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    सरकार को चाहिए कि कोविड जैसी विस्त्रत एडवाईजरी मंकी पास्क के लिए भी की जाए जारी . . .

    लिमटी खरे

    कोरोना कोविड 19 के बाद अब मंकीपास्क नामक बीमारी तेजी से फैलने की खबरें आ रही हैं। केरल में एक 22 वर्षीय व्यक्ति की जान इससे चली जाना बताया जा रहा है। कहा यह भी जा रहा है कि उसकी जान चिकनपास्क से गई है। अगर चिकनपास्क से भी किसी की जान गई है तो यह बहुत चिंताजनक मानी जा सकती है।

    कोरोना कोविड 19 के शुरूआती दौर में जिस तरह का संदेह दुनिया भर में था, अब उस तरह संदेह की स्थिति न ही निर्मित हो तो बेहतर ही होगा। वायरस के संक्रमण को कैसे रोका जाए और इसकी कम दरों पर जांच की सुविधा कहां मुहैया होगी इसकी व्यवस्था सुनिश्चित किए जाने की जरूरत महसूस हो रही है।

    मंकीपास्क के मामले अफ्रीका में सबसे ज्यादा सुनाई दिए, किन्तु उसके बाद स्पेन और ब्राजील में भी इसका कहर बरपता दिखा। अमेरिका के न्यूयार्क शहर में इसके बढ़ते मामलों को देखते हुए सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। कोविड के बाद अमेरिका में यह बड़ी आपदा है जिसका सामना उसे करना पड़ रहा है। वैसे 80 देशों में अभी 22 हजार से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा मंकीपास्क को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी में शामिल कर दिया गया है। अभी इससे घबराने की ज्यादा जरूरत महसूस नहीं हो रही है क्योंकि इसमें मृत्युदर को यूरोप में अधिक तो शेष जगहों पर संतुलित माना गया है। यह पहला मौका ही होगा जब डब्लूएचओ के महानिदेशक के द्वारा विशेषज्ञ समिति की सिफारिश के बिना ही चेतावनी जारी कर दी है। इसके पीछे संभवतः कोविड से लिया गया सबक हो सकता है।

    मंकीपास्क को लेकर आपात स्थिति लागू करने से आशय यह है कि इसके लिए अब ज्यादा सतर्कता बरतने की जरूरत है। अगर स्थितियां कोविड जैसी गंभीर होती हैं तो इससे निपटने के लिए तैयार रहने की जरूरत है। चूंकि कोविड ने दुनिया भर को बहुत कुछ सिखा दिया है इसलिए अब हर तरह से लड़ने को तैयार रहने की दरकार है।

    देखा जाए तो अफ्रीकी देशों में मंकी पास्क बहुत सामान्य बीमारी है पर यह वहां के कुछ इलाकों तक ही सीमित रहा करती थी, पर संभवतः यह पहला मौका होगा जब यह वहां से निकलकर विश्व के अन्य देशों की ओर रूख करती दिख रही है। इस बीमारी के बारे में विश्व के लोग कम ही जानते हैं इसलिए सावधानी में ही सुरक्षा है के मूल मंत्र को अपनाना बहुत जरूरी है। मंकीपास्क का विषाणु कोविड के विषाणु जैसा न तो घातक है और न ही इसका फैलाव उसके समान ही है। कहा जा रहा है कि संक्रमित व्यक्ति की त्वचा के बहुत करीबी संपर्क में आने पर ही यह फैलता है।

    लोगों को जिज्ञासा है कि मंकीपास्क आखिर है क्या! दरअसल, यह जानवरों से मनुष्यों में फैलने वाला एक वायरस है। इसके लक्षण चेचक के रोगियों के समान ही माने जा सकते हैं। इसके दो अनुवांशिक समूह ज्ञात हुए हैं, जिसमें सेंट्रल आफ्रीकन स्वरूप और वेस्ट आफ्रीकन समूह शामिल हैं।

    इसके लक्षण आम तौर पर दो से चार सप्ताह तक रहते हैं। इसमें बुखार, सरदर्द, शरीर पर लगभग तीन सप्ताह तक चकते, गले में खरासा, खांसी और कई लोगों को फफोले पड़ने की शिकायत भी देखी गई है। कुछ स्थितियों में यह पीड़ादायक भी होते हैं। इसमें हथेली और पैर के तलवों में विशेष प्रभाव भी देखने को मिलता है। इसके संक्रमण की अवधि छः दिन से 21 दिन तक हो सकती है।

    विशेषज्ञों के अनुसार संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में लंबे समय तक रहने पर यह फैल सकता है। इसके अलावा शरीर से निकलने वाले तरल पदार्थ, घाव के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष संपर्क में आने पर इसका फैलाव हो सकता है। संक्रमित व्यक्ति के दूषित कपड़ों के अलावा चूहे, बंदर, गिलहरी आदि संक्रमित जानवरों के काटने, उनके द्वारा खरोंचे जाने अथवा उनके मांस के जरिए यह फैल सकता है।

    मंकीपास्क के इतिहास के बारे में अगर आप देखेंगे तो 1970 में पहली बार इसका मरीज कांगो गणराज्य में मिला था। कांगो बेसनि के ग्रामीण अंचलों और मध्य एवं पश्चिमी अफ्रीका में इसके मामले सामने आए थे। 1970 के उपरांत 11 अफ्रीकी देशों में इसके मामले प्रकाश में आए हैं। 2003 में मंकीपास्क पहली बार अफ्रीका के बाहर अमेरिका में फैला था। सितंबर 2018, दिसंबर 2019, मई 2021 एवं मई 2022 में नाईजीरिया से इजराईल और ब्रिटेन यात्रा करने वाले यात्रिें में एवं मई 2019 में संगापुर तो नवंबर 2021 में अमेरिका में इसकी आहट सुनाई दी थी।

    मंकीपास्क से भारतीयों को घबराने की इसलिए जरूरत नहीं है क्योंकि भारत में इसके बहुत ही कम मरीज हैं, एवं यह बहुत ज्यादा घातक बीमारी की श्रेणी में नहीं है। इसके बाद भी मंकीपास्क को लेकर सावधानी बरतना चाहिए। इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारों को बाकायदा बीमारी, लक्षण, बचाव के उपाय आदि को लेकर एडवाईजरी जारी करने की जरूरत महसूस होने लगी है, इसलिए सरकारों को समय रहते यह काम कर देना चाहिए।

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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