राष्ट्र को समर्पित महान क्रन्तिकारी वीर सावरकर

इं.राजेश पाठक

  [जयंती-२८ मई]
           क्रांतिकारी और सामाजिक-समरसता के प्रबल पक्षधर वीर सावरकर का जीवन एक ऐसा जीवन है  जो कि कीर्तिमानों से भरा पड़ा है. सावरकर भारत के प्रथम छात्र थेजिन्हें देशभक्ति के आरोप में कॉलेज से निष्कासित किया गयावे विश्व के ऐसे  प्रथम बारिस्टर थेजिन्हें परीक्षा पास कर लेने के बाद भी -भारत में  अंग्रेजी हुकूमत के  विरुद्ध क्रन्तिकारी गतिवीधयों में लिप्त होने के संदेह में – प्रमाण-पत्र नहीं दिया गयावे पहले भारतीय हैंजिन्होनें लन्दन में रहते हुए  अपने अध्ययन-काल  में १८५७ के तथा-कतिथ ग़दर को ‘भारतीय-संग्राम’ का  नाम दिया. वे विश्व के प्रथम ऐसे लेखक हैं, जिनकी पुस्तक ‘१८५७ का स्वातंत्र्य समर’ को  प्रकाशन के पूर्व ही जब्त कर लिया गयावे प्रथम क्रन्तिकारी हैंजिन्हें दो अजन्म-कारावास का दंड मिला. 
            सफल कवि,नाटककार,उपन्यासकार,कहानीकार,इतिहासकार होने के साथ-साथ सावरकर एक महान समाज सुधारक भी थे. धार्मिक और  साथ ही सामाजिक गतिविधियों में जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता को समाप्त करने के उद्देश्य से सामूहिक-भजन के आयोजनों को उन्होंने व्यापक स्तर पर शुरू करवाया.ये आयोजन जात-पात के बंधन से मुक्त रहते.ये वो समय था जबकि जातीय उच्चता-निम्नता के आधार पर पाठशालाओं में विद्यार्थियों  के बैठने की व्यवस्था होना एक सामान्य बात थी. ये बात सावरकर को बड़ी आहत करती. इसके निवारण के लिए महाराष्ट्र में जगह-जगह प्रवास कर उन्होंने इसके विरुद्ध अभियान चलाया.जिससे कि पैसे के आभाव में निम्न-जाति के गरीब बच्चे स्कूल जाने से वंचित न रहने पायेंवे संपन्न वर्ग के लोगों से पैसे इकट्ठा करते और उनके लिए स्लेट,चाक,पुस्तकगणवेश आदि की व्यवस्था करते;साथ ही उनके अभिभावकों को भी आर्थिक मदद करते जिससे उनकी ओर से भी जरुरी प्रोत्साहन बच्चों को मिलता रहे.  दिवाली,दशहरा,होली जैसे उत्सव तो उनके लिए महार,चर्मकार,वाल्मीकि समाज जिन बस्तियों में रहते वहां जाकर मनाएं जाने वाले अवसर के रूप में आते. सुखी और दीर्ध वैवाहिक जीवन की कामना कि पूर्ति के लिए महाराष्ट्र में स्त्रियाँ आपस में मिलकर हल्दी-कुंकुं नाम का एक धार्मिक आयोजन करतीं हैं.इस आयोजन को सामाजिक समरसता का वाहक बनाते हुए वे इसे अपनी पत्नी के सहयोग से सभी जातियों की महिलाओं के बीच सामूहिक रूप से  मनवाते.
          एक ‘पान-हिन्दू केफे-हाउस’ की शुरुआत भी उन्होंनें की,जिसमें विशेष रूप  से एक दलित महार नवयुवक को देखरेख के लिए लगाया गया . जो भी सावरकर से मिलने आता उसके लिए जरूरी था कि वो पहले इस कॉफ़ी-हाउस में आकर महार के हाथों कुछ ग्रहण करे. छूआछूत के पालन को लेकर एक बड़ी ही विचित्र बात देखनें को मिलती कि महार ये मानकर चलते थे कि यदि वो किसी वाल्मीकि के साथ भोजन कर लेंगे तो वे अपनी पवित्रता खो देंगे;तो दूसरी ओर वाल्मीकि भी चर्मकारों के प्रति इसी धारणा से ग्रसित थे.मतलब ये कि तथा-कतिथ उच्च जाति वालों के साथ तो सब बैठकर खाने को आतुर रहतेपर अपने ही सामान निम्न जाति के साथीयों के साथ जब खाने की बात आती तो ये आतुरता परस्पर हीनता का रूप धारण कर लेती.इसको दूर करने के लिए सावरकर ने बड़े पैमाने पर सर्वजाति-सहभोज का आयोजन करवाना शुरू किया. ऐसा ही सहभोज  पतितपावन मंदिर के परिसर में आयोजित हुआ,जो कि कई कारणों से बड़ी चर्चा का विषय भी रहा. रत्नागिरी में स्थित इस पतितपावन मंदिर की स्थापना सावरकर नें धार्मिक क्रिया-कलाप में समाजिक-समरसता लाने के उद्देश्य से की थी.इस मंदिर में सभी जाति के लोग पूजा-पाठ व अन्य धार्मिक आयोजन संपन्न कर सकते थे.  “ वह जाति जिसके पास पहले से ही स्थापित मंदिरों की रक्षा करने की शक्ति नहीं वो नए मंदिरों के निर्माण का अधिकार खो चुकी है.इस मंदिर का  उद्देश्य उस शक्ति को निर्मित्त करने का है.आज केवल महार,चमार य अछूत समाज ही पतित नहीं है,बल्कि पूरा हिदू समाज ही,जो कि विदेशी सत्ता का गुलाम हो चुका हैपतित है. मैं उसे पतितपावन कहुँगा  जो  इस पूरे पतित हिन्दुराष्ट्र का उन्नयन करता हो. मैं केवल उसे पतितपावन कहुँगा जो कि हिन्दुओं को वो सब बापस लोटाने वाला हो जो वो खो चुका है”- पतितपावन मंदिर की अवधारणा के पीछे सावरकर के  ये विचार थे.




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