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वीरेंदर परिहार

वीरेंदर परिहार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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वीरेन्द्र परमार
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र बांग्लादेश, भूटान, चीन, म्यांमार और तिब्बत – पाँच देशों की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर अवस्थित है। असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम – इन आठ राज्यों से बना समूह पूर्वोत्तर कहलाता है। यह क्षेत्र भौगोलिक, पौराणिक, ऐतिहासिक एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । संस्कृति, भाषा, परंपरा, रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार, वेश-भूषा आदि की दृष्टि से यह क्षेत्र इतना वैविध्यपूर्ण है कि इस क्षेत्र को भारत की सांस्कृतिक प्रयोगशाला कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा। पूर्वोत्तर में आदिवासियों की सर्वाधिक आबादी है। अरुणाचल प्रदेश, मिज़ोरम, नागालैंड और मेघालय की लगभग सम्पूर्ण जनसंख्या आदिवासी है। पर्वतमालाएं, सदाबहार वन एवं सदानीरा नदियां इस क्षेत्र के नैसर्गिक सौन्दर्य में चार चाँद लगा देती हैं। जैव विविधता, सांस्कृतिक कौमार्य, सामुहिकता बोध, प्रकृति प्रेम, अपनी परंपरा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता आदि इस क्षेत्र की अप्रतिम विशेषताएँ हैं। खान-पान की दृष्टि से यह क्षेत्र विशिष्ट है I यदि पूर्वोत्तर भारत के समाज और लोकजीवन को समझना है तो उत्तर भारतीय चश्मे को उतारना पड़ेगा I हम उत्तर भारतीय चश्मे को धारण कर पूर्वोत्तर भारत के समाज और लोकजीवन का संतुलित विश्लेषण – मूल्यांकन नहीं कर सकते हैं I
आदी जनजाति अरुणाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण जनजाति है। इस जनजाति के लोग मुख्य रूप से पूर्वी सियांग, पश्चिमी सियांग, अपर सुबनसिरी एवं दिबांग वैली जिलों में निवास करते हैं। बहुत दिनो तक आदी जनजाति को ‘अबोर’ कहा जाता था जो अपमानबोधक था। ये लोग अपने को आदी कहना पसंद करते हैं। ‘आदी’ का शाब्दिक अर्थ है पर्वत। इस प्रकार आदी का अर्थ हुआ पर्वतवासी, गिरिजन या हिलमैन। यह नाम इनके लिए सर्वथा उपयुक्त है और सार्थक भी। आदी जनजाति की अनेक उपजातियाँ हैं जिन्हें दो भागों में विभक्त किया जा सकता है –पदाम – मिन्योंग वर्ग एवं गालो वर्ग I प्रथम उपवर्ग में दस जनजातियां हैं – पदाम, पासी, पांगी, मिन्योंग, मिलंग, कार्को, सिमौंग, तंगम, आशिंग और बोरी। द्वितीय वर्ग में चार जनजातियां हैं – गालो, पाइलिबो, रामों और बोकार । चावल आदी लोगों का मुख्य भोजन है। बोकार, रामों, आशिंग और कई उपजातियाँ अपने भोजन में मक्के और बाजरे का उपयोग भी करती हैं क्योंकि उस क्षेत्र में चावल का पर्याप्त उत्पादन नहीं होता है। ये बैंगन, कद्दू, और सरसों पत्ते का सब्जी के रूप में उपयोग करते हैं। ये लोग बाँस के नवकोंपल की सब्जी भी चाव से खाते हैं। बाँस के कोंपल से कई अन्य व्यंजन भी बनाये जाते हैं, जैसे – कोंपल का आचार (उप्तीर)। इनके अन्य प्रिय व्यंजन हैं – सूखी मछली का चूरा (न्गोतीर), भूने मक्के का चूरा (पेतीर), भूने हुए चावल का चूरा (अमतीर), चावल की रोटी (इती) इत्यादि। ये जंगल के कंद-मूल भी खाते हैं। ये लोग कटहल, केला, संतरा, अन्ननास इत्यादि फल भी खाते हैं। आदी लोगों की सब्जियाँ उबली हुई होती हैं और उनमें केवल मिर्च और नमक रखा जाता है। मछलियों को तेल में भूनने का रिवाज़ नहीं है। ये लोग दिन में तीन बार भोजन करते हैं। खेतों में काम पर जाने से पूर्व, खेत में काम करने के समय दोपहर का भोजन और तीसरी बार रात्रि में। मदिरा इनका दैनिक पेय है। यह चावल से बनी होती है। स्थानीय भाषा में इसे ‘अपोंग’ कहा जाता है। ‘अपोंग’ से अतिथियों का स्वागत किया जाता है। सभी सामाजिक-धार्मिक और सांस्कृतिक अवसरों और उत्सवों पर अपोंग पीना-पिलाना अनिवार्य है। बिना इसके कोई भी संस्कार संपन्न नहीं होता है। अरुणाचल के लोअर सुबनसीरी, अपर सुबनसीरी, पापुम पारे और ईस्ट कामेंग जिलों में निशिंग अथवा न्यिशी जनजाति का निवास है। पहले इनको ‘दफ़ला’ कहा जाता था परंतु अब इनको न्यिशी के नाम से संबोधित किया जाता है। नि + शिंग के योग से बना ‘निशिंग’ का शाब्दिक अर्थ स्थानीय भाषा में मनुष्य है। चावल, मक्का, बाजरा, मांस, मछली एवं जंगली कंद-मूल निशिंग लोगों का मुख्य भोजन है। इस समुदाय के सभी लोग मांसाहारी होते हैं। मिथुन, सूअर, बकरा, मुर्गी एवं कुछ अन्य जंगली जानवरों के मांस खाते हैं। मांस और मछली हमेशा उपलब्ध नहीं होता है, इसलिए ये लोग मांस-मछली को सुखाकर अथवा भून कर रख लेते हैं और अभाव के दिनों में उनका उपयोग करते हैं। चावल और मांस इनका प्रमुख आहार है। सब्जियों को तेल-मसाले में भूनने का रिवाज नहीं है, उबालकर और उसमें नमक, मिर्च डालकर उनका उपयोग किया जाता है। मदिरा इनके भोजन का प्रमुख घटक है। सभी सामाजिक और धार्मिक आयोजनों में मदिरा पीना-पिलाना अनिवार्य है। मदिरा के बिना तो किसी उत्सव की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह चावल, मक्के या बाजरे से बनती है। स्थानीय भाषा में इसका नाम ‘अपो’ अथवा ‘अपोंग’ है। उत्तम प्रकार की मदिरा को निशिंग भाषा में ‘पोतु’ कहा जाता है। ‘पोबम’ की गुणवत्ता मध्यम कोटि की होती है। ‘पोका’ में मदिरा का सत्व अत्यल्प होता है। वे लोग कुछ जंगली कंद-मूल का भी अपने आहार के रूप में उपयोग करते हैं। बांस की नई कोपलों को भी उबालकर खाया जाता है। अरुणाचल के लोअर सुबनसिरी और अपर सुबनसिरी जिले में हिलमीरी जनजाति का निवास है। हिल मीरी लोग कमला नदी के दोनों ओर बसे हैं। यह क्षेत्र घने वनों से आच्छादित और सुरम्य ऊंचे पर्वतों से घिरा हुआ है। चावल, सब्जी, मांस, मछली, मक्का इत्यादि इनके प्रमुख आहार हैं। ये लोग बाघ, बंदर, चूहा, मिथुन, बकरी, सूअर इत्यादि जानवरों के मांस खाते हैं। मदिरा अथवा अपोंग इनके दैनिक आहार का प्रमुख अंग है। सभी धार्मिक-सामाजिक उत्सवों और आयोजनों में अपोंग पीना-पिलाना अनिवार्य है। इस समुदाय के लोग केले से एक विशिष्ट प्रकार की मदिरा बनाते हैं । अरुणाचल के अपर सुबनसिरी और वेस्ट सियांग जिले तागिन जनजाति के निवास क्षेत्र हैं। चावल, मांस, मछली,सब्जियाँ, जंगली कंद, मदिरा इत्यादि इनके प्रमुख आहार हैं। सुलुंग अथवा सुलू अरुणाचल की एक महत्वपूर्ण आखेटक और खाद्य संग्राहक जनजाति है। ईस्ट कामेंग और कुरुंगकुमे जिले में इनकी प्रमुख आबादी निवास करती है। चावल और मांस-मछली इस समाज का मुख्य भोजन है। जंगली कंद-मूल और जानवरों के मांस भी ये लोग खाते हैं। स्थानीय किस्म की मदिरा अपोंग इनका दैनिक पेय है।
अरुणाचली जनजातियों का एक बड़ा वर्ग बौद्ध धर्म में आस्था रखता है। प्रदेश की मोंपा जनजाति सबसे अधिक जनसंख्या वाली बौद्ध जनजाति है । मोंपा की जीवन-शैली और खान-पान पर तिब्बती प्रभाव है। चावल इन लोगों का मुख्य भोजन है। ये लोग मकई का आटा, उबली सब्जी और जंगली मधु का भी अपने भोजन में उपयोग करते हैं। ये लोग याक, मिथुन, भेड़, जंगली हिरण, भालू आदि जानवरों का मांस खाते हैं। लामा (पुजारी) लोग शाकाहारी होते हैं पर जनसामान्य के लिए मांसाहार प्रतिबंधित नहीं है। जहां अन्य अरुणाचली जनजातियाँ (खामती को छोडकर) दूध और दूध से बनी चीजें नहीं खाती हैं, मोंपा लोग दूध, घी और मक्खन का अपने दैनिक भोजन में खूब प्रयोग किया जाता है। उत्तम किस्म की मदिरा को ‘असरा’ कहा जाता है और सामान्य किस्म की मदिरा को ‘बंगोहेन’ कहा जाता है। अरुणाचल का लोहित जिला खाम्ती जनजाति के लोगों का निवास क्षेत्र है। इस समुदाय के लोग बौद्ध धर्म की हीनयान शाखा में विश्वास करते हैं, लेकिन बौद्ध धर्म के सिद्धांतों के विपरीत ये लोग मांस-मछली खाते हैं। शेरदुक्पेन जनजाति अरुणाचल प्रदेश की एक महत्वपूर्ण जनजाति है। अरुणाचल का पश्चिमी कामेंग जिला इनका निवास क्षेत्र हैं । येलोग बौद्ध धर्म की महायान शाखा में निष्ठा रखते हैं I शेरदुक्पेन लोगों का खान-पान साधारण किस्म का होता है। ये अनाज, मछली, सब्जी, जंगली कंदमूल खाते हैं एवं मक्का तथा बाजरे से बनी मदिरा पीते हैं। इस क्षेत्र में चावल की पैदावार बहुत कम होती है। इसलिए चावल कम खाते हैं। ये लोग दूध एवं मक्खन भी खाते हैं। सब्जियों में कद्दू, बंदगोभी, मूली, आलू इत्यादि का प्रयोग करते हैं। शहद भी इनके भोजन में प्रमुखता से प्रयुक्त होता है। इनपर बौद्धधर्म का गहरा प्रभाव है। इसलिए गाय, सूअर एवं बकरे का मांस नहीं खाते हैं। वे दूसरों के द्वारा मारे गए जंगली जानवरों का मांस खाते हैं। ये लोग मछली भी नहीं मारते हैं लेकिन दूसरे लोगों द्वारा मारी गयी मछली खाते हैं। शेरदुक्पेन लोग मुर्गीपालन करते हैं लेकिन उसके अंडे नहीं खाते हैं। मकई तथा बाजरे से बनी मदिरा उनका दैनिक पेय है। सामाजिक एवं धार्मिक त्योहारों के अवसर पर ये लोग निश्चित रूप से मदिरा का सेवन करते हैं। इसका स्थानीय नाम ‘अरा’ और ‘फाक’ है। प्रत्येक घर में यह पेय बनाया जाता है I शेरदुक्पेन महिलाएं ‘अरा’ और ‘फाक’ बनाने में अधिक दक्ष होती हैं। बच्चे-बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी इस देशी पेय का सेवन करते हैं। अतिथियों का इस मदिरा से स्वागत किया जाता है। अरुणाचल के लोहित, चांगलांग और तिरप जिलों में सिंहफ़ो जनजाति का निवास है। चावल इस समुदाय की मुख्य फसल है। इसलिए दैनिक भोजन में चावल और उबली सब्जियों की प्रमुखता रहती है। उबली मछली, जंगली सब्जियाँ, कंद -मूल, बांस के कोंपल की सब्जी, केले के फूल की सब्जी इत्यादि भी इन्हें बहुत प्रिय है। कौवे, गिद्ध, कुत्ते और बिल्लियों को छोडकर ये लोग सभी पशु-पक्षियों का मांस खाते हैं। लौकी, बैगन, कच्चू, सरसों पत्ता, मिर्च इत्यादि की सब्जियाँ भी इनके आहार के प्रमुख अंग हैं। ये लोग सूखे मांस में मिर्च, नमक और अदरक मिलाकर इस प्रकार संरक्षित करते हैं कि वह सात-आठ महीने तक खराब नहीं होता है। चावल निर्मित मदिरा इनका नियमित पेय है।
कार्बी समुदाय के लोग असम के कार्बी आंगलोंग जिले में रहते हैं I इनकी कुछ आबादी असम के नार्थ कछार, कामरूप, नगाँव और शोणितपुर जिलों में भी निवास कराती है I इन्हें मिकिर भी कहा जाता है परन्तु वेलोग स्वयं को कभी मिकिर नहीं कहते हैं I चावल इनका प्रमुख भोजन है I चावल के साथ कभी – कभी दाल भी खाते हैं I इसके अतिरिक्त सब्जियां, पत्ते, कंद – मूल, सूअर एवं मुर्गी का मांस, मछली आदि खाते हैं I दिन में दो बार ये लोग चावल खाते हैं I रेशम का कीड़ा इन लोगों के लिए विशिष्ट आहार है I सूखी मछलियाँ, अंडे इनके भोजन में शामिल है I कार्बी लोग दूध नहीं पीते हैं लेकिन कभी – कभी बिना दूध की चाय पीते हैं I चावल से बनी मदिरा (मोरपो) का नियमित सेवन होता है I मदिरा के बिना किसी सामजिक – सांस्कृतिक –धार्मिक आयोजन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है I असम के नार्थ कछार हिल्स, कार्बी ओंगलोंग एवं कछार जिलों में दिमासा कछारी समुदाय की अधिकांश आबादी निवास करती है I कुछ विद्वानों ने भीम की पत्नी राजकुमारी हिडिम्बा से दिमासा का संबंध जोड़ा है I इनका मुख्य भोजन चावल है I झूम खेती द्वारा उत्पादित सब्जियां, पत्ते, मिर्च भी भोजन में शामिल है I ये लोग दिन में तीन बार चावल खाते हैं I बिना दूध की चाय भी पीते हैं परन्तु इनका मुख्य पेय चावल से बनी मदिरा है I इसे जोउ कहा जाता है I प्रत्येक घर में मदिरा तैयार होती है I ये लोग मुर्गा, बत्तख, सूअर, बकरी, भैंस आदि पशु – पक्षियों के मांस खाते हैं I सूखी मछलियाँ इनके भोजन के स्वाद को बढा देती हैं I सोनोवाल कछारी समुदाय के लोग मुख्य रूप से असम के डिब्रूगढ़ जिले में निवास करते हैं I इनके कुछ गाँव लखीमपुर, शिबसागर और जोरहाट जिले में भी हैं I इस समुदाय की मान्यता है कि ये लोग भाष्करबर्मा,नरकासुर, बनराजा, भगदत्त, हिडिम्बा, घटोत्कच, भीम, प्रह्लाद और बाली जैसे पराक्रमी महापुरुषों के वंशज हैं I इनका मुख्य भोजन चावल है I चावल के साथ दाल और सब्जियां भी खाते हैं I मछली – मांस भी इनके भोजन में शामिल है I ये लोग सूअर का मांस नहीं खाते हैं I कभी – कभी मदिरा पीते हैं लेकिन यह नियमित पेय नहीं है I अतिथियों का सत्कार पान – सुपारी से किया जाता है I बर्मन समुदाय का निवास असम के मुख्यतः नार्थ कछार हिल्स में है I ये भीम के वंशज माने जाते हैं I ये हिंदू धर्म को मानते हैं और यज्ञोपवीत धारण करते हैं I पांडव के वंशज होने के कारण बर्मन स्वयं को क्षत्रिय कहते हैं I चावल इनका मुख्य भोजन है I इसके साथ सब्जियां और कभी – कभी दाल भी खाते हैं I मछली, बकरी एवं मुर्गे का मांस खाते हैं पर ये लोग सूअर का मांस नहीं खाते हैं I ये लोग चाय पीते हैं I मदिरा तो इनका नियमित पेय है I राभा जनजाति का निवास असम के ग्वालपाड़ा, कामरूप और दरांग जिलों में है I असम के अतिरिक्त मेघालय, मणिपुर, बांग्लादेश एवं नेपाल में भी राभा समुदाय के लोग रहते हैं I चावल इनका मुख्य भोजन है I इसके साथ सब्जियां और कभी – कभी दाल भी खाते हैं I येलोग मछली, सूअर, बकरी एवं मुर्गे का मांस खाते हैं I ये लोग गोमांस नहीं खाते हैं, गोमांस खाना सर्वथा प्रतिबंधित है I बांस की जड़ की सब्जी इनको बहुत प्रिय है I चावल के आटे से बनी कढ़ी भी इनलोगों को बहुत पसंद है I चावल से बनी मदिरा इनका नियमित पेय है I असम के लखीमपुर,डिब्रूगढ़, शिबसागर,जोरहाट तथा शोणितपुर जिले एवं अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में देवरी समुदाय के लोगों का निवास है I चावल इनका मुख्य आहार है I चावल के साथ ये लोग मिर्च और नमक रखकर उबाली हुई सब्जियां खाते हैं I मुर्गी, सूअर, बत्तख, बकरी आदि का मांस खाया जाता है I सभी घरों में चावल से मदिरा बनायी जाती है जिसे सुजे कहते हैं I सभी उम्र के स्त्री- पुरुष सूजे का नियमित सेवन करते हैं I असम के डिब्रूगढ़, लखीमपुर, शिबसागर, जोरहाट और शोणितपुर जिलों में मीरी जनजाति की बसावट है I इन्हें मिशिंग भी कहा जाता है I चावल इनका मुख्य भोजन है I येलोग चावल के साथ कभी – कभी दाल भी खाते हैं I इसके अतिरिक्त सब्जियां, पत्ते, कंद – मूल, सूअर एवं मुर्गी का मांस, मछली आदि खाते हैं I दिन में दो बार ये लोग चावल खाते हैं I सूखी मछलियाँ (न्गो सान ), अंडे इनके भोजन में शामिल है I अपने अतिथियों को ये लोग सूखी मछली खिलाना पसंद करते हैं I पहले ये लोग दूध, तेल, मसाले नहीं खाते थे परन्तु पड़ोसी जातियों के प्रभाव से अब थोडा – बहुत खाने लगे हैं I कभी – कभी बिना दूध की चाय पीते हैं I चावल से बनी मदिरा (अपोंग) का नियमित सेवन किया जाता है I सभी उम्र के स्त्री – पुरुष मदिरा का नियमित सेवन करते हैंI अपोंग बनाने में महिलाएं अधिक कुशल होती हैं I प्रत्येक घर में मदिरा बनायी जाती है I अतिथियों को अपोंग पिलाना अनिवार्य परंपरा है I
तिवा समुदाय के लोग मुख्यतः असम के नगांव एवं कार्बी ओंगलोंग जिले में रहते हैं I इन्हें लालुंग भी कहा जाता है I येलोग मुर्गी, सूअर, बत्तख, बकरी आदि का मांस, मछली, सब्जियां, अंडे आदि खाते हैं I ये कभी –कभी दाल भी खाते हैं I ये लोग दूध नहीं पीते हैं I सभी घरों में चावल से मदिरा बनायी जाती है जिसे जू कहते हैं I सभी उम्र के स्त्री- पुरुष मदिरा का नियमित सेवन करते हैं I अतिथियों को सम्मान देने के लिए जू पिलाया जाता है I यदि अतिथि जू को अस्वीकार कर देता है तो पूरे समुदाय का अपमान समझा जाता है I मेघालय का गारो हिल्स जिला गारो समुदाय का प्रमुख निवास क्षेत्र है I चावल इनका प्रमुख भोजन है I सभी लोग मांसाहारी होते हैं I ये लोग बकरी, सूअर, बत्तख, कुत्ता, बिल्ली, सांप, छिपकली इत्यादि लगभग सभी पशु – पक्षियों का मांस खाते हैं I हाथी का मांस इनलोगों को बहुत पसंद है I ये लोग चावल, मक्का, जौ से बनी मदिरा का नियमित उपयोग करते हैं I धार्मिक त्योहारों या सामाजिक उत्सवों के अवसर पर मदिरा का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया जाता है I चावल को मिट्टी के बर्तन या बांस की नली में पकाया जाता है I खाना बनाने में घी या तेल का प्रयोग नहीं किया जाता है I मेघालय का जयंतिया हिल्स जिला जयंतिया समुदाय का प्रमुख निवास क्षेत्र है I चावल इनका प्रमुख भोजन है I आलू, हरी पत्तियां, कंद- मूल भी इनके भोजन में शामिल है I सभी लोग मांसाहारी होते हैं I ये लोग बकरी, सूअर, बत्तख इत्यादि पशु – पक्षियों का मांस खाते हैं I जिस परिवार में पारंपरिक धर्मों का पालन किया जाता है उस परिवार में गोमांस नहीं खाया जाता है I जिन लोगों ने इसाई धर्म ग्रहण कर लिया है वेलोग गोमांस खाते हैं I ये लोग चावल, मक्का, जौ से बनी मदिरा का नियमित उपयोग करते हैं I मेघालय के पूर्वी और पश्चिमी खासी हिल्स जिले खासी समुदाय के प्रमुख निवास क्षेत्र है I चावल इनका प्रमुख भोजन है I सभी लोग मांसाहारी होते हैं I ये लोग बकरी, सूअर, बत्तख, बिल्ली, सांप, छिपकली इत्यादि लगभग सभी पशु – पक्षियों का मांस खाते हैं परन्तु कुत्ते का मांस नहीं खाते हैं I पान – सुपारी चबाना और धूम्रपान करना आम बात है I ये लोग चावल, मक्का और कंद –मूल से बनी मदिरा का नियमित उपयोग करते हैं I ये लोग कभी – कभी बिना दूध की चाय पीते हैं I जनसंख्या की दृष्टि से हाजोंग एक छोटा समुदाय है I इनकी अधिकांश आबादी मेघालय में निवास करती है I इसके अतिरिक्त असम के कार्बी ओंगलोंग तथा नार्थ कछार हिल्स जिलों में भी हाजोंग जनजाति के लोग रहते हैं I मेघालय की सीमा पर स्थित असम के लखीमपुर व ग्वालपारा जिलों में भी इनकी कुछ आबादी है I पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों की तरह हाजोंग समुदाय का भी मुख्य भोजन चावल है I चावल के साथ सब्जियां और कभी – कभी दाल भी खाते हैं I येलोग मछली भी खाते हैं परन्तु सूअर का मांस नहीं खाते हैं I बकरी और कबूतर का मांस खाया जाता है I पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों के विपरीत हाजोंग समाज में मदिरा का नियमित सेवन नहीं किया जाता है I पूर्वोत्तर की अधिकांश जनजातियाँ दूध का उपयोग नहीं करतीं परन्तु हाजोंग समाज दूध और दुग्ध उत्पादों का नियमित उपयोग करता है I असम के मैदानी क्षेत्रों में मेच जनजाति के लोग निवास करते हैं I ग्वालपारा जिले के मेचापारा क्षेत्र में मुख्य रूप से इनलोगों का निवास है I चावल इनका प्रमुख भोजन है I चावल के साथ नमक, मिर्च, सब्जियां भी खाते हैं I सभी लोग मांसाहारी होते हैं I ये लोग बकरी, सूअर, बत्तख, मुर्गा इत्यादि पशु – पक्षियों का मांस खाते हैं I पान – सुपारी चबाना और धूम्रपान करना आम बात है I ये लोग चावल से बनी मदिरा का नियमित उपयोग करते हैं जिसे जोऊ कहा जाता है I धार्मिक त्योहारों या सामाजिक उत्सवों के अवसर पर जोऊ पीना – पिलाना अनिवार्य है I उत्सवों में मदिरा का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया जाता है I हमर समुदाय के लोग मुख्य रूप से मिजोरम के मिज़ो पर्वतश्रेणी के आस – पास रहते हैं I पूर्वोत्तर के अन्य समुदायों की भांति हमर जनजाति का भी प्रमुख भोजन चावल है I चावल के साथ नमक, मिर्च, सब्जियां भी खाते हैं I सभी लोग मांसाहारी होते हैं I ये लोग बकरी, सूअर, बत्तख, मुर्गा इत्यादि पशु – पक्षियों का मांस खाते हैं I ये लोग जंगल से प्राप्त कंद – मूल और पत्ते भी खाते हैं I ये लोग चावल से बनी मदिरा का नियमित उपयोग नहीं करते हैं I चावल से बनी मदिरा को जू कहा जाता है I धार्मिक त्योहारों या सामाजिक उत्सवों के अवसर पर जू पीना – पिलाना अनिवार्य है I ये लोग दूध अथवा दुग्ध उत्पादों का सेवन नहीं करते हैं I कभी – कभी बिना दूध की चाय पीते हैं I नागा लोगों का मुख्य भोजन चावल है जो मांस के साथ खाया जाता है। मांस ज्यादातर सूअर , गाय और मुर्गे का होता है, लेकिन वे लोग सांप, घोंघे, चूहे, गिलहरी, कुत्ता, बिल्ली , मिथुन ,भैंस, हिरण, मकडी, चिड़िया, केकडा, बंदर, मधुमक्खी लार्वा, लाल चींटी और लगभग सभी प्रकार की जीव – जंतुओं के मांस खाते हैं I उनके खाने में हाथी का मांस भी शामिल है । जानवर का कोई हिस्सा बर्बाद नहीं होता है – यहां तक कि रक्त, त्वचा और आंतों को भी खाया जाता है। कभी कभी वे त्वचा को छोड़ देते हैं और इसका इस्तेमाल ढाल बनाने के लिए करते हैं । नागा लोग सब कुछ खाते हैं जो चलंत है I वे कीड़े- मकोड़े भी नहीं छोड़ते, लेकिन वे जंगली जानवरों का मांस सबसे अधिक स्वाद लेकर खाते हैं।

 

सन्दर्भ:
1. वीरेन्द्र परमार – अरुणाचल के आदिवासी और उनका लोकसाहित्य (2009)
2. मेजर पी आर टी गुर्डन – द खासीज (2010)
3. श्री टी. रतन – हिस्ट्री, रिलिजन एंड कल्चर ऑफ़ नार्थ ईस्ट इंडिया (2011)
4. डॉ बी.एन. बोरदोलाई – ट्राइब्स ऑफ़ असम – खंड – I, II और III
5. श्री बिरेन्द्र कुमार गोहाईं – द हिल लालुंग्स (1993)
6. श्री के.एस. सिंह – पीपल ऑफ़ इंडिया (मिजोरम – 1995)
7. डॉ. जे. एन. चौधरी – अरुणाचल पेनोरेमा
8. श्री निरंजन सरकार – बुद्धिज्म एमौंग द मोंपाज एंड शेरदुक्पेनन्सड (1990)
9. श्री टी. के. एम. बरुआ – द सिंहफोज एंड देयर रिलीजन (1977)
10. डॉ॰ ताई न्योरी – हिस्ट्री एंड कलचर ऑफ दि आदीज(1993)
11. श्री बी॰ एस॰ गुहा – द मोसुप अबांग, (1965) शिलौंग
12. डॉ धर्मराज सिंह – अरुणाचल की आदी जनजाति का समाजभाषिकी अध्ययन (1990)
13. डॉ॰ पी॰ थंकप्पन नायर – ट्राइव्स ऑफ अरुणाचल प्रदेश

 

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