लेखक परिचय

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी

मयंक चतुर्वेदी मूलत: ग्वालियर, म.प्र. में जन्में ओर वहीं से इन्होंने पत्रकारिता की विधिवत शुरूआत दैनिक जागरण से की। 11 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय मयंक चतुर्वेदी ने जीवाजी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में डिप्लोमा करने के साथ हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर, एम.फिल तथा पी-एच.डी. तक अध्ययन किया है। कुछ समय शासकीय महाविद्यालय में हिन्दी विषय के सहायक प्राध्यापक भी रहे, साथ ही सिविल सेवा की तैयारी करने वाले विद्यार्थियों को भी मार्गदर्शन प्रदान किया। राष्ट्रवादी सोच रखने वाले मयंक चतुर्वेदी पांचजन्य जैसे राष्ट्रीय साप्ताहिक, दैनिक स्वदेश से भी जुड़े हुए हैं। राष्ट्रीय मुद्दों पर लिखना ही इनकी फितरत है। सम्प्रति : मयंक चतुर्वेदी हिन्दुस्थान समाचार, बहुभाषी न्यूज एजेंसी के मध्यप्रदेश ब्यूरो प्रमुख हैं।

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डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के 71 वें स्‍वतंत्रता दिवस पर इस बात की समीक्षा किया जाना प्रासंगिक है कि पिछले 70 वर्षों में हम कहा तक पहुँचे। हमारी विश्‍व में आर्थ‍िक स्‍थ‍िति क्‍या है और आगे इस दिशा में संभावनाएँ कितनी अधिक मौजूद हैं। वस्‍तुत: आज इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि देश का जितना अधिक आर्थ‍िक ढांचा मजूबत होगा,देश उतनी ही तेजी के साथ आगे बढ़ेगा। देखाजाए तो केंद्र में जो भाजपा की मोदी सरकार है, इस दिशा में इन दिनों वह बहुत अच्‍छा कार्य कर रही है। सुधार की दिशा में जितने अधिक सक्रिय प्रयासों का क्रियान्वयन हुआ है, उन उठाये गये कदमों को देखकर यही कहना होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की नींव मजबूत होने के साथ परिणामकारी आर्थिक विकास की गति को हासिल करने में सफल रही है।

 

पिछले दिनों कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष मोदी सरकार पर यह आरोप लगाता रहा है कि केंद्र नीतिगत सुधारों और बिजनेस के लिए अनुकूल माहौल बनाने के असफल रहा है। किंतु इसके विपरीत सांख्‍यकी आंकड़े कुछ ओर बोल रहे हैं, एक बार को यह मान भी लिया जाए कि सरकार में बैठे अधिकारियों द्वारा आंकड़ों में किए गए घालमेल के जरिए मोदी सरकार के समर्थन में माहौल बनाया जा रहा है, किंतु क्‍या दुनियाभर में जो भारत के आर्थ‍िक विकास को लेकर बाते की जा रही हैं,तथ्‍य प्रस्‍तुत किए जा रहे हैं, उस पर भी विश्‍वास न किया जाए? निश्‍चित ही उन पर सभी को समानरूप से भरोसा करना होगा।

 

यह आंकड़े सीधे-सीधे बता रहे हैं कि मोदी राज में वर्ष दर वर्ष एफडीइआई के अंतर्गत बढ़ोत्‍तरी हो रही है। पिछले वित्त वर्ष 2016-17 में ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 2015-16 के 55.56 डॉलर की तुलना में 8 फीसदी बढ़ोतरी के साथ बढ़कर 60.08 अरब डॉलर की नई ऊंचाइयों तक पहुंच गया था, जिसके बाद से अभी लगातार इसमें वृद्धि देखी जा रही है । सरकार ने एफडीआई नीति में बदलाव तथा विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) द्वारा मंजूरी की सीमा में वृद्धि करने के साथ जो देश में ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ नीति को बढ़ावा देने का प्रयास किया है, उसी से एफडीआई में बढ़ोतरी हुई है। इससे उम्‍मीद जगी है कि चालू वित्‍त वर्ष की समाप्‍ति के उपरान्‍त जब इसके आंकड़े आएंगे तो वह बहुत अधिक भारत की आर्थिक तरक्‍की दर्शानेवाले होंगे।

 

वस्‍तुत: एक बार में एफडीआई में वृद्धि का मुख्य कारण जो समझ आता है वह सरकार द्वारा इसकी व्यवस्था को व्यावहारिक बनाने के लिए किए गए साहसिक और नीतिगत सुधार की दिशा में लिए गए निर्णय हैं। जिसमें केंद्रीय बैंक द्वारा उठाए गए सुधारात्मक कदम एवं वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) बिल की राह के अटके सभी रोड़े साफ करते हुए उसे इस भावना के साथ लागू करना भी है कि एक देश एक कर होना चाहिए ।

 

जिस नोट बंदी पर समुचा विपक्ष मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा करने में कभी पीछे नहीं रहा और कभी जिस जनधन योजना का मजाक उड़ाया जा रहा था, उसी नोटबंदी से जो अर्थ का प्रवाह बैंकों तक पहुँचा तथा निचले स्‍तर पर अधिकतम बैंक खाते खुले, असल में उससे भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था को मजबूती मिली है। इससे जुड़े तथ्‍य यह हैं कि 11 नवंबर 2016 से 3 मार्च 2017 के तक बैंकों के समग्र जमा में 4.27 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हुई। नकदी की निकासी पर लगी रोक को सरकार द्वारा पूरी तरह से हटाने के बाद भी औसत निकासी के स्तर में उल्लेखनीय गिरावट रही। इस गिरावट के परिणाम स्‍वरूप 1.7 लाख करोड़ रूपये जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का तकरीबन 1.1 प्रतिशत होता है, वह बैंकिंग प्रणाली में प्रविष्ट रहा । इससे मोदी सरकार द्वारा लिया गया विमुद्रीकरण का निर्णय अर्थव्यवस्था में आई मजबूती का कारण बन गया। वहीं इससे रुपया मजबूत हुआ जोकि कहीं न कहीं हमारी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ता प्रदान कर रहा है।

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्‍त मंत्री अरुण जेटली की ये वह नीतियां हैं, जिनके कारण से लगातार कई देश भारत की बढ़ती अर्थशक्‍ति से चमत्‍कृत हैं। यही सब बातों का जिक्र करते हुए यूएन भी भारत की अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर तेज रहने की आज बात कह रहा है। इस संबंध में सभी का यह जानना समीचीन होगा कि संयुक्त राष्ट्र को उम्मीद है, भारत की आर्थिक वृद्धि दर अगले साल बढ़कर 7.9 प्रतिशत हो जाएगी। संयुक्त राष्ट्र विश्व आर्थिक परिस्थिति व परिदृश्य रपट (मध्य 2017) में यह निष्कर्ष निकाला गया है, इस साल के अंत तक भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.3 प्रतिशत रहना अनुमानित है।

 

ऐसे ही स्वीडन की कंपनियाँ मानती हैं कि भारत में भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार आने तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बनने के बाद से लगातार यहाँ का व्‍यापारिक माहौल अच्‍छा हुआ है। यही कारण है कि पिछले साल में स्वीडिश कंपनियों और निवेशकों के रोजगार में 20 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है। स्वीडिश चैंबर ऑफ कामर्स का भारत-स्‍वीडन व्यावसायिक माहौल सर्वे जिसमें कि कुल 170 कंपनियों में से 160 ने भाग लिया, सभी एक स्‍वर में कहती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी बहुत अच्‍छा कार्य कर रहे हैं। स्वीडन को भारत में उर्जा, पर्यावरण, स्मार्ट सिटी, दूरसंचार, सूचना प्रौद्योगिकी और डिजिटाइजेशन, स्वास्थ्य और जीव विज्ञान के क्षेत्र में काम रही कंपनियों के लिये काफी संभावनाएं दिखाई देतीं हैं। दूसरी तरफ नीति आयोग के अपने आंकड़े हैं, जो आज यह बता रहे हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था 2030 तक 7 हजार 250 अरब डॉलर या कहें कि 469 लाख करोड़ रुपए की हो जाएगी। यह आंकलन उसने देश में 8 प्रतिशत सालाना वृद्धि दर के हिसाब से किया है।

 

वस्‍तुत: सरकार के समग्र आर्थिक विकास की नीतियों पर काम करने के कारण ही यह संभव हो पाया है कि समाज के सभी वर्गों को आज आर्थिक विकास के कारण समाजिक विकास का लाभ सतत मिल रहा है। हालांकि समान और संपूर्ण विकास अभी हमसे दूर है, किंतु इस दिशा में जैसा कार्य हो रहा है, उससे इतनी आशा बंधी है कि भविष्‍य में देश इस मार्ग पर चलकर बेरोजगारी से पूरी तरह मुक्‍त हो जाएगा, अपनी बढ़ती जनसंख्‍या को पर्याप्‍त काम देने की दिशा में आगे बढ़ना भी निश्‍चि‍त तौर इस मोदी सरकार की बड़ी उपलब्‍धियों में से एक माना जा सकता है।

 

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