बुद्ध पूर्णिमा

अपदीपो भव ………….

भगवान बुद्ध ने कहा कि वही सुखी है जो जय-पराजय की भावना का त्याग करता है। वजह यह कि जय की भावना से बैर उत्पन्न होता है, पराजय से दुःख उत्पन्न होता है। उनका मानना था – अक्रोध के द्वारा क्रोध को, साधुता के द्वारा असाधु भाव को, दान के द्वारा कदर्प और सत्य के द्वारा मृषावाद या झूंठ को जीतना चाहिए। उनके अनुसार जिसका किसी से बैर नही है और जो सभी प्राणियों से मैत्री करता है वही सुखी होता है।

शांति और प्रेम का संदेश देती है बुद्ध पूर्णिमा

यह लाल बलुई मिटटी की बनी है। यह मूर्ति भी इसी स्थान से निकाली गयी थी। मंदिर के पूर्वी हिस्से में एक स्तूप कहा जाता है कि यहां पर भगवानबुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। श्रीलंका व अन्य दक्षिण पूर्व एशियाइ देशों में इस दिन को बेसाक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।पूर्णिमा के दिन बौद्ध अनुयायी अपने घरों में दीपक जलाते हैं। फूलों से घरों को सजाते है। सभी बौद्ध बौद्ध ग्रंथ का पाठ करते हैं। बोधगया सहित भगवान बुद्ध सें सम्बंधित सभी तीर्थस्थलों व स्तूपों व महत्व के स्थानों को सजाया जाता है। कई जगह मेले भी लगते हैें।