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प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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अवनीश सोमकुंवर

बात जब आदिवासियों की की जाती है तो हमारे मन मस्तिष्क में एक ऐसे समुदाय की छवि उभरती है जो असभ्य होगा, विकास की दौड़ में काफी पिछड़ा होगा, जहां कानून नाम की चीज नहीं होगी वगैरह वगैरह। कुल मिलाकर हम आदिवासियों और आम इंसानों के बीच सभ्यता और असभ्यता की लक्ष्मण रेखा खींच देते हैं। ऐसा करते वक्त हम यह भूल जाते हैं कि समय की दौड़ में पिछड़ने के बावजूद इनमें भी चेतना है। समुदाय की इसी सामूहिक चेतना का जब विस्फोट होता है तो उसका प्रभाव व्यापक और स्थायी होता है। मध्यप्रदेश के केलझिरी वनगांव में यही हुआ। देश के करीब दो हजार वन गांवों में केलझिरी ने अपनी विशिष्टक पहचान बना ली है। राजधानी भोपाल से करीब 160 किमी दूर हरदा जिले के दस वन गांवों में से एक केलझिरी घने वनों के बीच बसा कोरकू जनजाति के परिवारों का छोटा सा गांव है। यहां कोरकू परिवारों के 45 घर हैं जिनकी जनसंख्या 450 से ज्यादा है। कोरकू परिवारों के घरों की अपनी विशेषता है। हर घर में 40 वर्ग फुट के पक्के टाइल्स लगे शौचालय और स्नानागार है। हर घर के सामने पीने के पानी का नल लगा है। शौचालय और स्नानागार के उपर 500 लीटर क्षमता की पानी की टंकी है। शौचालय में नल और फ्लश सिस्टम लगा है। पक्की संरचना वाले ये स्नानागार 50 सालों से ज्यादा समय तक सुरक्षित रह सकते हैं। पिछले छह दशकों से शौच के लिए बाहर जाने वाले इन कोरकू परिवारों के लिये पक्के शौचालय और स्नानागार होना एक सुखद आश्चर्य है।

केलझिरी के कोरकू जनजातीय समुदाय के इन परिवारों ने पूरे देश का ध्यान आकर्षित किया है। ये लोग परंपरागत रूप से खेती करते हैं। केन्द्र सरकार समग्र स्वच्छता कार्यक्रम को मिशन के रूप में लागू करने की योजनाएं बना रही है। सभी राज्य सरकारें संपूर्ण स्वास्थ्य के लिये स्वच्छता कार्यक्रम को प्राथमिकता दे रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छता कार्यक्रम को बढ़ावा देने के लिए 12वीं पंचवर्षीय योजना में तीन खरब साठ अरब रूपए का प्रावधान भी किया गया है। ऐसी स्थिति में केलझिरी गांव का उदाहरण प्रेरणा स्त्रोत के रूप में सामने आता है। इसका पूरा श्रेय जाता है केलझिरी वन सुरक्षा समिति को। समिति के अध्यक्ष गुलाब ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि ‘‘हर घर में पक्के शौचालय-स्नानागार बनाने का विचार तब आया जब समिति की सामान्य बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि समिति को मिली वनोपज दोहन की लाभांश राशि 19 लाख 96 हजार का उपयोग कैसे किया जाये। उसने बताया कि गांव के विकास की कई योजनाओं पर चर्चा हुई लेकिन सबका मत रहा कि सबसे पहले शौचालय और स्नानागार बनायें ताकि खुले में शौच जाने से छुटकारा पा लें।‘‘

होशंगाबाद वन सर्किल के मुख्य वन संरक्षक बी के सिंह याद करते हैं कि ‘‘जब वन संरक्षक समिति ने अपने निर्णय की जानकारी वन अधिकारियों को दी तो हमने भी उन्हें तकनीकी मार्गदर्शन देने का निर्णय लिया और उनका साथ देते हुए हर समय साथ खडे़ रहे।‘‘ केलझिरी गांव में रह रहे बडवानी ग्राम पंचायत के पंच राजेश ठाकुर बताते हैं कि ‘‘केलझिरी गांव बडवानी ग्राम पंचायत के तीन गांवों में से एक है। अन्य दो गांव हैं बडवानी और खुमी। अपने निर्णय के संबंध में वे कहते हैं कि ‘‘हम सब पहले अपने निर्णय के बारे में थोडा आशंकित थे लेकिन बी के सिंह साहब ने हमारा हौसला बढ़ाया और हम आगे बढे़। उन्होने पानी पहुंचाने के लिये पाइप लाइन बिछाने, घर के सामने नल लगाने जैसे तकनीकी कामों में हर पल हमारा साथ दिया। उनके मार्गदर्शन के कारण पूरे गांव ने भी श्रमदान किया और निर्माण का खर्च भी बचाया।‘‘ गांव के एक छोर पर दस हजार लीटर की क्षमता वाली टंकी स्थापित की गई है। इससे सभी 45 घरों की टंकियों में पानी जाता है। हर घर की टंकी 500 लीटर की है। बोर वेल से बडी टंकी में पानी भरता है। चूंकि पास ही नर्मदा की सहायक अजनाल नदी बहती है इसलिये यहां का जल स्तर बहुत अच्छा है। बिजली का खर्चा उठाने की जिम्मेदारी वन सुरक्षा समिति ने उठा ली है। प्रत्येक इकाई की लागत 39,000 रूपये आई है। गुणवत्ता इतनी अच्छी है कि देश के किसी भी वन गांव में ऐसी पहल नहीं हुई है। निर्माण की पूरी प्रकिया को करीब से देखने वाले हरदा के जिला वन अधिकारी उत्तम शर्मा कहते हैं कि ‘‘केलझिरी के मामले में सबसे बडी बात है समुदाय की सामूहिक चेतना और हर सदस्य में जिम्मेदारी की भावना।‘‘ कई सालों से हम नदी के किनाने खुले में शौच जाते थे। बरसात में ज्यादा परेशानी होती थी विशेष तौर पर बुजूर्गों और मां-बेटियों को। यह बताते हुए 75 वर्षीय साबूलाल ने कहते हैं कि मैं इसे गांव की गरिमा का प्रतीक मानता हूं। गांव वालों को इस बात की खुषी है कि अब कई बीमारियों से हमारा गांव बचा रहेगा।

हर घर में शौचालय सुविधा से सबसे ज्यादा महिलाओं को खुशी हुई है। मिठिबाई के लिये शौचालय और स्नानागार की सुविधा बहु बेटियों के सम्मान से जुडी है। वह कहती हैं कि ‘‘गांव के करीब 100 बच्चे अगले एक-दो सालों में शादी-ब्याह लायक हो जायेंगे। अब बहुओं को परेशानी नहीं होगी जो हमें सालों झेलना पड़ी। रामवती बाई को सबसे बडी राहत मिली है। वह कहती हैं कि ‘‘हमारा संकट का समय हमेशा के लिये समाप्त हो गया।‘‘ केलझिरी के इस अनूठे प्रयास के संबंध में सरपंच उर्मिला बाई चैधरी का कहना है कि ‘‘हमने वन सुरक्षा समिति के निर्णय का सम्मान किया और समुदाय को हर संभव सहयोग दिया। हर घर के सदस्यों की मेहनत और कुछ करने की लगन ने हमें भी प्रोत्साहित किया। अब दूसरे गांवों और खासतौर से मेरे स्वयं के बडवानी गांव से भी मांग आ रही है। केलझिरी से तीन किमी दूर बडवानी से आये किशारी, डाडू और राधेलाल केलझिरी के लोगों से मार्गदर्शन चाहते हैं। वे कहते हैं कि ‘‘जब केलझिरी ऐसा काम कर सकता है तो हम क्यों नहीं?

बडवानी ग्राम पंचायत के सचिव ज्ञान सिंह तोमर को उम्मीद है कि एक ग्राम पंचायत के सभी गांवों में खुले में शौच जाना बंद होने पर ग्राम पंचायत को निर्मल ग्राम का दर्जा मिलता है। अब केलझिरी ने अपने आपको निर्मल ग्राम का दर्जा पाने लायक स्वंय को बना लिया है। ऐसे में इसे निर्मल गांव घोषित कर देना चाहिये। यह न्याय संगत भी होगा और केलझिरी का सम्मान भी। बी के सिंह के अनुसार केलझिरी ने देश के वन गांवों को नई सीख दी है और नई आशाएं पैदा की हैं। वन ग्रामों में सकारात्मक नेतृत्व कैसे उभरता है और रचनात्मकत कार्य की शुरूआत कैसे हो सकती है इसका अच्छा उदाहरण साबित हुआ है केलझिरी। अब आस-पास के गांवों के लोगों ने केलझिरी आना शुरू कर दिया है। उद्देश्य एक ही है देखना, समझना और यह सीखना कि सरकारी योजनाओं का इंतजार किए बगैर आने वाली पीढ़ी के लिए किस तरह बेहतर रास्ता तलाशा जाए।‘‘ (चरखा फीचर्स)

2 Responses to “केलझिरी के आदिवासियों से प्रेरणा लीजिए”

  1. Sanjay

    बहुत अच्छा लेख.देश के उस हिस्से के बारें में जानकारी दी जिससे हम अनजान थे .

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  2. डॉ. मधुसूदन

    Dr. Madhusudan

    बहुत संतोष जनक समाचार है|
    कुछ अलग पर जुदा हुआ सुझाव:
    भारत का प्रवासन या पर्यटन उद्योग भी इससे पाठ ले सकता है|
    (१) हर महामार्ग (हायवे) पर, भारी संख्या में, यात्रियों का आवागमन हुआ करता है|
    कमसे कम ४० -५० किलोमीटर के अंतर पर ऐसी शौचालय की स्वच्छ सुविधा पर्याप्त जल सहित, उपलब्ध कराने से हमारा पर्यटन उद्योग भी लाभदायी सिद्ध होगा|
    (२) यही शिकायत मैं ने परदेशी पर्यटकों से भी सुनी हुयी है|
    (३) भारत के लिए बहुत बड़ा मुद्रा कमाने का साधन भी यही है|

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