स्वस्थ जीवन का आधार ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र,योगासन-व्यायाम एवं शुद्ध शाकाहारी भोजन

मनमोहन कुमार आर्य

आज के समय की सबसे बड़ी समस्या मनुष्य का स्वास्थ्य ठीक न रहना है। स्वास्थ्य का सम्बन्ध हमारे सुखों एवं दीर्घायु से है। यदि हम स्वस्थ हैं तो हम सुखी हैं और दीर्घायु हो सकते हैं और यदि स्वस्थ नहीं तो फिर रोग के अनुसार हम दुःखी रहते हुए अस्पतालों के भारी बिलों से त्रस्त रहते हुए, अनेकानेक दुःख भोगते हुए असमय मृत्यु का शिकार हो सकते हैं। अतः मनुष्य को सबसे अधिक यदि किसी बात पर ध्यान देने की आवश्यकता है तो वह है स्वास्थ्य। संबंधी कुद सरल उपायों पर हम आज चर्चा कर रहे हैं जिससे न केवल हमें स्वस्थ जीवन मिलेगा अपितु इससे हमारे इस जन्म के सुखों में वृद्धि होगी और साथ ही हमारा परजन्म भी सुधरेगा। स्वस्थ रहने के लिए पहला आवश्यक उपाय ईश्वर को जानना और उसके अनुरुप भक्ति करना है। ईश्वर भक्ति से मन शान्त रहता है जिससे मनुष्य स्वस्थ रहता है और उसमें रोगोत्पत्ति की सम्भावना कम व न के बराबर रहती है। ईश्वरभक्ति का एक लाभ यह भी होता है कि वह हर स्थिति में प्रायः शान्त व सन्तुष्ट रहता है। ईश्वरभक्त मनुष्य स्वस्थ व अस्वस्थ जीवन को ईश्वर की ही किसी व्यवस्था का परिणाम मानता है जो कि उसके कर्मों से जुड़ी होती है। मनुष्य जब ईश्वर की भक्ति करता है तो स्तुति, प्रार्थना व उपासना करते हुए वह ईश्वर से सुख, शान्ति, निरोग जीवन सहित ज्ञान वृद्धि व सबके सुख की कामना करता है। ईश्वर सर्वव्यापक व सर्वान्तर्यामी होने से उसकी बात सुनता है और भक्त की पात्रता के अनुसार उसे पूरा भी करता है। ईश्वर भक्ति में किसी प्रकार का कोई धन व्यय नहीं होता परन्तु इससे लाभ सबसे अधिक होता है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य को प्रातः व सन्धि वेला में दो समय ईश्वर की भक्ति करनी चाहिये। महर्षि दयानन्द ने ईश्वर भक्ति को सन्ध्या करना बताया है। इसकी सर्वोत्तम चिधि भी सन्ध्या के नाम से उन्होंने लिखी है जिससे लाभ उठाया जाना चाहिये। यह आवश्यक है कि सन्ध्या के साथ वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन तथा स्वाध्याय भी किया जाये। स्वाध्याय भी एक प्रकार की सन्ध्या ही होती है। इसमें ईश्वर के गुणों का अध्ययन करने पर हमारे ईश्वर विषयक विचार दृण होते हैं, ज्ञानवृद्धि होती है जिसका लाभ ईश्वर का ध्यान करने में मिलता है। स्वाध्याय करने से ईश्वर व जीवात्मा सहित प्रायः सभी विषयों का आवश्यकता के अनुरूप ज्ञान हो जाता है जो जीवन में बहुत लाभ पहुंचाता है। स्वाध्याय के लिए वेद सहित उपनिषद, दर्शन, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों का अध्ययन किया जाना चाहिये। अन्य भी अनेक ग्रन्थ हैं जिनसे ईश्वरोपासना एवं जीवन में बहुत लाभ मिलता है।

 

स्वस्थ जीवन के लिए दैनिक अग्निहोत्र करना भी लाभप्रद होता है। अग्निहोत्र को देवयज्ञ व हवन भी कहते हैं। यह पांच महायज्ञों में मनुष्य का दूसरा प्रमुख कर्तव्य है। इसके करने से वायु की शुद्धि सहित जल की शुद्धि होने सहित अनेक आध्यात्मिक लाभ भी होते हैं। अग्निहोत्र में स्तुति, प्रार्थना, उपासना सहित जो अन्य मन्त्र यज्ञाग्नि में आहुति आदि देने के लिए बोले जाते हैं उनसे भी ईश्वर की प्रार्थना व उपासना होती है। आत्मिक ज्ञान बढ़ने के साथ जीवन की उन्नति होती है जिससे मनुष्य जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होती है। यज्ञ का प्रमुख द्रव्य गोघृत होता है। इसके दहन से वायु में स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले कीटाणुओं का भी नाश होता है। पर्यावरण प्रदुषण भी नष्ट होता व घटता है। हससे हम रोगों से बचते हैं। इससे हमारे शरीर में गोघृत के सूक्ष्म कणों से मिश्रित शुद्ध वायु प्रवेश करती है जिससे रक्त की शुद्धि होने से अनेक रोग ठीक होते हैं। यज्ञ के समय हम  ईश्वर से जो स्वास्थ्य, व्यवसाय, रोगनिवृति, सन्तान के सुन्दर भविष्य व अन्य प्रार्थनायें करते हैं वह भी ईश्वर के सर्वव्यापक होने से सुनी जाती हैं और पूरी की जाती हैं। संक्षेप में यहां इतना ही वर्णन कर रहे हैं। स्वाध्याय करने पर यज्ञ वा अग्निहोत्र का विस्तृत ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

 

मनुष्य का शरीर हाड़-मांस का बना हुआ है। इसे निरोग रखने के लिए आसन व व्यायामों की आवश्यकता है। प्राणायाम भी स्वस्थ शरीर व निरोग जीवन का आधार हैं। प्राचीन काल में रचित अष्टांग योग वा योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ने आसन को यम व नियम के बाद तीसरे स्थान पर रखा है। इसका यह अर्थ होता है कि ध्यान व समाधि को सिद्ध करने के लिए पहले यम, नियम व आसनों को सिद्ध करना होगा। यदि यह सिद्ध नहीं होंगे तो ध्यान व समाधि भी सिद्ध नहीं हो सकती। शायद यही कारण था कि महाभारतकाल व उससे पूर्व हमारे देश के लोग सौ वर्ष से भी अधिक जीवित रहते थे। ऐसा होना उस समय आम बात थी। आज भी यदि हम ऐसा करते हैं तो हम स्वस्थ व निरोग रहते हुए दीर्घायु को प्राप्त कर सकते हैं। योग का प्रचार स्वामी रामदेव जी द्वारा विगत अनेक वर्षों से किया जा रहा है। उनके प्रयासों से आसन व प्राणायाम का विश्व स्तर पर सघन प्रचार हुआ है। आज उनके व प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रयासों से विश्व योग दिवस तक मनायें जाने लगे हैं। योग पूरे विश्व में प्रतिष्ठा को प्राप्त हुआ है जिसका मुख्य कारण इससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ व सुखी जीवन को दिया जा सकता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यज्ञ द्वारा स्वास्थ्य लाभ व सुखी जीवन की पुष्टि हो चुकी है। अतः योगासन व प्राणायाम को भी प्रातः व सायं करने का अभ्यास करना चाहिये। ऐसा करके हम सुखी रह सकते हैं।

 

स्वास्थ्य में विकार का एक कारण हमारा अभक्ष्य पदार्थों से युक्त व असन्तुलित भोजन भी हुआ करता है। हमें सदैव शुद्ध, पवित्र, शाकाहारी व पौष्टिक भोजन ही करना चाहिये। मांस, अण्डे, मछली, घूम्रपान, असयम भोजन, फास्ट फूड, रसायन युक्त पेय पदार्थ, मदिरा वा शराब आदि से स्वास्थ्य को हानि पहुंचती हैं। दाल, रोटी, हरी तरकारियों से युक्त भोजन, मौसमी फलों सहित गोदुग्ध स्वस्थ जीवन का आधार है। बादाम, काजू, किसमिश आदि का सेवन भी करना लाभप्रद होता है। यदि हम समय पर अल्प मात्रा में शाकाहारी भोजन करते हैं तो इससे हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा, रोग होंगे नहीं अथवा कम से कम साध्य कोटि के होंगे जिसे आयुर्वेद व योगाभ्यास से ठीक किया जा सकेगा। इस ओर प्रत्येक मनुष्य को ध्यान देना चाहिये। ब्रह्मचर्य का पालन भी स्वस्थ जीवन का आधार है। श्री राम, श्री कृष्ण, ऋषि दयानन्द, चाणक्य, आचार्य शंकर आदि सभी ब्रह्मचारी थे। ब्रह्मचर्य की शक्ति से ही वह मेधा बुद्धि को प्राप्त कर सके तथा जीवन में अनेक महत्वपूर्ण व मानवता के उपकार के कार्य कर सके। ब्रह्मचर्य का भी जीवन में ध्यान रखना चाहिये। यह आम मनुष्य के लिए भी साध्य है।

 

स्वस्थ जीवन धारण करने में दिनचर्या का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। समय पर सोना व समय पर जागना भी मनुष्य को स्वस्थ रखता है। प्रातःकाल भ्रमण करना स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। ऋषि दयानन्द जी का जीवनचरित पढ़ने पर ज्ञात होता है कि वह प्रातः भ्रमण के लिए जाते हैं। बरेली प्रवास के दौरान स्वामी श्रद्धानन्द जी उनके सम्पर्क में आये थे और उन्होंने स्वामी दयानन्द के प्रातः लगभग 3 बजे भ्रमण पर जाने की दिनचर्या का वर्णन किया है। स्वस्थ व सुखी जीवन की प्राप्ति के लिए किसी मनुष्य को किसी के साथ अन्याय व उसका शोषण नहीं करना चाहिये। जितना बन सके परोपकार के कार्य भी करने चाहियें। सज्जन पुरुषों की मित्रता और दुर्जनों से दूरी रखना भी मनुष्य को सुखी रखता है। हम यह भी अनुभव करते हैं कि मनुष्य को वेद आदि साहित्य के साथ ऋषि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम आदि के जीवन चरित भी पढ़ने चाहियें। इनसे हम अपनी दिनचर्या का सुधार कर सकते हैं और अनेक उपयोगी जानकारियों भी प्राप्त कर सकते हैं। हम आशा करते हैं कि इन कुछ उपायों पर यदि हम ध्यान देते हैं तो हमें अवश्य लाभ होगा। इसी के साथ इस चर्चा को विराम देते हैं। ओ३म् शम्।

 

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