लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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teresaप्रवीण दुबे
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने मदर टेरेसा की सेवा के पीछे के मुख्य उद्देश्य को उजागर क्या किया कुछ कथित धर्मनिरपेक्षतावादियों के पेट में जैसे मरोड़ हो उठी। डॉ. भागवत ने कहा कि मदर टेरेसा की गरीबों की सेवा के पीछे का मुख्य मकसद ईसाई धर्म में धर्मांतरण कराना था। आखिर भागवत जी ने इसमें गलत क्या कहा? आखिर इसको लेकर कुछ लोग परेशान क्यों हैं? भारत ही नहीं पूरी दुनिया जानती है कि मिशन ऑफ चैरिटी का भारत में क्या उद्देश्य रहा है। यह संस्था भारत ही में नहीं बल्कि कई गैर ईसाई देशों में भी धर्मांतरण के लिए विवादित रही है। समय-समय पर भारत में इस तरह के तमाम मामले सामने आ चुके हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि मदर टेरेसा की संस्था चैरिटी ऑफ मिशन ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए धर्मांतरण को बढ़ावा देती रही है। मदर टेरेसा को भी वेटिकन की एक सोची -समझी रणनीति के तहत भारत में भेजा गया। उसी रणनीति का यह परिणाम था कि ईसाई साम्राज्य की बढ़ोतरी में रूचि लेने वाली तमाम बहुराष्ट्रीय कंपनियां यहां तक कि बीबीसी जैसे प्रचार माध्यम भी उनको भारत में स्थापित करने के लिए सक्रिय हुए। कोडक जैसी बड़ी कंपनियों ने तो बाकायदा अपने मुनाफे का एक निश्चित अंश मदर टेरेसा के इस कार्य के लिए देने की घोषणा की।
मदर टेरेसा का शुरुआती लक्ष्य गरीबों, बेसहाराओं के बीच अपनी सेवाभावी छवि स्थापित करना था और इसमें बीबीसी ने एक बड़ी भूमिका निभाई। मदर टेरेसा ने गरीबों, असहाय लोगों के बीच अपनी लघु फिल्म तैयार करने व पूरी दुनिया में इसका प्रचार-प्रसार करने के लिए बीबीसी का सहारा लिया। यहीं से उन्हें संत घोषित करने की मांग भी उठाई गई। जिस लघु फिल्म के सहारे यह सारा पाखंड रचा गया उसमें किस हद तक अंधविश्वास को स्थान दिया गया यह जानना भी बेहद दिलचस्प है। इसमें मोनिका नाम की एक लड़की को उनके चमत्कार से सही होते दिखाया गया। इस फिल्म में मदर टेरेसा मोनिका के शरीर पर हाथ रखती हैं और उसके गर्भाशय का कैंसर ठीक हो जाता है।
इस फिल्म के बाद पूरा ईसाई तंत्र इस प्रचार में जुट गया कि मदर टेरेसा के पास चमत्कारिक शक्ति है इस लिए वो संत होने के लायक हैं। अब इसे क्या कहा जाए यह अंधविश्वास नहीं तो और क्या था?
चूंकि उस समय देश पर ईसाइयत को बढ़ावा देने की समर्थक सरकार सत्तासीन रही अत: उसने इस पाखंड और अंधविश्वास का तनिक भी विरोध नहीं किया। यहां तक कि मदर टेरेसा में आस्था रखने वाले तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादी लोग जिनके कि आज भी भागवत जी के सच पर पेट में मरोड़ हो उठी है मुंह सीकर बैठे रहे। इस घटनाक्रम के बाद मदर टेरेसा न केवल संत के रूप में स्थापित हो गई बल्कि भारत के आदिवासियों, वनवासियों, गरीबों, बेसहाराओं के बीच जाकर स्वास्थ्य सेवा के नाम पर उनके धर्मांतरण का जमकर कुचक्र चलाया गया।
भारत के जाने-माने समाज सेवक और भारत स्वाभिमान आंदोलन के प्रणेता स्व. राजीव दीक्षित ने अपने एक भाषण में साफ तौर पर कहा था कि जिस अंध विश्वास के नाम पर मदर टेरेसा को संत घोषित किया गया अगर वास्तव में उनमें ऐसी कोई चमत्कारिक शक्ति होती तो उसने उस ईसाई फादर के ऊपर हाथ क्यों नहीं रखा जो खुद 20 वर्षों से हाथ पैर कांपने वाली बीमारी से पीडि़त था। पुराने कांग्रेसी रहे नवीन चावला द्वारा मदर टेरेसा पर लिखी गई पुस्तक में स्वयं मदर टेरेसा ने स्वीकारा था कि वे कोई सोशल वर्कर नहीं हैं वे तो जीसस की सेवक हैं तथा उनका काम ईसाइयत का प्रसार है। इससे स्वत: स्पष्ट हो जाता है कि मदर टेरेसा का काम सेवा की आड़ में धर्मांतरण था।
मदर टेरेसा के जीवन पर आधारित एक शोध भी उनके संदेहास्पद क्रियाकलापों की पोल खोलता है। यूनिवर्सिटी ऑफ मॉन्ट्रियल्स के सर्गे लेरिवी और जैन विएव यूनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के करोल ने मदर टेरेसा के जीवन कार्यों और तथाकथित चमत्कारों के ऊपर एक शोध किया। इस शोध में उन्होंने मदर टेरेसा के दीन-दुखियों की मदद के तरीके को संदेहास्पद करार देते हुए कहा कि उन्हें प्रभावशाली मीडिया कैंपेन के जरिए महिमा मंडित किया गया। यही नहीं उन्होंने मदर टेरेसा को धन्य घोषित किए जाने पर वेटिकन पर भी सवाल उठाए थे। शोध में कहा गया कि बीमार को ठीक करने का चमत्कार मदर टेरेसा नहीं बल्कि दवाइयों ने किया। लेरिवी ने दावा किया कि वेटिकन को उन्हें धन्य या संत घोषित करने के पहले गरीबों की उनकी सेवा के संदेहास्पद तरीकों पर गौर करना चाहिए था।
यहां इस बात का जिक्र भी आवश्यक है कि आखिर जो उपाधि मदर टेरेसा को दी गई उस उपाधि प्राप्त व्यक्ति का कार्य व्यवहार क्या वास्तव में ऐसा होना चाहिए जैसा कि टेरेसा का था।
सर्वविदित है कि मदर टेरेसा की मृत्यु के समय सुसान शील्डस को न्यूयार्क बैंक में पचास मिलियन डॉलर की रकम जमा मिली, ये सुसान वही थे जिन्होंने मदर टेरेसा के साथ उनके सहायक के रूप में 9 साल तक काम किया था। सुसान ही चैरिटी में आए दान का हिसाब रखती थी। सवाल यह खड़ा होता है कि जो लाखों रुपया गरीबों और दीन-हीनों की सेवा में लगाया जाना था वह न्यूयार्क की बैंक में यूं ही फालतू क्यों पड़ा था।
मदर टेरेसा ऐसे घोटालेबाजों और तानाशाहों से भी जुड़ी थीं जो विश्वभर में बदनाम थे। ऐसे ही घोटालेबाज थे अमेरिका के एक बड़े प्रकाशक और कर्मचारियों की भविष्य निधि फण्ड में 450 मिलियन पाउंड का घोटाला करने वाले मैक्सवेल उन्होंने टेरेसा को 1.25 मिलियन डॉलर का चंदा दिया था। हैती के तानाशाह जीन क्लाउड ने टेरेसा को बुलाकर सम्मानित किया था और टेरेसा ने इस आतिथ्य का विरोध करने के बजाए इसे स्वीकार किया था।
इतना ही नहीं मदर टेरेसा ने आपातकाल लगाने के लिए इंदिरा गांधी की तारीफ की थी और कहा था आपातकाल लगाने से लोग खुश हो गए हैं और बेरोजगारी की समस्या हल हो गई है। वास्तव में क्या ये आचरण किसी धार्मिक संत का कहा जा सकता है?

2 Responses to “टेरेसा की असलियत पर बखेड़ा क्यों?”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन

    अट्ठारवी -उन्नीसवीं शती में झायगनबाल्ग नामक पुर्तगाली इसाई मिशनरी २२ बार पण्डितों से वाद विवाद करके हार गया था।
    तब से मिशनरियों ने गठ्ठन बांध ली थी; कि, हिन्दू के सामने तर्क से कभी जीता नहीं जा सकता।
    मात्र धनके बलपर अनपढ बस्तियों में कन्वर्जन चलाया जा सकता है।
    बस तभी से ढूंढ ढूंढ कर जहाँ जहाँ भी ऐसी ज़रूरतों से पीडित लोग रहते हो, उन्हें सहायता देकर, इसाइयत का धंधा चलाओ।
    इनके एजण्ट घूम घूंम कर शिकार के शोध में रहते हैं।
    मिलते ही सहायता का वादा करके आत्माओं की फसल काटते है।
    मरते मनुष्यों का अनुचित लाभ लेकर-अपना नंबर बढाते हैं।
    नवम्बर डिसम्बर में अधिक कन्वरजन इस लिए होते हैं, कि, अगले वर्ष की बजट की राशि इस वर्ष के कुल कन्वर्जन के नंबर पर आधार रखती है।
    युरप में चर्च बिक रहे हैं।
    क्यों कि ईसाई चर्च जाते नहीं।
    अब क्या करें?
    भारत में जब तक गरीब है, तब तक कन्वर्जन चलेगा।

    ——————————-
    कलकत्ते की ऐसी ही गरीब बसति में ये टेरेसा काम करती थी।
    नोबेल प्राइस एक राजनीति का हिस्सा है।
    कुछ छिपाहुआ पॉलिटिक्स।

    मूरख भारतीयों को बुद्धु बनाया जाता है।

    अनुरोध।

    इसी प्रवक्ता में, मानसिक जातियाँ १, २, और ३ पढें। और युरप के चर्च बिक रहे हैं, उसे भी पढें।

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  2. sureshchandra.karmarkar

    आपके लेख से सहमति के बाद भी एक वास्तविकता से हम आँखे नहीं मुंड सकते. हमारे संत टेरेसा के मुकाबले आश्रम/सेवा/केंद्र/ चलाते हैं क्या?पिछले दिनों हरियाणा के एक संत की कितनी विशाल मिलकियत उजागर हुई?इसके पूर्व एक संत यौनाचार के मामले में कारागार में हैं. दक्षिण के एक संत इसी प्रकार का एक प्रकरण का सामना के रहे हैं.उन्होंने पौरुषत्व का परीक्षण करने से भी मना किया था. हरियाणा के एक और संत जो पूर्व में एक दल के समर्थक थे अब दूसरे दल के समर्थक हैं.इन पर भी साधकों को नपुंसक बनाने के आरोप हैं. हमारे साधु संतों को धर्म परिवर्तन या घर वापसी के लिए किसने रोका है?संविधान के दायरे में ये किसी किसी गरीब,अपाहिज का धर्म परिवत्र्तन तो करें. केवल धर्म परिवर्तन की तारीखें निकालना। उसका प्रचार करना। और एक हव्वा खड़ा करना कहाँ तक हमारे सनातन धर्म की सेवा होगी. छत्तीसगढ़ के जूदेव ,बाबा आमटे ,सरीखे महान लोग चाहियें. गायत्री परिवार, राधास्वामी सत्संग के साधकों के जीवन में परिवर्तन आये हैं. मेरे (म.प्र.)के देहात देहात में राधास्वामी सत्संग के साधक हैं जो अधिकांश आर्थिक रूप से और सामाजिक रूप से पिछड़े हैं उनके जीवन में आया परिवर्तन देखें. गायत्री समाज ने और राधास्वामी सत्संग ने देश में एक नैतिक बल खड़ा किया है. वैसे आप ने टेरेसा के बारे में जो तथ्य उद्घाटित किये हैं वे छदम धर्म निरपेक्ष वादियों और वामपंथियों के गले उतरेंगे नही. उनकी धर्म निरपेक्षता इसी में है की वे इस देश के बहुसंख्यक सनातनियों के धर्म उपदेशकों को सम्प्रदायवादी बताएं

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