बड़ी चुनौती है नासूर बन चुके प्लास्टिक प्रयोग को नियंत्रित करना

0
662

                                                                          निर्मल रानी

                                                पॉलीथिन और प्लास्टिक का दिनोंदिन बढ़ता जा रहा उपयोग इस समय पूरे देश और देशवासियों के लिये विकराल समस्या का रूप धारण कर चुका है। पहले भी इसे नियंत्रित करने के कई असफल प्रयास हो चुके हैं परन्तु इसका उपयोग कम होना तो दूर और भी बढ़ता ही जा रहा है। तेज़ रफ़्तार ज़िन्दिगी और मानवीय आवश्यकताओं ने तो इनका चलन बढ़ाया ही है साथसाथ प्लास्टिक व पॉलीथिन उद्योग तथा इसके उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल के बड़े व प्रभावशाली उत्पादनकर्ता उद्योगपतियों के ऊँचे रसूख़ के कारण भी इस पर नियंत्रण पाना आसान नहीं है। बहरहाल एक बार फिर भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पॉलीथिन और सिंगल यूज़ प्लास्टिक को प्रतिबंधित करने का आदेश जारी किया है। मज़े की बात तो यह है कि प्रतिबंधित किये जाने वाली प्लास्टिक व पॉलीथिन सामग्री की जो सूची जारी की गई है उससे कई गुना पॉलीथिन व प्लास्टिक का इस्तेमाल प्रतिबंधित सूची से बाहर रखी गई अनेक वस्तुओं में किया जाता है। 1 जुलाई से जिन प्लास्टिक उत्पाद को प्रतिबंधित किया गया है उनमें पॉलिथीन बैग,प्लास्टिक की प्लेट, कप, गिलास, कांटे, चम्मच, चाकू व ट्रे सहित अन्य कटलरी संबंधित सामग्री के साथ साथ सिगरेट पैकेट के ऊपर की पन्नी, ग़ुब्बारे की प्लास्टिक की छड़ें, प्लास्टिक ईयर बड,मिठाई बॉक्स व निमंत्रण कार्ड पर लगाई जाने वाली प्लास्टिक, थर्मोकॉल का सजावटी सामान, पीवीसी के बैनर व 75 माइक्रॉन तक के पॉलिथीन आदि मुख्य रूप से शामिल हैं। सरकार द्वारा जारी अधिसूचना के मुताबिक़ एक जुलाई से उपरोक्त पलास्टिक व पॉलीथिन सामग्रियों व 75 माइक्रॉन से कम मोटाई वाले पॉलिथीन के निर्माण, विक्रय, वितरण भंडारण, परिवहन व उपयोग प्रतिबंधित हो गया है । जबकि अधिसूचना के अनुसार 31 दिसंबर के बाद 120 माइक्रोन तक के पॉलिथीन पर भी रोक लगा दी जायेगी ।                             

                                 सरकारी अधिसूचना के अनुसार इन सामग्रियों के उपयोग के निर्धारित मानदंडों का यदि कोई भी व्यक्ति उल्लंघन करेगा वह पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत निर्धारित दंड का भागीदार होगा। इस अधिनियम का अनुपालन करने में विफल रहने वाले व्यक्ति को पांच साल तक के कारावास या एक लाख रुपये तक के जुर्माने या दोनों की सज़ा सुनाई जा सकती है। और यदि कोई इसके अनुपालन में विफल होगा या इन नियमों का बार बार उल्लंघन करेगा तो हर दिन के हिसाब से उस अवधि के दौरान जब तक कि उल्लंघन जारी रहता है, उल्लंघनकर्ता व्यक्ति पर प्रतिदिन के हिसाब से पांच हज़ार रुपए अतिरिक्त जुर्माना लगाया जा सकता है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार सरकार के इस निर्णय से पर्यावरण को लाभ होगा। क्योंकि सूखे कचरे में पॉलिथीन व सिंगल यूज प्लास्टिक पर्याप्त मात्रा में होता है। जोकि पर्यावरण के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। विशेषज्ञों की मानें तो सरकार के इस फैसले से सूखे कचरे में कमी तो ज़रूर आएगी परन्तु इसके सकारात्मक परिणाम के लिए कम से कम दो साल तक प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है। प्लास्टिक व पॉलीथिन जैसे उत्पाद केवल पर्यावरण को ही नुक़्सान नहीं पहुंचाते बल्कि नाली व नालों को बाधित कर गंदे जल प्रवाह को भी रोकते हैं। यहाँ तक कि वर्षा ऋतु में तो यह ख़ास तौर पर शहरी क्षेत्रों में बाढ़ जैसी स्थिति भी पैदा कर देते हैं।

                                 आज हमारे देश में प्लास्टिक व पॉलीथिन का इस्तेमाल सबसे अधिक दूध की थैलियों के रूप में तथा पानी की बोतलों की शक्ल में हो रहा है। इनके अतिरिक्त कोल्ड ड्रिंक्स व शराब भी अधिकांशतयः प्लास्टिक बोतलों में ही आने लगी हैं। आज कल और भी नित्य नये नाना प्रकार के जूस व ड्रिंक्स के अनेकानेक उत्पाद प्लास्टिक की बोतलों में ही आने लगे हैं। दवाइयों के पैक,मेडिकल संबंधी तमाम उत्पाद,गुटका,तंबाकू आदि बहुत सारी चीज़ें प्लास्टिक व पॉलीथिन पैक में होती हैं। क्या सरकार इन्हें प्रतिबंधित किये बिना प्लास्टिक कचरा मुक्ति व पर्यावरण सुधार की कल्पना कर सकती है ? अब रहा सवाल इसके बेचने वालों या इस्तेमाल करने वालों पर सज़ा या जुर्माने का। तो यह भी सरकार का नैतिकता पूर्ण क़दम नहीं कहा जा सकता। क्योंकि सरकार को इन सब सामग्रियों को प्रतिबंधित करने से पहले इनके विकल्प तलाश करने चाहिये। आम लोगों को कम से कम एक वर्ष तक इनके इस्तेमाल से होने वाले नुक़सान के प्रति जागरूक करना चाहिये। और इनकी वैकल्पिक व्यवस्था से परिचित कराना चाहिये। चाहे वह पुराने ज़माने की तरह अपने घर से ही कपड़े के थैले लेकर निकलने की आदत डालना ही क्यों न हो। और इन सब के साथ इसके उत्पादन की जड़ों पर भी प्रहार करना चाहिये।

                                   सभी जानते हैं कि प्लास्टिक व पॉलीथिन, पेट्रोलियम उत्पाद से तैय्यार होने वाली सामग्रियां हैं। और देश यह भी जानता है कि देश के पेट्रोलियम स्रोतों पर किसका क़ब्ज़ा है। कोल्ड ड्रिंक उत्पादकों के हाथ कितने लंबे हैं और दूध उत्पादक डेयरियां किनकी हैं। गुटखा नेटवर्क कितना सशक्त है और शराब उद्योग पर कितने बड़े लोगों का क़ब्ज़ा है। लिहाज़ा ऐसे उद्योगपतियों को झुका पाना या इन्हें प्लास्टिक व पॉलीथिन मुक्त बना पाना संभवतः किसी भी सरकार के वश में नहीं। सरकार को यदि पर्यावरण की वास्तव में इतनी फ़िक्र है तो दुकानदारों या थैली धारकों पर सज़ा या जुर्माना नहीं बल्कि इनके उत्पादन पर प्रतिबंध लगाये और नियम की अनुपालना न करने पर इसके उत्पादनकर्ताओं को सज़ा दे । जब तक सरकार ऐसा नहीं करती तब तक नासूर बन चुके प्लास्टिक प्रयोग को नियंत्रित करना एक बड़ी चुनौती साबित होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here