More
    Homeसाहित्‍यलेखसंपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 10

    संपूर्ण भारत कभी गुलाम नही रहा Part 10

    pratapमहाराणा का राजधर्म भी यही था
    यह था भारत का राजधर्म। महाराणा प्रताप इसी राजधर्म की रक्षार्थ अकबर से संघर्षरत रहे। हमारा राजधर्म व्यक्ति की निजी स्वतंत्रता का उद्घोषक था। व्यक्ति के विचार-अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उदघोषक था। अकबर राजधर्म की परिभाषा तक नही जानता था। ऐसे बादशाहों की बादशाहतें क्रूरता पर अवलंबित होती हैं। जबकि राजधर्म सहृदयी होता है। वह क्रूरता करता नही है, पर क्रूरता को मिटाना वह अपना पवित्र धर्म अवश्य मानता है। महाराणा प्रतापसिंह का अकबर से संघर्ष होने का प्रथम कारण यही था कि महाराणा भारत के राजधर्म के उस स्वरूप के रक्षक थे जिसमें उसके लिए कहा गया है कि राजधर्म में सारे त्यागों का दर्शन होता है। अकबर की बादशाहत हमारे इस राजधर्म के स्वरूप की भक्षक बन गयी थी-इसलिए महाराणा ने एक बहुत बड़े सांस्कृतिक मूल्य की रक्षार्थ अकबर से युद्घ किया। इस बात में सत्यांश हो सकता है कि-‘महाराणा केवल चित्तौड़ के लिए लड़ रहे थे-परंतु वह चित्तौड़ से भी अधिक अकबर की उस क्रूरता का प्रतिकार कर रहे थे जो भारत के राजधर्म में त्यागों का दर्शन निषिद्घ कर रही थी।’

    राजधर्म में सारी दीक्षाओं का प्रतिपादन होता है
    राजधर्म के लिए दूसरी अनिवार्यता है कि इसमें सारी दीक्षाओं का प्रतिपादन होता है। दीक्षा से ही दक्ष और दीक्षित शब्द बने हैं। दक्षता की सिद्घि के लिए भी महानता की साधना करनी पड़ती है। जीवन की जितनी विधाएं हैं, उतने ही व्यक्ति के कार्य-व्यापार हैं। बहुत सी कलाएं हैं, और बहुत से व्यापार क्षेत्र हैं। उन सबमें दक्ष होने का अभिप्राय है कि स्वयं के जीवन को महानता के उच्च शिखर पर पहुंचा देना। इस महान उद्देश्य की प्राप्ति भी व्यक्ति को राजधर्म के माध्यम से ही होती है। राजधर्म यदि संकीर्ण हो गया तो राजनीति दूषित और संकीर्ण हो जाती है। राजनीति के दूषित और संकीर्ण होते ही व्यक्ति की निजी स्वतंत्रताएं प्रभावित होती हैं। फलस्वरूप व्यक्ति की मौलिक स्वतंत्रता (जिन्हें मौलिक अधिकार भी कहा जा सकता है) का हनन होने लगता है। इस हनन की प्रक्रिया को रोकना राजधर्म का उद्देश्य होता है।

    भारत में मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत के लोगों की दक्षता का हनन करना आरंभ कर दिया था, जिसे भारत का राजधर्म मौन रहकर नही देख सकता था।

    दक्षता प्राप्त करना और दीक्षित होकर जीवन यापन करना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। अत: राजधर्म इस मौलिक अधिकार के हनन को मौन बैठे रहकर नही देख सकता। भारत में जब कोई भी मुस्लिम आक्रांता आया या यहां का शासक बना तो उसने व्यक्ति के दक्षता प्राप्त और दीक्षित होकर जीवन यापन करने के मौलिक अधिकार का हनन किया। यह एक ऐसा गंभीर विषय है जिसे हमारे प्रचलित इतिहास में इतिहासकारों ने जान बूझकर उपेक्षित किया है, और उसे समाविष्ट नही किया है। महाराणा प्रताप जैसे लोग व्यक्ति के दक्ष और दीक्षित होने के इस मौलिक अधिकार के पक्षधर थे। जो सीधे मानव-जाति की स्वतंत्रता से संबद्घ है। अत: महाराणा राजधर्म के दूसरे सिद्घांत-कि राजधर्म में सारी दीक्षाओं का प्रतिपादन होता है, के लिए संघर्ष करने वाले महान स्वतंत्रता सैनानी थे। इसलिए उन्हें चित्तौड़ की सीमाओं में बांधकर देखना भी भूल है। वह भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के वैश्विक स्वरूप और भारतीय राजधर्म की संस्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे और उन्हें इसी रूप में सम्मान मिलना चाहिए।

    राजधर्म में संपूर्ण विद्याएं निहित होती हैं
    राजधर्म वैदिक धर्म का प्रस्तोता होता है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि वैदिक धर्म की मान्यताओं को राजधर्म के माध्यम से स्थापित किया जाता है। वेदधर्म में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जीवनदायिनी धारणा, विश्वशांति और मानव की सर्वाधिक उन्नति का एक ऐसा मार्ग प्रशस्त करती है-जिसकी तुलना नही की जा सकती। इसका अंतिम लक्ष्य ‘वसुधैव-कुटुम्बकम्’ और ‘कृण्वन्तो विश्वमाय्र्यम्’ है। भारत का राजधर्म संसार में मानव समुदाय को केवल मानव मानता है। मानव को साम्प्रदायिक आधार पर दो भागों में बांटने या देखने को वह पाप मानता है। अत: वेदधर्म में हर व्यक्ति को विद्यावान होने और विद्याओं के माध्यम से अपने व्यक्तित्व का संपूर्ण विकास करने का एक और मौलिक अधिकार प्रदान किया गया है। यह सर्वमान्य सत्य है कि जब व्यक्ति स्वयं विद्यावान हो जाता है तो दीप से दीप जलता है और हम देखते हैं कि संपूर्ण विश्व समाज ही दीप्ति मान हो उठता है।

    बस, भारतीय राजधर्म का अंतिम उद्देश्य यही है कि संपूर्ण भूमंडल ज्ञान की दीप्ति से दीप्तिमान हो और हर व्यक्ति को विद्यावान और तेजस्वी बनने का अवसर मिले। इसी महान विचार को आज हम-‘हिंदुत्व’ के नाम से जानते हंै।

    भारत में जब इस्लाम ने प्रवेश किया तो उसका प्रमुख लक्ष्य भारत के वेद-ज्ञान को समाप्त करना था। जिस पर हम पूर्व में भी यथास्थान प्रकाश डाल चुके हैं। इस्लाम की वेदज्ञान को मिटाकर अपनी मान्यताओं को थोपने की यह इच्छा भारत और भारतीय धर्म पर ही एक अत्याचार नही थी-अपितु यह संपूर्ण मानवता पर एक अत्याचार थी। इस अत्याचार का सामना भारत के वैदिक धर्मी हिंदू ही नही कर रहे थे, अपितु संपूर्ण संसार के वे लोग कर रहे थे जो अत्याचार के माध्यम से विचार के प्रचार को अनुचित मानते थे। क्योंकि इससे मानव के मौलिक अधिकारों का हनन होता था। सैकड़ों वर्षों तक लोग भारत और भारत से बाहर अपने मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहे, पर हमारे कुछ ‘प्रगतिशील’ इतिहास लेखकों ने उनके संघर्ष को मौलिक अधिकारों के लिए किया गया संघर्ष माना ही नही। इतिहासकारों ने सभ्यताओं को संघर्ष के उस काल में मरते देखा और इतिहास में लिख दिया कि सभ्यताओं के संघर्ष में जो लोग दुर्बल पड़ गये-वे मिट गये, क्योंकि वे नये विचारों को और नई विचारधारा को पचा नही पाये।

    विश्व इतिहास की एक भयंकर भूल
    विश्व इतिहास की यह भयंकर भूल और विडंबना है कि इसने जिन लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए और अपने मौलिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया उन्हीं को यह कह दिया कि वह कहीं वैचारिक धरातल पर दुर्बल थे और अपनी वैचारिक दुर्बलता के कारण वह नये विचारों और नई विचारधारा को अपनी रूढि़वादी परंपराओं के साथ समायोजित नही कर पाये। इसे क्या कहेंगे आप? विश्व इतिहास की अपने पूर्वजों के प्रति धृष्टता या कृतघ्नता? कुछ भी कहिए, एक बात तो सत्य है कि हमने यूनान, मिश्र और रोम जैसी प्राचीन संस्कृतियों को मिटाने वालों का गुणगान करके और उन संस्कृतियों की रक्षार्थ अपना जीवन होम करने वालों के प्रति ऐसी धृष्टता प्रदर्शित करके अपना ‘राजधर्म’ निर्वाह करने में गंभीर चूक की है। तब तो विश्व इतिहास की प्रचलित पुस्तकें भी असत्य वर्णनों का पिटारा मात्र ही सिद्घ होती हैं।

    हम मानते हैं कि लोगों को विद्या का प्रकाश मिलना जब बाधित हो जाता है तो उनके भीतर जड़ता आ जाती है, और उन्हें रूढिय़ां अपने आप जकड़ लेती हैं। अत: राजधर्म का प्रथम कत्र्तव्य हो जाता है कि उन लोगों की जड़ता और रूढि़वादिता को समाप्त करने के लिए प्रयास करे। उन्हें मिटाकर वहां अपनी मान्यताओं को लादने का प्रयास ना करे। करोड़ों लोगों को आप मार दें और उसके उपरांत कहें कि ये इसलिए मारे गये कि इनको ज्ञान नहीं था, ये मूर्ख थे-ये जंगली थे ये जानवर थे-नितांत मूर्खतापूर्ण है। इतिहास सभ्यता और संस्कृति की दौड़ में पिछड़ रहे लेागों में संस्कार उत्पन्न करने और उन्हें अपने साथ लगाकर चलने वाले लोगों से बनता है-और उन्हीं की प्रतीक्षा करता है कि वे आयें और मेरे पृष्ठों पर अपना स्थान प्राप्त करें।

    एक प्रश्न यह भी है…
    यहीं एक प्रश्न यह भी उत्पन्न होता है कि जिन लोगों ने कथित अज्ञानी, मूर्ख, जंगली और जानवर लोगों को मिटाने का बीड़ा उठाया और उन्हें मिटाकर वहां अपने विचारों की फसल उगाई-क्या वे उन स्थानों से अज्ञानता, मूर्खता आदि को मिटा पाए? हम देखते हैं कि ये सारी बातें आज भी यथावत जीवित हैं, और कहीं-कहीं तो पहले से भी अधिक विकृत रूप में उपस्थित हैं? तब तो कहना चाहिए कि नये विचारों को देने के नाम पर क्रांति करने वालों के विचार और विचारधारा भी असफल सिद्घ हो चुकी हैं। मानव इस ओर पता नही क्यों ध्यान नही दे रहा?

    भारतीय राजधर्म संपूर्ण विद्याओं को, ज्ञान के प्रकाश को और मानवीय चेतना को पारिवारिक स्तर से उठाकर विश्व चेतना तक पहुंचाने के लिए कार्य करता था। वह संघर्ष करता था कि दीप जले और ज्ञान का प्रकाश फैले, जबकि विदेशी आक्रांताओं के मजहब की आंधी इन प्रकाश स्तंभों को बुझाती आ रही थी। उसका राजधर्म विद्या-स्तंभों को मिटाना था, लोगों को मिटाना था और उनके रक्त से अपनी प्यास बुझाना था। जबकि भारत का राजधर्म इसके विपरीत था।

    महाराणा प्रताप भारत के राजधर्म के संवाहक थे और अकबर इस्लामिक राजधर्म का संवाहक था। दोनों की विचारधारा में और आदर्शों में उत्तरी-दक्षिणी धु्रव जैसी दूरी थी। एक के लिए भारत अपनी मात्रभूमि थी, पितृभू: और पुण्यभू: थी तो दूसरे के लिए इस अवस्था के सर्वथा विपरीत कुछ थी। महाराणा अकबर के राजधर्म को मानवता के विरूद्घ अपराध मानते थे और अकबर महाराणा के राजधर्म को ‘जाहिलपन’ मानता था। दोनों के संघर्ष का प्रमुख कारण था यह। हमने महाराणा के राजधर्म को समझा नही, यद्यपि उनके राजधर्म को समझने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे मुगलों से वैवाहिक संबंध स्थापित करने वाले हिंदू राजपूतों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। महाराणा किस राजधर्म और किन मूल्यों के लिए संघर्ष कर रहे थे-हमारा इतिहास इस पर पूर्णत: मौन है। यह आपराधिक तटस्थता नही तो और क्या है? यह कितनी मूर्खतापूर्ण बात है कि हमने अकबर के उस चरित्र को अपने देश के इतिहास का स्वर्णयुग मान लिया, जो उसे भारत को पुण्यभू: और पितृभू: मानने की कभी सलाह नही देता था।

    राजधर्म में सारे लोकों का समोवश है
    महाभारत के उक्त श्लोक का चौथा स्तंभ है कि राजधर्म में सारे लोकों का समावेश है। इसका अभिप्राय है कि संपूर्ण वसुधा का उपभोग करना और उसके प्राकृतिक संसाधनों का अपने लिए उपयोग करना-प्रत्येक मानव का और प्रत्येक प्राणी का मौलिक अधिकार है। आप उसे देशों की संकीर्णताओं में जकड़ नही सकते। आप जिसे सभ्यता कहते हो (देशों की सीमाएं खड़ी करके उन पर प्रहरी नियुक्त करने को) वह तो तुम्हारी सभ्यता की सीमा है, संकीर्णता है। जिसे एक पक्षी बड़ी सहजता से तोड़ देता है-जब वह एक देश की सीमा से दूसरे देश की सीमा में उडक़र चला जाता है। वह पक्षी मानव ज्ञान को ठेंगा दिखा देता है और बता देता है कि तुमने इतनी ही उन्नति की है कि तुमने अपने आपको संकीर्णताओं में जकड़ लिया है, जबकि मैं इन संकीर्णताओं से मुक्त हूं। भारत का राजधर्म इन संकीर्णताओं से मुक्त था और यही कारण था कि उसने संपूर्ण वसुधा में मानव धर्म अर्थात वेद धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

    भारतीय राजधर्म ने मानव को ‘सान्त’ से निकलकर अनंत की ओर बढऩे के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया। यही कारण रहा कि भारत में अनंत को खोजने की ओर मानव ने सर्वप्रथम प्रशंसनीय प्रयास किया और विभिन्न क्षेत्रों में विज्ञान के अनुसंधानों से मानव और मानव जाति का कल्याण किया। जिन लोगों ने अनंत से ‘सान्त’ में मानव को लाकर पटक दिया वे आज तक भारत के ज्ञान विज्ञान की ऊंचाई को स्पर्श नही कर पाये हैं।

    महाराणा प्रतापसिंह जिस आदर्श को लेकर संघर्ष कर रहे थे उसमें वैदिक धर्म की इसी पवित्रता को स्थापित करना उनका एक लक्ष्य भले ही ना हो, पर इस वैदिक हिंदू धर्म के भक्षकों को वह अपना शत्रु अवश्य मानते थे। जहां तक इस बात का प्रश्न है कि वे केवल चित्तौड़ के लिए संघर्ष कर रहे थे, तो इसका उत्तर यह है कि उनके समकालीन अधिकांश हिंदू नरेशों ने भी उनका सहयोग नही किया था और वे अकबर की आधीनता में चले गये थे, ऐसी परिस्थितियों में जब एक महान देशभक्त शासक को दूसरे शासक लोग स्वयं ही छोड़ रहे थे, तो उससे भी यह अपेक्षा नही की जा सकती कि वह सभी लोगों की स्वतंत्रता की बात करेगा। ऐसी परिस्थितियों में यदि महाराणा प्रतापसिंह ने भी यह सोच लिया हो कि उनके पास जितना क्षेत्र है वह उसी से अपनी हिंदू राष्ट्र निर्माण की योजना को सिरे चढ़ाएंगे-तो इसमें उनका दोष क्या है? कुछ भी महाराणा प्रतापसिंह ऐसे व्यक्तित्व थे जो उन परिस्थितियों में हिंदू स्वाभिमान के रक्षक बने और भारतवर्ष आज उन्हें इसी रूप में नमन करता है।

    राकेश कुमार आर्य
    राकेश कुमार आर्यhttps://www.pravakta.com/author/rakesharyaprawakta-com
    उगता भारत’ साप्ताहिक / दैनिक समाचारपत्र के संपादक; बी.ए. ,एलएल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता। राकेश आर्य जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक चालीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में ' 'राष्ट्रीय प्रेस महासंघ ' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं । उत्कृष्ट लेखन के लिए राजस्थान के राज्यपाल श्री कल्याण सिंह जी सहित कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित किए जा चुके हैं । सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के वरिष्ठ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। ग्रेटर नोएडा , जनपद गौतमबुध नगर दादरी, उ.प्र. के निवासी हैं।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,622 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read