिसमें कि कुल 170 कंपनियों में से 160 ने भाग लिया, सभी एक स्‍वर में कहती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी बहुत अच्‍छा कार्य कर रहे हैं। स्वीडन को भारत में उर्जा, पर्यावरण, स्मार्ट सिटी, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटाइजेशन, स्वास्थ्य और जीव विज्ञान के क्षेत्र में काम रही कंपनियों के लिये काफी संभावनाएं दिखाई देतीं हैं। दूसरी तरफ नीति आयोग के अपने आंकड़े हैं, जो आज यह बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2030 तक 7 हजार 250 अरब डॉलर या कहें कि 469 लाख करोड़ रुपए की हो जाएगी। यह आंकलन उसने देश में 8 प्रतिशत सालाना वृद्धि दर के हिसाब से किया है।

नोट बंदी : विकास की तरफ बढ़ते भारत के कदम

करीब 35 हजार करोड़ का कालाधन बाहर आ चुका है। कश्मीर में सुरक्षा बलों पर होने वाले पथराव पर रोक लगी है। इससे यह जाहिर है कि अलगाववादी या पाकिस्तान एजेंट पांच-पांच सौ देकर युवकों को पथराव के लिए प्रेरित करते थे। यहां तक कि नक्सली आतंकी भी कह रहे है कि नोटबंदी का गरीबों के हित में निर्णय है और वे समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मन बना रहे है। जनता के लिए कल्याणकारी योजनाएं लागू हुई है।

मोटिवेशन : ‘नोट बंदी’ का नाजुक दौर और हम

कहना न होगा, डाक व बैंक कर्मियों पर इस वक्त बहुत बड़ी जिम्मेदारी है, जिसका निर्वहन उन्हें अत्यधिक तन्मयता, दक्षता, संवेदनशीलता, इमानदारी एवं संयम के साथ करने की आवश्यकता है. बड़े डाकघरों तथा बैंक शाखाओं में पुराने नोट बदलनेवालों, वरीय नागरिक, दिव्यांग और महिलाओं, बड़ी जमा राशि को अपने खाते में जमा करने वाले ग्राहकों आदि के लिए अलग-अलग काउंटर खोलने की जरुरत तो है ही. संबंधित विभागों के वरीय अधिकारियों द्वारा इस कार्य की सतत मॉनिटरिंग भी अपेक्षित है. सिविल सोसाइटी के जाने -माने लोगों को भी अपनी भूमिका दर्ज करने की जरुरत है.