लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

टेलीविजन में तालिबानी तांडव चल रहा है। भारत के विभिन्न समाचार चैनल टीवी समाचारों के सभी किस्म के एथिक्स और कानूनों को त्यागकर तालिबानी हथकंड़ों पर उतर आए हैं। वे सरकारी रिपोर्ट और पुलिस की चार्जशीट को खोजी खबर बनाकर पेश कर रहे हैं । और सनसनीखेज टीवी पत्रकारिता कर रहे हैं।

हिन्दू आतंकवाद से लेकर हाल के भ्रष्टाचार के घोटालों के उद्घाटन तक टीवी चैनलों ने एक भी ऐसी खबर नहीं दी है जो उन्होंने स्वतंत्र रूप से जुगाड़ की हो,अपनी खोजीटीम लगाकर एकत्रित की हो। इसके बावजूद वे सत्य के तथाकथित ढ़िंढोरची बने हुए हैं। हमारे टीवी एकर नहीं जानते कि वे इस तरह टीवी को तालिबानी टीवी में तब्दील कर रहे हैं। इस पूरी प्रक्रिया में दीर्घकाल में टेलीविजन की विश्वसनीयता ही खत्म हो जाएगी।

टेलीविजन का तालिबानी हथकंडा है खबर के नाम पर आतंक ,भय और दबाब पैदा करना। सरकार को पंगु बनाना। सरकारी मशीनरी की निर्रथकता को ढ़ोल बजाना। चैनलों में यह भाव नजर आ रहा है कि ‘मेरी मानो वरना नंगा कर दूँगा’।

संचारमंत्रालय से लेकर आदर्श घोटाले तक,कॉमनवेल्थ से लेकर कर्नाटक के येदुरप्पा घोटाले तक टेलीविजन का काम आतंक पैदा करने का रहा है। इसने खबरें कम और राजनीतिक भय ज्यादा पैदा किया है। इन सभी प्रसंगों में सत्य का एक भी नया अंश चैनल रिपोर्टर जुगाड़ नहीं कर पाए हैं।

चैनल एंकर कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा के आधार पर अपनी तथाकथित भ्रष्टाचार विरोधी रिपोर्ट को तैयार करते हैं और फिर उसका जमकर 24 घंटे ,48 घंटे, 72 घंटे प्रौपेगैण्डा करते हैं। वे तथाकथित पुलिस फाइल से सामग्री जुगाड़ करके लाते हैं,भ्रष्टाचार के मामले में वे सीएजी की रिपोर्ट को लेकर आए हैं। वे अपनी टीवी रिपोर्ट पर चर्चित व्यक्तियों को बातचीत के लिए बुलाकर पूछते हैं कि हमारे फलां-फलां सवाल हैं ,आप लोगों की क्या राय है ? क्या किया जाए ?

टॉक शो में बैठे ‘ज्ञानी-गुणी’ लोग तत्काल रेडीमेड उत्तर देते हैं। यह करो वह करो। इसे पकड़ो,उसे गिरफ्तार करो। इसे बर्खास्त करो,उसे खोज निकालो। तत्काल दंड दो। हम जो कहते हैं उसे मानो। यदि नहीं मानोगे तो हम और भी हल्ला करेंगे। इसके कारण टीवी चैनलों ने तालिबानी आतंक का वातावरण बनाया हुआ है। इसके खिलाफ सरकार को खड़ा होना चाहिए। लोकतंत्र पसंद ताकतों को आवाज बुलंद करना चाहिए। सत्य के साथ खड़ा होना चाहिए। टीवी चैनलों के आतंक के सामने उसे समर्पण नहीं करना चाहिए।

अभी तक का अनुभव बताता है कि सरकार भी चैनलों से डरने लगी है,कायदे से सरकार का डर होना चाहिए था। लेकिन चैनलों ने उलटा वातावरण बनाया है। अब चैनलों से सरकार डर रही है,नेता डरे हैं, राजनीतिक दल डरे हैं, समाज डरा हुआ है। न्यायाधीश डरे हुए हैं। सिर्फ अंसंवैधानिक सत्ता केन्द्र और माफिया गिरोहों को चैनलों से नहीं डर नहीं लगता। बाकी सब लोग डरे हुए हैं।

इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो टीवी चैनल भय और आतंक का वातावरण बनाकर माफिया और कानून भंजकों के लिए विचारधारात्मक वातावरण का निर्माण करने का काम कर रहे हैं। चैनल वाले भय की सेवा कर रहे हैं,लोकतंत्र की नहीं। लोकतंत्र में भय का वातावरण नहीं होता। दबाब का वातावरण नहीं होता।

टीवी में किसी खबर के आने का मतलब है संबंधित व्यक्ति की सामाजिक हत्या। वे यह काम बड़े सुनियोजित ढ़ंग से कर रहे हैं। इसका न्यायालयों से लेकर राजनेताओं तक प्रभाव पड़ रहा है। तथाकथित पब्लिक पर्सेप्शन बनाने के नाम पर टीवी वाले किसी भी व्यक्ति या मसले के बारे में खबर उछालते हैं और उसके बाद तत्काल एक्शन की मांग करते हैं।

मजेदार बात यह है एंकरों से लेकर समाचार संपादकों को संबंधित मसले की जटिलताओं की कोई जानकारी नहीं होती। वे मसले की सरलता से बाकिफ होते हैं और जटिलता से अनजान होते हैं। मसले को सरल बनाने के चक्कर में वे जटिल और संश्लिष्ट को फालतू समझने लगते हैं । इसके बाद अपने ही बुने जाल में फंस जाते हैं। उनकी किसी भी मसले को लेकर कोई भी गहरी तैयारी नहीं होती और वे भोंपू की तरह अपनी बेबकूफियों को सत्य का अंश बताकर प्रचारित करते हैं। वे उतना ही जानते हैं जितना कागज पर उनके सामने होता है या किसी ने सूचना दे दी होती है। वे अपने विवेक, पेशेवर कौशल और तथ्यों की दूर तक गहराई में जाकर छानबीन नहीं करते। वे रहस्योदघाटन के नाम पर अप्रासंगिक बातों और तथ्यों को उठाते हैं और उनका प्रचार करते हैं।

टीवी समाचार संपादकों की किस तरह की खोखली तैयारी होती है इसका आदर्श उदाहरण है 19 नवम्बर 2010 को ‘टाइम्स नाउ’ चैनल के समाचार संपादक-एंकर अर्णव गोस्वामी का दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल के साथ लिया गया साक्षात्कार।

इस साक्षात्कार में मंत्री कपिल सिब्बल ने समाचार संपादक को जिस तरह धोया और नंगा किया वह काबिलेतारीफ तो है ही ,साथ ही टीवी पत्रकारिता के खोखलेपन का द्योतक भी है।

मसलन मंत्री महोदय ने एक सवाल एंकर से किया कि आप यह बताएं कि स्पैक्ट्रम के दाम कौन तय करेगा ? शेष तक इस सामान्य से सवाल का जबाब एंकर के पास नहीं था,वह जानता था लेकिन बोला नहीं ,क्योंकि उसके तमाम भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार अभियान की इस एक सवाल के आधार पर ही हवा निकल जाने का खतरा था।

मंत्री ने समाचार संपादक की जिस निर्ममता के साथ धुलाई की वह देखने लायक थी और उससे यह यभी पता चल रहा था कि अर्णव गोस्वामी के पास सत्य का एक सरकारी अंश है जिसे वह सत्य का महान अंश बनाकर पेश कर रहे हैं।

हमारी समस्या यहां भ्रष्टाचार में कौन दोषी है और कौन निर्दोष है, यह पडताल करना नहीं है। हमारा लक्ष्य है कि टीवी समाचार चैनलों की पत्रकारिता पद्धति के बारे में सवाल उठाना। 2जी स्पैक्ट्रम मामला हो या आदर्श सोसायटी का मामला हो दोषी का निर्णय कानून करेगा। कानून की अपनी प्रक्रिया है और उसकी अपनी गति है। चैनलों को इस प्रक्रिया और गति से कोई लेना-देना नहीं है वे तो

प्रौपेगैण्डा में लगे रहते हैं। वे खबर नहीं पेश कर रहे बल्कि व्यक्तियों और संगठनों को निशाना बना रहे हैं। इस प्रसंग में उन्होंने अपराध रिपोर्टिंग के घटिया ङथकंड़े अपनाने आरंभ कर दिए हैं।

मसलन ,चैनल वालों का मानना है सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है वह परमसत्य है । अब सिर्फ एक काम करना है कि उसे मान लो। वे सीएजी रिपोर्ट में कोई चूक भी हो सकती है ? तथ्यों की उपेक्षा हो सकती है ? गलत निर्णय हो सकता है ? यह सब मानकर नहीं चल रहे बल्कि यह मानकर चल रहे हैं कि सीएजी रिपोर्ट में जो लिखा है वह सत्य है और तथ्य पर आधारित है।

वे सीएजी रिपोर्ट की प्रक्रिया को भी पूरा नहीं होने देना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि किसी भी तरह सीएजी रिपोर्ट के जो अंश उनके हाथ लगे हैं वे प्रमाण मान लिए जाएं और दंड की घोषणा कर दी जाए। सब जानते हैं कि सीएजी रिपोर्ट संसद में रखे जाने के पहले अपनी महत्ता हासिल नहीं करती। संसद में रखे जाने के बाद यह रिपोर्ट छानबीन के लिए पब्लिक एकाउंट कमेटी के पास जाती है और वह कमेटी इसकी

छानबीन करती है और फिर लौटकर संसद के सामने रिपोर्ट पेश की जाती है। वे इस प्रक्रिया में जाने के पहले ही भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार का हल्ला कर रहे हैं।

आज टीवी चैनलों के दबाब के चलते संसदीय प्रक्रिया और संसद दोनों ही दांव पर लगे हैं। विपक्ष ने संसद में काम ठप्प कर दिया है। वे टीवी चैनलों में बैठकर विजुअल्स के जरिए अपने प्रतिवाद को बनाए रखना चाहते हैं,वे जनता में जाकर भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई जनांदोलन खड़ा करना नहीं चाहते। जनांदोलन खड़ा करने में जो परिश्रम लगता है ,पैसा खर्च होता है उसकी तुलना में चंद टीवी एकरों के

जरिए हंगामा बनाए रखना। संसद और न्यायपालिका पर दबाब बनाए रखना ज्यादा सहज रास्ता है।

टीवी की जल्दी परिणाम निकालो की भावना ने सांसदों और न्यायपालिका में भी जल्दी परिणाम पाने का भाव पैदा किया है। इसके लोकतंत्र के खिलाफ गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इस प्रक्रिया के खिलाफ हम सतर्क नहीं हुए तो लोकतंत्र नष्ट भी हो सकता है। जल्दी परिणाम पाने के चक्कर में हम रीयलटाइम मीडिया संचार की चपेट में आकर समाज मर भी सकता है। सत्य की मौत हो सकती है। ऐसी अनेक घटनाएं घटी हैं

जिनमें रीयलटाइम टीवी संचार के दबाब में फैसले लिए गए और बाद में मालूम पड़ा सारा मामला ही झूठा था। दिल्ली की एक उच्चमाध्यमिक शिक्षिका पर एक चैनल की घटिया रिपोर्ट को सत्य के रहस्योदघाटन के नाम पर इतना उछाला गया कि दिल्ली सरकार ने उस शिक्षिका को टीवी फुटेज के आधार पर बर्खास्त कर दिया। बाद में वह महिला मानसिक संतुलन खो बैठी,बाद में पता चला कि टीवी चैनल की सारी रिपोर्ट झूठी

थी। आजकल वह महिला मानसिक रोगी की तरह अपना इलाज करा रही है और वह किसी काम को करने की स्थिति में नहीं हैं।

टीवी चैनल खबर दें,लेकिन प्रामाणिक खबर दें। वे भय पैदा न करें। दबाब की राजनीति न करें। वे खबर देने के बाद जिस आतंक और दबाब की सृष्टि करते हैं उसमें तालिबानी भाव छिपा है। एक और उदाहरण लें तो बात शायद समझ में आए। हाल ही में हरियाणा के एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को उच्च अदालत ने सेक्सुअल उत्पीड़न के मामले में जमानत दे दी है। ये जनाब रिटायर्ड हैं और मामला काफी संगीन है,उन्हें

सजा बोली गयी है और यह पुलिस अधिकारी 20 सालों से पीड़िता के परिवार को सताता रहा है। अदालत उस पर विचार कर रही है। कानूनी प्रावधान है कि सेक्सुअल उत्पीड़न के मामले में जमानत मिल सकती है। लेकिन चैनलों को आपत्ति है कि जमानत क्यों मिली।

समाचार टीवी चैनल दबाब पैदा कर रहे हैं कि अदालतें कानून के अनुसार नहीं टीवी कवरेज के अनुसार चलें। विवादित मसले का फैसला जज नहीं एंकर सुनाएंगे। जजों का काम है सिर्फ एंकरों के द्वारा दिए गए फैसले की पुष्टि करना। ये टीवी चैनलों की जागरूकता पैदा करने वाली भूमिका नहीं है यह तालिबानी भूमिका है। टीवी वाले चाहते हैं कि देश को मुक्तराज्य के रूप में उन्हें सौंप दिया जाए। वे

जिसे चाहें दोषी बताएं, जैसा चाहें दंड दें। संसद से लेकर न्यायालय सभी उनका अनुसरण करें। हमारा मानना है चैनलों का यह रास्ता टीवी पत्रकारिता के सभी एथिक्स और मानदंडों की खुली अवहेलना है।

2 Responses to “टेलीविजन का तालिबानी मुक्तराज्य”

  1. abhishek1502

    ये खबरिया चैनल निरंकुश तो है पर इतने भी नहीं जितना की यहाँ पर बताया गया है
    जिस की दाढ़ी में तिनका होगा वाही अपनी दाढ़ी टटोलेगा .
    अगर ये सब मीडिया से डर रहे है तो अपनी गलियों के कारण न की उन के शोषण के कारण
    आप तो बस तिल का ताड़ बना कर गलत तरीके से पेश कर देते हो

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  2. nand kashyap

    आज कल समाचर चैनलों ने पुरेदेश में क्या होरहा है उसे अपने हिसाब से हमें समझाने का ठेका ले रखा है परन्तु क्या यह कहना ठीक होगा की चैनल स्वतंत्र रूप से यह सब कर रहे हैं अथवा इनके पीछे बाज़ार को नियंत्रित करने वाली नैगम घरानों का हाथ है जो जन संस्किति और तार्किक समाज के घोर दुश्मन है .हमारे शहर में शराब के एक ठेकेदार है जजों शराब के खिलाफ आंदोलनों को खत्म करवाने गुंडों सहित सारे उपाए करते है साथ साथ शराब विरोधी जेबी एन जी ओ भी अपने पास रखते हैं और शराब छुड़ाने की दवा भी देतेहै .एन के कश्यप

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