लेखक परिचय

अनुज अग्रवाल

अनुज अग्रवाल

लेखक वर्तमान में अध्ययन रत है और समाचार पत्रों में पत्र लेखन का शौक रखते हैं |

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thappadआजकल थप्पड़ वाला फैशन चल रहा है | पहले जूते फेंकने का था | पर अब वो आउटडेटेड हो गया है | जूता वाला फैशन सक्सेसफुल नहीं था | कई पेंच थे उसमे सबसे बड़ा झंझट था निशाना लगाने का | अब हर कोई अभिनव बिंद्रा तो है नहीं जो 4 करोड़ खर्च कर निशाने बाजी सीखे | अपने यहाँ लोग या तो गुलेल से कबूतर उड़ा के निशाना लगाना सीखते हैं या देशी तमंचे से लोगो को उड़ा कर | अब कबूतर तो साइबेरिया चले गए और तमंचे सारे सपाइयो ने हथिया लिए | ऐसे में आम आदमी निशाना लगाना सीखे भी तो भला कैसे ? दूसरा दम चाहिए भाई जूता फेंकने के लिए | पुरे 271.05 ग्राम का जूता उठाना और उसे ठीक 15 मीटर तक फेंकना कोई बच्चो का खेल नहीं | पर ताकत आये भी तो आये कहाँ से ? “मंहगाई के ज़माने में आम आदमी को 3 रूपये के गुटखे खाने से पहले हफ्ते भर का बजट बनाना पड़ता है | 30 रुपये का अमूल दूध मेंगो मैन घंटा पिएगा ? कुपोषण की हालत तो ये है कि फिका हुआ जूता पाकिस्तान के 2000 किलोमीटर वाली मिसाइल की तरह 14 वे किलोमीटर ही पर गिर जाता है |” तीसरा जूता फेंकने की योग्यता आपके भौतिक विज्ञान(फिजिक्स), और गति विज्ञान(डायनामिक्स) के सटीक ज्ञान पर भी निर्भर करती है | अब भौतिक और गति विज्ञान जैसे तुर्क शब्दों की बात छोडिये हम लोगो को सामान्य विज्ञान क्या होता है यही नहीं पता | होता क्या है कि विज्ञान पढ़ाने वाली मैडम को इस वाली मेरिज एनिवर्सरी पर अपने पतिदेव को हाथ से बुना रैबिट छपा स्वेटर गिफ्ट करना है | “पिछली 23 सालो से मैडम स्वेटर में रैबिट के कान की जगह पूंछ बनाती आ रही हैं | इस बार ठान के बैठी है कि खरगोश में कान ही लगाएंगी पूछ नहीं | इसीलिए सारा ध्यान उत्तोलको की जगह सलाइयो पर है | भविष्य के सर आइजैक न्यूटन बनने में यही सबसे बड़ी बाधा है | यही कारण है कि अपने यहाँ के बड़े से बड़े बुद्धिजीवी 2+2 = “2002” बताते हैं | इन सब के साथ साथ जूता फेंकना अपनी अर्थव्यवस्था के लिए भी ठीक नहीं है | अब देखिये न एडिडास का वेंटिलेशन वाला जूता 30+20 % डिस्काउंट के बाद भी पुरे 2611 का पड़ा था | इतना महंगा जूता अगर आप किसी 2 कौड़ी के आदमी पर फेंक दे तो भले ही आप खुद को रजनीकांत फील करें पर मेरी नजर में तो आप कमाल खान ही साबित होंगे | इन सबसे उलट थप्पड़ मारने के लिए इन सब की जरूरत नहीं पड़ती | न दम ख़म की जरूरत न फिजिक्स के ज्ञान की और एकदम से बजट में याने के इकोनोमिकल | बस कंटाप के बाद चटाक, इतिश्री और परम सुख की प्राप्ति | ऊपर से नेम फेम के साथ-साथ फेसबुक पर आपके घटिया से घटिया पोस्ट पर 300 लाइक 62 शेयर फ्री | यकीन न हो तो कभी ट्राई करके देखिये |

12 Responses to “थप्पड़शास्त्र”

  1. अनुज अग्रवाल

    सभी महानुभावो से क्षमा प्रार्थी हूँ | अभी कॉलेज में परीक्षा चल रही थी जिसके कारण किसी को भी प्रतिउत्तर नहीं दे सका |
    -आपका अनुज

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  2. शिवेंद्र मोहन सिंह

    इस सतही विधा का चलन इसी बार के लोकसभा के चुनावों में देखने को मिला, नेम फेम के लिए इसे औजार बनाने की सतही कोशिश की गई थी, लेकिन सजग सोशल मिडिया ने अंदरखाने के इस खेल को उजागर करके इस खेल को धराशाई कर दिया, फिर सलीम बन स्याही फेंक का खेल शुरू करने की नाकाम कोशिश की गई। लेकिन कोई भी कोशिश सिरे नहीं चढ़ सकी। न खुदा ही मिला न विसाले सनम न इधर के रहे न उधर के रहे। वैसे ये विधा ना उभरे इसी में सभी का भला है।


    सादर,

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    • अनुज अग्रवाल

      आदरणीय शिवेंद्र जी,
      सही कहा सर जी | जो बात आप तर्कों के साथ सभ्य भाषा में रख सकते हैं वो जोर जबरदस्ती या “थप्पड़ो” के बल पर नहीं |

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  3. आर. सिंह

    आर. सिंह

    मुझे तो कुछ गड़बड़ी नजर आ रही है. क्या लोग अपनी अपनी गाल बचाने में लगे हुए हैं या थपड खाए हुए गाल को सहलाने में लगे हैं कि अभी तक इस व्यंग्य पर ढंग की कौन कहे ,कोई टुटपुँजिया टिप्पणी भी नहीं आई?

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      • आर. सिंह

        आर. सिंह

        जिस दिन मैंने यह टिप्पणी प्रवक्ता में प्रकाशन के लिए भेजी थी,उस दिन तक इस व्यंग्य पर कोई टिप्पणी नहीं आई थी.

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  4. डॉ.अशोक कुमार तिवारी

    सच है —————-रिलायंस के गवर्नेंस में केजरीवाल ही बाधक हैं : – – – इसीलिए सारे बेईमान केजरीवाल के ही पीछे पड़े हैं – लगता है जनता ने इसीलिए जनादेश दिया है – – -अप्रत्यक्ष रूप से साजिया का इशारा भी रिलायंस की तरफ था – – – – और भी लोगों को मिलाने की कोशिश की जा रही है – – पर लोग समझ रहे हैं – – – – –
    वैसे हिटलर और मुसोलिनी ने भी ऐसे ही अपने विरोधियों को जेल में डलवाकर सारी दुनिया को द्वितीय विश्वयुद्ध की ओर धकेला था – – –
    2014 में सत्ता पलट एक समझौते के तहत हुआ है (यदि आप सहमत हैं तो ही लाइक करना) : – – -जैसा कि नीरा राडिया टेप से पता चलता है पूरा कांग्रेस मंत्रिमंडल मुकेश अम्बानी का ही था – रिलायंस के व्यवस्था अनुसार पाँच सालों तक कांग्रेसी जैसे भी लूटें कोई कुछ बोलेगा नहीं – जनता लुटती और कराहती रही, महँगाई से त्रस्त रही, सीमा पर उपद्रव होते रहे, बाबा रामदेव को सलवार-सूट पहनकर भागना पड़ा, बूढ़े अन्ना चिल्ला-चिलाकर थक गए, किरण बेदी भी अपने डिमोसन का कोई प्रतिकार ना पा सकीं – – – पर विपक्ष चुप रहा –
    पाँच सालों तक एक भी अविश्वास प्रस्ताव बी.जे.पी. नहीं लाई क्योंकि उनके आका ने मना कर रखा था और 2014 में आपको सता मिल जाएगी तबतक धैर्य रखो ऐसा शायद निर्देश भी रहा हो – चुनाव में राहुल-प्रियंका और सोनिया के अलावा अन्य कांग्रेसी तो आराम फरमा रहे थे दिग्गी जैसे लोग तो मिल बाँट्कर खाने में लगे थे !
    यहाँ तक कि कांग्रेस समर्थित अन्य पार्टियाँ भी प्रेम से ऐसे लड़ रही थीं——- सब कुछ ठीक चल रहा था जनता मूर्ख बन रही थी तबतक कहाँ से केजरीवाल प्रकट हो गया – – सिक्ख दंगों पर एस.आई.टी. जाँच और रिलायंस के खिलाफ कैग में एफ.आई.आर. करवाकर बारूद में आग लगा दी – – – – रातोंरात आका के निर्देश पर सभी पार्टियाँ एक होकर वो कुहराम मचा दीं कि आम आदमी पार्टी के एम.एल.ए. तक को सड़क पर चलते झापड़ पड़ने लगे और सभी पार्टी के नेता बेशर्म हँसी हँसते रहे ये भी नहीं सोचा कि कौन सी परम्परा वे रखवा रहे हैं – केजरीवाल सत्ता छोड़ने को मजबूर तो हुए पर सभी को लगने लगा ये हम सबके लिए खतरनाक है और आज तक लग ही रहा है – – काश जनता समझ पाती – – –

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    • अनुज अग्रवाल

      आदरणीय अशोक जी,
      ये एक व्यंग है | ये मैंने केजरी सर या किसी और व्यक्ति के ऊपर नहीं लिखा है | इसमें सपाई गुंडागर्दी , खेलों मे राजनीति, मंहगाई , और शिक्षा व्यवस्था पर कटाक्ष किया गया है | उसी सन्दर्भ में लिया जाना चाहिए |

      सादर _/\_

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  5. mahendra gupta

    पर कई बार थप्पड़ के साथ मुक्कों का भी आदानप्रदान हो जाता है , जिसकी संभावना ज्यादा है इसलिए जनाब कोई भी इनका फार्मूला अपनाये तो मुक्कों के लिए भी तैयार रहे , मुहं का भूगोल बिगड़ेगा ही, साथ ही कमर व पैर का साइज भी बदल जायेगा

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