आगरा में इसाई समाज

christiansडा. राधेश्याम द्विवेदी

इसाई समाज के तीन समूहः- इसाई समाज में उनके धार्मिक मान्यता के अनुसार तीन समूह होते हैं -पहला रोमन कैथलिक होता है, जो मूलतः रोम से निकला है और पूरे विश्व में फैला हुआ है। दूसरा समूह पूर्वी आर्थोडाक्स तथा तीसरा प्रोटेस्टेट। भारत में 1533 ई. में पुर्तगाली ईसाई समाज हिन्द महासागर के पश्चिमी तट स्थित गुजरात, दमन, दीव तथा गोवा आदि स्थानों पर आये थे। गोवा में 1534 में डायओसिस ( विशप प्रदेश ) का निर्माण किया था। यहां 1538 -39 ई. में प्रथम गिरजाघर खुला । 1540 के आसपास यहां 100 से ज्यादा पादरी आ चुके थे। 1542 में फ्रांसिस जेवियर ने यहा ंस्कूल भी खोला था। यहां  इन लोगों ने इसाई धर्म का प्रचार प्रसार तथा धर्मान्तरण कराना शुरू कर दिया था। प्रचार दलों के माध्यम से पूरे देश में अपने धर्म की नींवं जमाना  शुरू कर दिये था।

विश्वजनित आगरा में अनेक इसाई समूहों का आगमन:-

आगरा एक विश्वजनित शहर रहा है। यहां यूरोप के देश – ब्रिटेन, डच, फ्रेंच, पुर्तगाली, इटेलियन, जमैन, फ्लेमिश तथा स्विस आदि देशों के इसाई प्रचारक तथा व्यवसाई बड़ी संख्या में आने लगे थे। 1562 में यहां आर्मेनियाई बस्ती और चर्च बन गया था।

अकबर का काल:-जिन दिनों आगरा में मुगल सम्राट अकबर का साम्राज्य हुआ करता था उनका सुलहकुल पूरे देश में फैल चुका था। राजधानी होने के कारण देश विदेश के सौलानी व व्यापारी यहां बहुतायत से आने लगे थे। अकबर ने जहांगीर के जन्मोत्सव के अवसर पर एक आरमेनियाई व्यापारी के पुत्र जैकब को गोद लिया था। अनेक आरमेनियाई सत्ता में भागीदारी भी किये थे। उस समय का मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हई आरमेनियाई था। हरम की महिला डाक्टर जुलियाना भी आरमेनियाई थी। इसकी शादी अकबर ने नवारे ( फ्रांस ) के डी. बारबन जीन फिलिप से किया था। अब्दुल हई की पुत्री का पुत्र मिर्जा जुलकरनैन , जिसने इस्लाम धर्म अपना लिया था, जहांगीर और शाहजहां के दरबार का एक प्रमुख दरवारी था। इसने 1621 में आगरा में जेसुएट कालेज की स्थापना किया था। यह संभल का गवर्नर था तथा इसे मुगल इसाइयों का जनक कहा गया है। मिर्जा उदरदानी साहसी, बीर, कवि एवं धु्रपद गायक था। इसका मकबरा सेंट पीटर कालेज परिसर में है। दयालबाग के आगे पोइया घाट पर 6 अन्य आरमंेनियाइयों के मकबरे बने हुए हैं। इन लोगों ने नाई की मण्डी में मन्टोला मोहल्ला को बसाया था। 1676 ई. में पीटर टवारीज प्रथम मिशनरी हुबली से आगरा आया था। इसने ही बंगाल में धार्मिक व व्यवसायिक गतिविधियों को चलाने की अनुमति प्राप्त किया था। 1578 में बंगाल से सत्गांव से फ्रैंसिस जूलियन पेरोरा तथा एन्टोनियो केनरल की मिशनरी आगरा में धर्म तथा व्यापार फैलाने की अनुमति के लिए आया था।

गोवा से प्रचारको के तीन दलों का आगमन:- इस मिशनरी ने बादशाह से यह भी निवेदन किया था गोवा से इसाई प्रचारकों को बुलवाकर उनकी बातें सुनी जाय। इस पर भारत में हिन्द महासागर पश्चिम तट के प्रचारक सम्राट से अनुमति तथा सहयोग के लिए तीन समूह में आगरा आये थे। पहला जत्था 1580-83 तक रहा इसका नेता जुलियन पेरोरा था। इसने फतेहपुर सीकरी में बादशाह से मुलाकात किया था। यह अकबर को अपना शिष्य भी बनाना चाह रहा था। इसमें इसे आंशिक सफलता भी मिली थी। दूसरा समूह 1580-83 के बीच आगरा लियो ग्रिमन के नेतृत्व में आया था। इसे कोई सफलता नहीं मिली थी। तीसरा समूह 1595-1605 तक जेरोम जेवियर के नेतृत्व में आया था। इस समूह को 1599 में धर्म प्रचार तथा व्यापार करने की अनुमति मिल गई थी। 1600 ई. तक भारत में एक नया धार्मिक समुदाय अस्तित्व में आ चुका था। गोवा की पूरी जनख्या की एक चौथाईलोग इसाई बन गये थे।

आगरा में इसाई मिशनरी:-1602 में आगरा में प्रथम इसाई मिशनरी स्थापित हुई थी। इंग्लैंड का सौदागर जान मिल्डनहाल राजदूत का रूप धारण कर 1603 में व्यापार की अनुमति के लिए आगरा आया था, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली और जहांगीर के समय में 1614 में आगरा में ही मर गया था। उसका स्मारक आर. सी. सेमेटरी में बना है। 1604 में आगरा में अकबरी चर्च बन गया था जो बाद में सेंट मेरी चर्च के रूप में पुनर्नामित हुआ था। पुर्तगाली इसाई धर्म प्रचारक हुबली तथा सत्गांव ( पश्चिम वंगाल ) में अपना व्यापारिक केन्द्र बनाये थे। तीन प्रसिद्ध दलों के साथ इनकी गतिविधियां आगरा मे भी जारी रही थी। पुर्तगालियों की तरह आरमेनियाई प्रचारक व व्यापारी भी आगरा आये हुए थे और अपने कार्यों में लग गये थे। देश की राजधानी होने के कारण अनेक राजनयिक तथा राजदूत भी यहां आने लगे थे। जान मिण्डनहाल व सर टामस रो आदि अनेक राजनयिक जहांगीर के समय में आकर अपनी पहुंच बनाये हुए थे। 1614 में पुर्तगालियों एवं जहांगीर के मध्य मतभेद हो जाने से अनेक उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। इन दिनों इसाइयों को यहां से भागना पड़ा था। ये गोवा तथा हुबली आदि स्थलों पर अपना कार्य जारी रखे हुए थे। 1616 में दोनो पक्षों में सुलह हो जाने के कारण इसाइयों को काम करने की अनुमति समाप्त नहीं हुई थी। परन्तु काम अवरूद्ध हो गया था। इस समय चर्च जला दिया गये थे और  मिशनरी की सारी सम्पत्तियां शाही मिल्कियत में मिला दी गई थी। 1621 में आगरा में इसाई स्कूल खुल गया था। सिकन्दर लोदी द्वारा निर्मित वारादरी को मरियम जमानी के मकबरे के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था।  इसमें तथा इसके पास ही इसाइयों ने अपना केन्द्र वना लिया था। इस मकबरे का कुछ भाग  इसाइयों के नियंत्रण में आ गया था। 1632 में शाहजहां एवं पुर्तगालियों के मध्य अनबन हो गई थी। अकबरी चर्च में जिसमंे जहांगीर ने तीन घण्टे लगवा रखे थे,  को शाहजहां ने गिरवा दिया था। बाद में पादरियों के अनुरोध पर 1636 में अकबरी चर्च का पुनरूद्धार किया गया था। 1758 में पारसियों ने इसाई भवनों को नुकसान पहुंचाया था। इसे 1769 में जीर्णोद्धार कराया गया था। यह 1772 में पूर्ण होकर मरियम माता को समर्पित कर दिया गया था। हिन्द महासागर के पश्चिमी तट के गुजरात, दमन, दीव तथा गोवा व पूर्वी तट के पाण्डिचेरी, पश्चिम बंगाल के वर्दवान, हुबली तथा कोलकाता आदि स्थानों को इसाइयों ने अपने प्रचार के मजबूत केन्द्र के रूप में बना रखे थे।

1811 में कोलकाता के धर्म प्रचारकों ने अब्दुल मसीह नामक व्यक्ति को इसाई धर्म में दीक्षित किया था। वहां के पादरी डेनियल कोर्राइ ने इसकी कर्मठता से प्रभावित होकर इसे आगरा में धर्म के प्रचार प्रसार के लिए भेजा था। इसने सिकन्दरा में मरियम के मकबरे को अपना आधार बनाकर यहां के जंगलों को 1813 से साफ करना शुरू कर दिया था। 12 साल के इसके अथक प्रयास से यहां एक इसाई बस्ती बस गई थी जिसे अब्दुल मसीह का कटरा कहा जाने लगा था। इसे 1825 में लखनऊ के काम के लिए स्थान्तरित किया गया था, जहां दो वर्ष बाद 1827 में इसकी मृत्यु हो गई थी।

आगरा मुगलों की राजधानी रही। ईस्ट इण्डिया कम्पनी कलकत्ता को अपनी राजधानी व प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बना रखा था। बंगाल प्रसीडेन्सी से ही आगरा का प्रशासन ब्रिटिस काल में संचालित होता था। बाद में असुविधा होने पर पहले आगरा प्राविंस फिर इसको नार्थ वेस्टर्न प्राविंस के रूप में एक प्रशासनिक इकाई बनाई गई। पोस्ट आफिस ,विश्वविद्यालय, रेलवे तथा न्यायपालिका आदि अनेक विभाग कलकत्ता से अलग करके ही आगरा में बनाये गये थे। दोनों शहरों के निवासियों के बीच सामाजिक, व्यापारिक तथा प्रशासनिक कारणों से मेल जोल तथा आना जाना भी ज्यादा हो गया था। इसी क्रम में अंग्रेजों का आगरा से जुड़ना हुआ था। यहां इसाई धर्म का प्रचार प्रसार तथा गैर इसाइयों का धर्मान्तरण की प्रक्रिया बहुत पहले से ही चली आ रही है। 1810 ई. में कलकत्ता में ओल्ड मिशन चर्च हुआ करता था। इसके अन्तर्गत आगरा की मिशनरी तथा चर्च आती थी। इसाई धर्म गुरू डेविड ब्राउन ने उत्तर भारत में 10 मिशन मुख्यालय बना रखे थे। 1808 में थामसन आगरा आया था जिसने यहां के मेडिकल क्षेत्र में बहुत काम किया है। संयोग से इसका पुत्र बाद में 1843-53 तक आगरा स्थित नार्थ वेस्टर्न प्रांविसेज का गवर्नर बना था। इस प्रकार तत्समय दोनों शहरों के मध्य भावनात्मक सम्बन्ध बन गया था। 1811 में अब्दुल मसीह आगरा आकर 1813 से क्रिस्चियन सोसायटी का काम संभाल ही लिया था। आगरा में 1818 में नेटिव स्कूल खुल गया था। अब्दुल मसीह के कटरे में 1837 में एक गिरजाघर बनवाया गया था। कटरे के अतिरिक्त पास की जमीन को लोकल कमेटी से खरीदकर एक स्कूल भवन बनवाया गया था।

मरियम का मकबरे में मिशनरी का दफ्तर तथा बालको का अनाथालय:- अकबर की मृत्यु के बाद 1622-23 में सिकन्दर लोदी द्वारा निर्मित वारादरी में मरियम जमानी के मकबरे के रूप में परिवर्तित कर दिया गया था। इसके पास ही इसाईयों ने अपना केन्द्र वना लिया था। इस मकबरे के कुछ भाग इसाइयों के नियंत्रण में आ गया था। 1622 में जहांगीर ने अपनी इसाई मां मरियम जमानी की याद में सिकन्दरा आगरा स्थित सिकन्दर लोदी की बरादरी को मां मरियम के मकबरे के रूप में परिवर्तित कर दिया था। अपने धर्म का आधार पाकर अंग्रेज इस क्षेत्र से अपना विस्तार शुरू किये थे। तत्कालीन प्रशासकों ने गवर्नर जनरल से बाकायदा लिखित अनुमति लेकर इस भवन के पुनरूद्धार में 7200 रूपये खर्च किये था। आगरा का तत्कालीन कमिश्नर हैमिल्टन को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उस समय आगरा के सिविल लाइन में एक अनाथालय हुआ करता था जिसके 180 लड़कों तथा 150 लड़कियों का सिकन्दरा के अनाथालयों में शिफ्ट किया गया था। चूंकि आगरा शहर में अनेक बार उपद्रव व दंगे फसाद हो जाया करते थे। यहां अकाल तथा महामारी भी फैल जाया करती थी। अनाथ हुए बच्चों के पालन पोषण एक समस्या बन गई थी। इसलिए सिकन्दरा क्षेत्र इसाई धर्म के प्रचार प्रसार के लिए बहुत ही सुरक्षित बन गया था। मरियम के मकबरे के एक भाग में बालकों का अनाथालय अगस्त 1839 में स्थापित हो गया था। नार्थ वेस्टर्न प्राविंस की सरकार ने आर्फन सोसायटी का भवन बनवाया था। यही सोसायटी अनाथालय को चलाता रहा। 1910-11 में इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपने अधीन संरक्षित स्मारक घोषित करके इसका संरक्षण कराया था। तब यह भवन खाली होकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन हो गया है।

कांच महलः-सिकन्दरा के अकबर के मकबरे के सामने एक सुन्दर एवं भव्य भवन कांच महल बना हुआ है। इसे जहांगीर ने अपनी बीबी जोधबाई के लिए शीश महल के रूप में तथा स्वयं शिकार से लौटने पर विश्राम के लिए बनवा रखा था। इसे बीरबल के महल के रूप में भी जाना जाता है। यह एक इण्डो इस्लामिक स्थापत्य का भवन था। इसमें कोई मकबरा या कब्र आदि नहीं थी। इसमें एक प्रवेशद्वार भी नहीं था। इसे तुर्की हमाम भी कहा जाता है। बाद में व्रिट्रिश शासन में होर्नल ने इसे अपने नियंत्रण में ले लिया था। लोकल कमेटी के आरफन फण्ड से इसकी मरम्मत करायी थी। इसे लड़कियों का अनाथालय फरवरी 1840 में बना दिया गया था। बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसे अपने अधीन संरक्षित स्मारक घोषित करके इसका संरक्षण कराया था। तब यह भवन खाली होकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन हो गया है।

अन्य गतिविधयांः-चर्च मिशनरी सोसायटी ने सिकन्दरा क्षेत्र में सेंट जान्स चर्च, एक सेमेटरी तथा औद्योगिक इकाइयों की स्थापना किया था। इससे हटकर बेसिक काटेज, अनाथालय तथा 1840 में प्रिटिग पे्रस खोल रखा था। यह जर्मन मिशनरी के अधीन रहा। इसने इस स्थान को अनेक सहायक संस्थायें खोलकर काफी विकसित किया था। शहर के मध्य में सेंट जोन्स कालेज की स्थापना कराई गई थी। 1843 में सिकन्दरा के पास इसाईयो का एक गांव बस गया था।

यहां 1862 से ’’द सिकन्दरा मैसेन्जर’’ नामक पत्र प्रारम्भ हुआ था। द्विमासिक उर्दू पत्र ’’खैर ख्वाह ए खालक’’(जनता का दोस्त ) तथा मासिक हिन्दी ’’लोकमित्र’’ 1863 से यहीं से प्रकाशित होते थे। दोनों पत्र ’’द फ्रेण्ड आफ इण्डिया’’ के रूपान्तर थे। हिन्दी पत्र की भाषा शुद्ध हिन्दी होती थी। यहां से अंधे के चरित्र पर आधारित बाइबिल प्रकाशित कराई गई थी। 1865 ’’द सिकन्दरा मैसेन्जर’’ एवं ’’द कोरियर डव’’ बन्द कर दिया गया था। ’’द फ्रेन्ड आफ प्युपिल’’ हिन्दी और उर्दू में बहुत दिनों तक प्रकाशित होता रहा। 1857 के विद्रोह के दौरान सिकन्दरा इण्ड्रटियल मिशन और इसका प्रेस नष्ट कर दिया गया। उस समय इस प्रेस में 30,000 डालर का नुकसान हुआ था। सिकन्दरा इण्ड्रटियल स्टेट के अवशेष को वर्तमान में व्यायज जूनियर स्कूल के रूप में देखा जा सकता है। 1842 के चर्च पर अब आवास बन गये हैं। अनाथालय, उद्योग तथा मिशनरी प्रतिष्ठान खेत, मैदान तथा नई आवादी के रूप में परिवर्तित हो चुके है।

1843 में केन्द्रीय जेल एवं खंदारी बाग के बीच सेंट पाल चर्च (टीन का गिरजा) बना है।  इसके पास एक सेमेटरी भी बना है। इसके एक किमी. दक्षिण पश्चिम लोहामंडी क्षेत्र में 19वीं सदी का एक सेमेटरी तोता का ताल अभी भी प्रयोग में लायी जाती है। टुंडला के पास एक चर्च एवं सेमेटरी भी बना है। आगरा किला के सामने 1857 में मारे गये इसाइयों के लिए 54 कब्रे बनी है।। जिनमें 16 में अभिलेख भी रहा। छावनी परिषद व उ. प्र. का उद्यान विभाग ने आधुनिक विकास करते हुए इस सेमेटरी को नेस्नाबेद कर दिया है। आगरा छावनी के अन्दर केन्द्रीय विद्यालय के पास 280 गुणे 220 गज के आकार में हैवलाक सेमेटरी बनी हुई है। अधिकांशतः सेना के जवान तथा अधिकारियों की कब्रे यहां बनी हुई है। इसका निर्माण 1820 में हुआ था। अकबरी ( सेंट मेरी ) तथा नया गिरजाघर रोमन कैथालिक कैथीड्राल कम्पाउन्ड सेमेटरी बनी हुई है। इसमें पुरानी धार्मिक जनों की कबे्रं अभिलेख सहित बनी है। आगरा में एक विशाल ओल्ड कैथोलिक या रोमन कैथोलिक सेमेटरी बना हुआ है। यह भारत सरकार द्वारा संरक्षित तथा अच्छी स्थिति में है। यहां 17वीं, 18वीं और 19वीं सदी की विशिष्टजनों की कब्रे बनी हुई है।

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