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    Homeराजनीतिईसाई-विस्तारवाद का वीभत्स अंजाम : स्कूलों में कब्रिस्तान!

    ईसाई-विस्तारवाद का वीभत्स अंजाम : स्कूलों में कब्रिस्तान!

    मनोज ज्वाला
    खबर है कि कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में एक दशकों पुराने
    स्कूल के भीतर कब्रिस्तान मिला है और उस कब्रिस्तान में से 215 बच्चों के
    शव बरामद हुए हैं । बच्चों के उन शवों को एक आधुनिक तकनीक से खोजा गया है
    । रोंगटे खड़े कर देने वाली यह खबर युरोपियन-अमेरिकन सभ्यता और
    ईसाई-चर्च-मिशनरियों की सेवा-शिक्षा से युक्त आभा का सच उजागर कर दे रही
    है । ब्रिटेन कनाडा और अमेरिका दुनिया के सबसे अधिक सभ्य देश माने जाते
    हैं । दुनिया भर के ईसाई उन पर गर्व करते हैं लेकिन स्कूल के भीतर
    कब्रिस्तान में से बरामद मृत बच्चों का मामला आखिर क्या है ; यह जान कर
    आपको ईसाई-विस्तारवाद से घृणा होने लगेगी । एक बडे कैथोलोक चर्च के हाथों
    संचालित उस स्कूल का नाम ‘कैम्लूप्स इण्डियन रेसिडेन्सियल स्कूल’ है जो
    सन 1890 से 1969 तक कनाडा का सबसे बडा आवासीय विद्यालय हुआ करता था । बाद
    में कनाडा की संघीय सरकार ने उस स्कूल को चर्च के संचालन-प्रबंधन से
    मुक्त कर अपने अधीन कर लिया था जो अब इधर कई वर्षों से बन्द पडा हुआ है ।
    ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत में ‘फर्स्ट नेशन्स’ कहे जाने वाले मूल
    निवासियों के प्रतिनिधि- रोसेन कैसमिर ने एक समाचार विज्ञप्ति में कहा है
    कि जमीन के नीचे की वस्तुओं का पता लगाने वाले रडार की मदद से बीते
    सप्ताहांत उस स्कूल में कब्रिस्तान होने की पुष्टि हुई और उसमें से ये शव
    मिले हैं । कैसमिर ने विज्ञप्ति में यह भी कहा है कि उस स्कूल के मैदान
    और अन्य भागों की तलाशी ली जानी बाकी है जहां से और भी शैकडों शव मिल
    सकते है. उन्होंने कहा है कि कमलूप्स इंडियन रेजीडेंशियल स्कूल के
    दस्तावेजों में कभी भी इन शवों का कहीं कोई जिक्र नहीं किया गया है ।
    गौरतलब है कि 19वीं सदी से 1970 के दशक तक ‘फर्स्ट नेशन’(अर्थात कनाडा के
    मूल निवासियों) के डेढ़ लाख से अधिक बच्चों को उन्हें आधुनिक कनाडाई समाज
    में अपनाने के कार्यक्रम के तौर पर सरकार के वित्त पोषण वाले ईसाई
    स्कूलों में पढ़ना-पढाना अनिवार्य होता था (है) । उन्हें ईसाई धर्म में
    परिवर्तन के लिए विवश किया जाता था और उन्हें उनकी मातृभाषा बोलने नहीं
    दी जाती थी । उन्हें क्रूरतापूर्वक पीटा जाता था और उनके साथ दुर्व्यवहार
    किया जाता था । ऐसा बताया जाता है कि उस दौरान 60000 से भी अधिक बच्चों
    की मौत हो गई थी । कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा है कि देश
    के मूलनिवासी बच्चों के लिए आवासीय स्कूल उनकी भाषा व संस्कृति को मिटाने
    तथा उन्हें अपनाने के लिए बनाई गई एक ‘व्यापक औपनिवेशिक नीति’ का हिस्सा
    थे ताकि ‘भिन्न प्रकार के लोगों’ के रूप में उनका अस्तित्व कायम न रहे ।
    लेकिन कैम्लूप्स के एक ‘मूलनिवासी आवासीय स्कूल’ में दफन बच्चों के अवशेष
    मिलना एक बड़ी त्रासदी का हिस्सा है ।
    मूल निवासियों के प्रति होते रहे भेदभाव से उत्त्पन्न विभिन्न
    समस्याओं की सुनवाई के लिए कनाडा-सरकार द्वारा कायम विधिक अधिकार-प्राप्त
    आयोग- ‘ट्रूथ एण्ड रीकॉन्सिलिएशन कमीशन’ की ओर से पांच वर्ष पहले ही उक्त
    स्कूल में हजारों बच्चों की हत्या होने से सम्बन्धित एक विस्तृत रिपोर्ट
    जारी की गई थी । उस रिपोर्ट में ‘कैम्लूप्स इण्डियन रेसिडेंसियल स्कूल’
    में एक खास कालखण्ड के भीतर कम से कम 3200 बच्चों की मौत हो जाने का दावा
    किया गया था । तब कनाडाई सरकार ने 2008 में संसद में माफी मांगी थी और
    स्कूलों में शारीरिक तथा यौन शोषण की बात स्वीकार की थी । कालान्तर बाद
    उसी रिपोर्ट के आलोक में ‘भूमि-भेदी राडार’ के माध्यम से उक्त स्कूल में
    जब छानबीन की गई तब उसके भीतर से कब्रिस्तान उभर आया और 215 बच्चों के
    नरकंकाल बरामद हुए । ब्रिटिश कोलंबिया के प्रमुख जॉन होरगान ने कहा कि इस
    घटना का पता चलने से वह ‘भयभीत और दुखी’ हैं ।
    जाहिर है कि ‘कैम्लून्स इण्डियन रेसिडेन्सियल स्कूल’ कनाडा के
    मूल निवासियों (अर्थात अश्वेतों) के बच्चों को सभ्य-शिक्षित बनाने के
    लिए एक चर्च-मिशन के द्वारा खोला गया था जो वहां की सरकार की वित्त-पोषित
    था । संसार की समस्त सभ्यताओं को ईसाई बना डालने के बावत चर्च-मिशनरियों
    द्वारा दुनिया भर में स्कूल और अस्पताल खोले ही गए हैं इसीलिए कि
    गैर-ईसाइयों व अश्वेतों को शिक्षा-सभ्यता सिखा-दिखा कर उनका
    रुपान्तरण-मतान्तरण किया जाए । लेकिन उनका उद्देश्य गैर-ईसाइयों का
    ईसाइकरण मात्र नहीं है । ईसाईकरण तो उनकी एक अत्यंत दूरगामी योजना के
    क्रियान्वयन का एक रणनीतिक चरण है और स्कूल व अस्पलात इसके उपकरण हैं;
    जबकि उनका वास्तविक उद्देश्य गैर-ईसाइयों का उन्मूलन है उन्मूलन । जी
    हां… गैर-ईसाइयों-अश्वेतों का उन्मूलन । जैसा कि कनाडाई प्रधानमंत्री
    ने कहा भी है कि “मूलनिवासी बच्चों के लिए खोले गए वे आवासीय स्कूल उनकी
    भाषा व संस्कृति को मिटाने तथा उन्हें अपनाने के लिए बनाई गई एक ‘व्यापक
    औपनिवेशिक नीति’ का हिस्सा थे… ताकि ‘भिन्न प्रकार के लोगों’ के रूप
    में उनका अस्तित्व कायम न रहे । स्पष्ट है कि अश्वेतों का धर्मान्तरण
    वस्तुतः उन्हें चर्च के चक्कर में फांसने की प्रक्रिया मात्र है ताकि
    उनका उन्मूलन किया जा सके । दुनिया भर की चर्च-मिशनरियां इस मान्यता पर
    काम करती हैं कि श्वेत चमडी वाले युरोपियन लोग सर्वश्रेष्ठ हैं और इस
    कारण पूरी पृथ्वी के मालिक वे ही हैं ; जबकि अश्वेत चमडी वाले निकृष्ट
    नस्ल के हैं इस कारण उन्हें या तो गुलाम बना लिया जाए या उनका उन्मूलन कर
    दिया जाए ।
    ‘देवासुर-संग्राम का आधुनिक सरंजाम’ नामक मेरी पुस्तक में मैंने
    इस तथ्य का विस्तार से खुलासा किया है कि ईसाई-विस्तारवाद के मूल में
    ‘अश्वेत बनाम श्वेत’ का नस्लभेद कायम है और चर्च मिशनरियां सम्पूर्ण
    पृथ्वी पर श्वेत चमडी का आधिपत्य स्थापित कर अश्वेतों का अस्तित्व क्रमशः
    मिटा देने का षड्यंत्र क्रियान्वित करने में लगी हुई हैं । इस तथ्य का
    सत्य एक बार फिर प्रमाणित हो गया । विस्तारवादी चर्च-मिशनरियों का
    उद्देश्य अगर यह नहीं होता तो अमेरिका के मूल निवासियों अर्थात ‘रेड
    इण्डियंस’ को आज संग्रहालय की वस्तु बनते नहीं देखा जाता । अमेरिका नामक
    राज्य के अस्तित्व में आने से पूर्व सदियों तक मूर्तिपूजक रहे लाखों ‘रेड
    इण्डियंस’ ईसाई तो बना ही लिए गए थे; लेकिन तब भी चर्च-मिशन से संचालित
    श्वेत-शक्तियों ने उन्हें सभ्य-शिक्षित बनाते-बनाते ऐसे ही
    स्कूलों-अस्पतालों के माध्यम से विलुप्ति के गर्त में धकेल दिया. जहां अब
    उनकी संख्या महज कुछ हजार ही बची हुई है । किसी जाति-समुदाय के तमाम
    बच्चे ही अगर जैसे-तैसे मार डाले जाएं तो फिर उस जाति-समुदाय की जनसंख्या
    लगातार घटते जाने के कारण उसका अस्तित्व मिट जाना स्वाभाविक है । अमेरिका
    में यही हुआ है और कनाडा में भी यही होता रहा है । इससे पूर्व
    शिक्षा-सभ्यता और स्वास्थ्य का ठेका चलाने वाली चर्च-मिशनरियों की कृपा
    से आस्ट्रेलिया के मूल निवासी पूरी तरह समाप्त हो चुके हैं..सेण्ड्विच
    द्वीप के मूलवासियों का कहीं कोई अता-पता नहीं है..तस्मानिया के आदिवासी
    काल-कवलित हो चुके हैं..न्यूजीलैण्ड में वहां के मूलवासी-‘माओसिस’ अब नाम
    मात्र के बचे हुए हैं .. जबकि अफ्रीका के समस्त आदिवासी धर्मान्तरण के
    बाद अब उन्मूलन की राह पर धकेले जा चुके हैं…तो उधर वेस्ट इण्डिज
    मैक्सिको पनाम व ब्राजिल के मूल निवासी भी सभ्य-शिक्षित होते-होते इतिहास
    की सामग्री बन चुके हैं । पूरी फेहरिस्त बडी लम्बी है । श्वेत चमडी वालों
    के बीच के ही मानवशास्री डार्विन व रेटजेल ने दुनिया भर की विनष्ट हुई
    जातियों की एक सूची तैयार कर रखी है । पृथ्वी के इन विभिन्न भागों से
    विलुप्त हो चुकी वहां की मूल मानव-जातियां ‘अश्वेत चमडी’ वालों की ही थीं
    और चर्च मिशनरियां ही उन्हें इसी तरह के स्कूलों व अस्पतालों के माध्यम
    से सभ्य-शिक्षित-स्वस्थ बनाने में लगी हुई थीं ।
    अंतर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के पूर्वअध्यक्ष व
    सुविख्यात पत्रकार वेदप्रताप वैदिक ने अपने एक लेख में लिखा है- “50 साल
    पहले मुझे अमेरिका के अनेक ‘रेड इंडियंस’ गांवों में बचे-खुचे अमेरिकी
    आदिवासियों के साथ रहने का मौका मिला था । उनका खान-पान, रहन-सहन, भाषा
    और भूषा अमेरिकियों से बिल्कुल अलग थी । उनके बच्चों को मिशनरी स्कूलों
    में भर्ती करके उन पर अंग्रेजी लादी जाती थी, उन्हें ईसाई बनाया जाता था
    और कोशिश यह होती थी कि किसी भी बहाने उनकी हत्या कर दी जाए । उन बच्चों
    के साथ बलात्कार किया जाता था एवं उन्हें भूखों रखा जाता था और उनके साथ
    क्रूर मारपीट की जाती थी । जो भी आदिवासी अपने बच्चों को चर्च के इन
    स्कूलों में भेजने से मना करता था, उसे कड़ा दंड दिया जाता था । तब
    अमेरिका के 30 राज्यों में ऐसे 350 ‘इंडियन स्कूल’ थे । इस तरह के
    स्कूलों के छात्रावासों में रहनेवाले लगभग 60 हजार बच्चों की हत्या के
    प्रमाण अभी तक मिल चुके हैं । इस राक्षसी षड़यंत्र के विरुद्ध 19 वीं सदी
    के अंत में कर्नल रॉबर्ट इंगरसोल जैसे बागी विचारकों ने युद्ध छेड़ दिया
    था । 2009 में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने बाकायदा प्रस्ताव पारित कर के
    उन मूलवासियों से माफी मांगी थी ।”
    यद्यपि कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रूदो ने भी काफी शर्मिंदगी
    जाहिर की है और अपने देश के बचे-खुचे मूलवासियों से क्षमा मांगी है..
    तथापि ईसाई- विस्तारवाद को ऐसा वीभत्स अंजाम देने-दिलाने वाले
    चर्च-मिशनरी समूहों के प्रेरक-नियंत्रक व नियामक-नियन्ता अर्थात ‘वेटिकन
    सिटी’ नामक ‘यीसुवरीय’ राज्य के राजा ‘पोप’ की ओर से इस बावत कोई बयान भी
    नहीं आया है । यह मामला समस्त मानवता के लिए अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है
    । किसी मानव-जाति को छल-छद्म के सहारे मिटा देना और उसके लिए प्रयुक्त
    किये गए स्कूल-अस्पताल नामक उपकरण की पोल खुल जाने पर क्षमा मांग लेने से
    इस दुष्कृत्य का परिहार हो ही नहीं सकता ..इसके लिए तो नस्ल-भेद की
    ईसाई-कुनीति को खारिज करना अपरिहार्य है ।
    • मनोज ज्वाला

    मनोज ज्वाला
    मनोज ज्वाला
    * लेखन- वर्ष १९८७ से पत्रकारिता व साहित्य में सक्रिय, विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं से सम्बद्ध । समाचार-विश्लेषण , हास्य-व्यंग्य , कविता-कहानी , एकांकी-नाटक , उपन्यास-धारावाहिक , समीक्षा-समालोचना , सम्पादन-निर्देशन आदि विविध विधाओं में सक्रिय । * सम्बन्ध-सरोकार- अखिल भारतीय साहित्य परिषद और भारत-तिब्बत सहयोग मंच की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य ।

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