बिहार में महागठबंधन बनाम भाजपा का घमासान

बिहार में जातिगत राजनीति का इतिहास रहा है। चाहे अम्बेडकर हो या लोहिया का नारा ‘सौ में पिछड़ा पावे साठ’ चाहे श्रीकृष्ण सिंह पिछड़ा बहस हो। बिहार में सामंतवाद की जड़े पुरानी है और इनके खिलाफ उठते वामपंथ और सशस्त्र संघर्ष का एक अलग इतिहास है।
चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव की तारिखों को तय कर दिया है। 12 अक्टूबर से 5 नवम्बर के मध्य कुल 5 चरणों में चुनाव सम्पन्न होने है। बिहार के राजनीति का इतिहास बहुधा जातिगत ही रहा है लेकिन इस बार के लोस चुनाव से उभरे अन्य समीकरण समेत महागठबंधन की गांठ भी चुनाव को नया रंग देती प्रतीत हो रही है। बिहार की 243 विधानसभा सीटों पर मोदी की अगुवाई वाली एनडीए और महागठबंधन जिसमें कांग्रेस, राजद और जेडीयू के बीच कांटे की टक्कर बताई जा रही है। आजादी के एक दशक बाद से ही बिहार की राजनीति एक तरह से जातिगत रही है।
1971 में मुंगेरी लाल आयोग का गठन, लोकतंत्र को बचाने के लिए, 1974 का जेपी आंदोलन, 1977 में आयोग का रिपोर्ट, 1978 में उन सिफारिशों को लागू करना जिसमें 127 पिछड़ी जातियों की पहचान की गई। 1979 में मंडल आयोग का गठन तथा 1993 में तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा आरक्षण की सिफारिशों को लागू करना ऐसे मुख्यों कारणों में से है जिसने बिहार की राजनीति को बल दिया। चाहे लालू का भूरा बाल का नारा हो अथवा कांगे्रस का ‘जाति पर पाति पर वोट दो हाथ पर’ का नारा हो ये ऐसे घटनाक्रम है जिन्होंने बिहार की राजनीति को बदल के रख दिया।
2005 के चुनावों में जनता ने जाति की राजनीति को नकार कर सुशासन और विकास के नाम पर वोट दिया था। इस प्रकार बिहार में जदयू और भाजपा गठबंधन की सरकार आई। 2010 के चुनावों में भी जनता ने सुशासन और विकास के नाम पर ही वोट दिया और नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बने। लेकिन नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी घोषित किये जाने को लेकर नीतीश कुमार ने इस्तीफा दे दिया था। जिसके बाद जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन जीतन राम मांझी के बयानों को कहें या नितीश का कुर्सी प्रेम। जीतन राम मांझी पर इस्तीफे का दबाव बनाया जाने लगा जिसपर मांझी ने इस्तीफा देने से मना कर दिया था तो इसपर घमासान मचना तो तय था। उस समय मांझी के पक्ष में बीजेपी खेमा समेत नितीश के कुछ मंत्री भी आ गये थे लेकिन ऐन वक्त पर लालू ने नीतीश का साथ दिया और नीतीश फिर मुख्यमंत्री बने। लालू के ऐसा करने के पीछे कारण यह था चारे घोटाले में फँसे लालू को नितीश ने सहयोग किया था तब लालू का नितीश के पक्ष में जाना अवश्यंभावी है।
एक तरफ सरकार बनाने का दम भर रहे नरेन्द्र मोदी, अमित शाह समेत तमाम अन्य भाजपाई नेता है और साथ में हैं दलितों के नेता राम बिलास पासवान। तो दूसरी तरफ महागठबंधन में राजद, जदयू और कांग्रेस है। वामपंथ के सभी दल एकजुट होकर इन दोनो के सामने है।
बिहार में दलित आबादी 24 फीसदी के आसपास है जिसमें 8 फीसदी मुसहर, 6 फीसदी पासवान समेत 10 फीसदी अन्य दलित जातियां है। इस प्रकार दलित जातियां चुनाव में अहम भूमिका निभायेंगी। लालू यादव को यादव और मुस्लिम वोट बैंक के प्रबल दावेदार के रूप में देखा जाता है लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में जिस प्रकार जनता ने जाति से उठकर सुशासन को वोट दिया। कांग्रेस भी मुस्लिम वोट बैंक में अपनी अच्छी पैठ बनाती है।
लोकसभा चुनावों में जनता ने मोदी के नाम पर वोटिंग की थी। और एक समय था जब बिहार में बीजेपी सब पर भारी दिखने लगी थी। लेकिन कुछ समय पहले हुये उपचुनावों में एक तरह से महागठबंधन को 6 (जदयू 4 और राजद 2) और भाजपा को 4 सीटे प्राप्त हुई। लोकसभा चुनावों में जनता ने जिस प्रकार मोदी के नाम पर वोटिंग की अगर वहीं स्थिति विधानसभा चुनावों में रही तब यह कहना मुश्किल हो जायेगा की महागठबंधन के पाले में सत्ता आयेगी। लेकिन अगर पूर्व की भांति जातिगत वोटिंग होती है तो नीतीश लालू और कांग्रेस की जोड़ी महागठबंधन को मुस्लिम तबका जहां खुलकर वोट कर सकता है तथा साथ ही यादव, दलित समेत पिछड़ी जातियां भी। दूसरी तरफ नीतीश, लालू और कांग्रेस की जुगलबंदी अगड़ी जातियों को भाजपा में वोट करने के लिए उकसा सकती है।
आने वाला चुनाव जहां बीजेपी को अपने लोकसभा विजय समेत अन्य राज्यों के विजय पथ के दोहराने की चुनौती होगी तो दूसरी तरफ महागठबंधन के लिए यह परीक्षा होगी।

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