‘अधर्म वा पाप करने से सुख का मूल हमेशा के लिए कट जाता हैः आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय’

मनमोहन कुमार आर्य,

श्रीमद्दयानन्द आर्ष ज्यातिर्मठ गुरुकुल, पौंधा-देहरादून के वार्षिकोत्सव में आयोजित ‘सद्धर्म सम्मेलन’ में दिनांक 1-6-2018 को प्रसिद्ध वैदिक विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी का सम्बोधन हुआ। उनके व्याख्यान को यहां प्रस्तुत कर रहे हैं।

ऋषिभक्त विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि यदि संसार के सभी लोग कोशिश करें कि वह सब मिलकर विश्व में धर्म का प्रवर्तन करा दें तो उनके द्वारा ऐसा करना सम्भव नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म वह है जो सबके भीतर अन्तर्यामीस्वरुप से विद्यमान है तथा जो सबकी आत्माओं को सत्य का आचरण करने की प्रेरणा करता है। धर्म वह है जो एक परमात्मा से ही चलता है। मनुष्य तो उसे जानकर उसका प्रचार व प्रसार ही कर सकता है, उससे भिन्न अन्य किसी धर्म का प्रचलन व प्रवर्तन नहीं कर सकता। विद्वान आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि संसार में ईश्वर एक है और उसके द्वारा सभी मनुष्यों के लिए चलाया गया धर्म भी एक ही है। धर्म वह है जो एक ईश्वर से ही चलता है। ईश्वर नित्य है तो उसका चलाया गया धर्म भी नित्य ही है। आचार्य वेदप्रकाश जी ने श्रोताओं को सत्य के महत्व को बताया। उन्होंने कहा कि नित्य का व्यवहार करने के लिए सत्य शब्द का प्रयोग होता है। सत्य सदा वर्तमान रहता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर है, यह विचार, भावना व कथन सत्य है। ईश्वर के न होने को कोई भी विवेकशील व्यक्ति स्वीकार नहीं कर सकता। आचार्य जी ने कहा कि कुम्हार के बिना घड़ा व मिट्टी की अन्य वस्तुयें बन नहीं सकती। उन्होंने कहा कि कुम्हार से पृथक सत्ता मिट्टी को मानते हैं। इसी प्रकार से ईश्वर से भिन्न जड़ प्रकृति की सत्ता को भी मानना पड़ेगा। ईश्वर न होता तो संसार को कौन बनाता? किसी भी वस्तु के निर्माण के लिए एक चेतन निमित्त कारण की आवश्यकता अवश्यम्भावी है। आचार्य जी ने कहा कि संसार बनाने के लिए ईश्वर सहित प्रकृति व जीव की सत्ता का होना भी आवश्यक है।

विद्वान आचार्य श्री वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि जिस रचना का कोई उद्देश्य व कारण हो और जिसकी सत्ता व विद्यमानता सिद्ध हो, उसे सत्य कहते हैं। उन्होंने कहा कि मनुष्य में ताकत नहीं कि वह ईश्वर द्वारा प्रवर्तित धर्म को बदल दे। आचार्य जी ने कहा कि ईश्वर के सृष्टि रचना, संसार के पालन व कर्म-फल विधान को कोई मनुष्य बदल नहीं सकता। मनुष्य तो केवल वेद या विवेक से उन्हें जानकर अपने जीवन को उन्नत कर सकता है। आचार्य जी ने कहा कि भिन्न भिन्न अवयवों से बनी वस्तु को अवयवी कहते हैं। भिन्न भिन्न अवयवों से बना हुआ हमारा शरीर व अन्य प्राणियों के देह हैं। उन्होंने कहा कि ईश्वर ने जिस प्रयोजन से जो पदार्थ व शरीरादि बनायें हैं, उनसे वही उपयोग लिया जाना चाहिये। आचार्य जी ने कहा कि कान सुनने के लिए बनाये गये हैं। इन कानों से केवल सुनने का काम ही लिया जा सकता है। जीव ईश्वर के बनाये शरीर के अवयवों से ही व्यवहार कर पायेगा। उन्होंने पूछा कि संसार में क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो ईश्वर की व्यवस्था और उसके द्वारा बनाये पदार्थों के प्रयोजन, उपयोग व उन पदार्थों के गुण, कर्म व स्वभाव अर्थात् उनके धर्म को बदल दे? विद्वान आचार्य श्रोत्रिय जी ने कहा कि हम ईश्वर के बनाये पदार्थों से वही काम ले सकते हैं जिसके लिए उन्हें बनाया गया है। ईश्वर सत्य और असत्य को जानता है। ईश्वर ही धर्म और अधर्म, पाप और पुण्य, विधि-अविधि आदि को भी जानता है। परमात्मा ने सत्य और असत्य को अलग अलग किया है। सत्य और असत्य एक नहीं है। दोनों अलग अलग हैं। उन्होंने श्रोताओं से सत्य में श्रद्धा रखने और असत्य में अश्रद्धा रखने को कहा। आचार्य जी ने उदाहरण देते हुए कहा कि मैंने सोना देखा, विचार आया कि इसे उठा लूं। मन ने कहा कि यह सोना तेरा नहीं है। उन्होंने कहा कि कई बार हम अपनी आत्मा की आवाज को दबा लेते हैं। श्रोत्रिय जी ने एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा कि कहीं एकान्त में बढ़िया सा मोबाइल पड़ा है। व्यक्ति उसके पास जाता है। विचार करता है कि इसे ले लूं। ऐसा विचार कर उसके हृदय की घड़कन बढ़ती है। इससे व्यक्ति का रक्त संचार बढ़ता है तथा भाव-भंगिमायें बदलती हैं। शंका पैदा हो रही है, लज्जा हो रही है। आचार्य जी ने इससे संबंधित ऋषि दयानन्द के शब्दों को उद्धृत किया। उन्होंने कहा कि जिस काम को करने में भय, शंका व लज्जा उत्पन्न हो वह काम करना अधर्म है। जिस काम को करने में हर्ष व उत्साह पैदा हो उसे करना धर्म होता है। अच्छा काम करने में जो हर्ष पैदा होता है वह ईश्वर की ओर से होता है। इसलिए इसे धर्म कहते हैं।

आचार्य श्रोत्रिय जी ने कहा कि धर्म वह है जो ईश्वर की आज्ञा के अनुकूल हो। आचार्य जी ने ऋषि दयानन्द जी के गुणों की प्रशंसा की। आचार्य जी ने कहा कि जो पीसे हुए को पीसता है वह ऋषि नहीं कहाता। आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने ऋषि दयानन्द जी के वेदभाष्य की चर्चा की। उन्होंने बताया कि ऋषि दयानन्द जी का वेद भाष्य उनसे पूर्व किये गये वेदभाष्यों से उत्तम व विशेष है। आचार्य जी ने कहा कि धर्म ईश्वर की आज्ञा के पालन करने को कहते हैं। उन्होंने कहा कि अन्तर्यामी परमात्मा जीव के भीतर बाहर विद्यमान है। वह जीवों को असत्य को छुड़ाने और सत्य को ग्रहण करने की प्रेरणा करता है। इस कारण कोई मनुष्य वा उसकी आत्मा ईष्र्या व द्वेष आदि को पसन्द नहीं करते। ईश्वर आत्मा में विद्या का प्रकाश करता है। आचार्य जी ने कहा कि जहां अविद्या होती है वहां राग, द्वेष, काम व क्रोध आदि होता है। जहां विद्या होती है वहां यह दोष नहीं होते। आचार्य जी ने कहा कि विद्या से ही अहिंसा का वास्वविक स्वरुप प्रकट होता है। उन्होंने कहा कि वैर त्याग का नाम अहिंसा है। अविद्रोह अहिंसा है। उनके अनुसार यदि धर्म के लक्षणों में अहिंसा को सम्मिलित किया जाये तो धर्म के ग्यारह लक्षण होते हैं। धर्म पर चलने से हमें कष्ट होता है। आचार्य जी ने ऋषि का उल्लेख कर उनके विचारों को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि अन्याय व अधर्म से यदि चक्रवर्ती राज्य भी मिलता है को ग्रहण न करें। उन्होंने कहा कि प्राण भले ही चले जायें वा जा रहे हों, उस अवस्था के आने पर भी अधर्म का सहारा न लेकर धर्म का ही पालन करें। आचार्य जी ने मृत्यु के डर की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि मरना तो सबको है। यदि अधर्म करोगे तो पाप का बोझ साथ लग जायेगा। उन्होंने कहा कि मृत्यु भी आ जाये तब भी उससे बचने के लिए अधर्म न करें। मनुष्य धन कमाते हुए यह नहीं सोचता कि एक दिन मरना भी है। आचार्य जी ने कहा कि माना कि धर्म का पालन करने में कष्ट होता है परन्तु यह ध्यान रखना चाहिये कि सुख व दुःख दोनों अनित्य हैं, सदा नहीं रहेंगे। यह तो आते जाते रहते हैं। धन व शक्ति से सभी दुःखों की निवृत्ति व सभी सुखों की प्राप्ति नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि माना कि अधर्म करने से सुख मिलता है परन्तु अधर्म करने से भविष्य में उसका फल दुःख तो भोगना ही होगा। अधर्म करने से मनुष्य की सबसे बड़ी हानि यह होती है कि इससे सुख का मूल हमेशा के लिए कट जाता है।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय ने कहा कि ईश्वर व धर्म नित्य हैं इसलिये नित्य का संबंध करो। धर्मात्मा सच्चे व झूठे होते हैं। सभी धर्मात्मा सच्चे नहीं होते। कुछ दीखते सच्चे हैं पर होते नहीं। सूर्य अपने प्रकाश से सर्वत्र भौतिक पदार्थों को प्रकाशित करता है। जो कर्म देखने में धर्म जैसे लगते हैं पर होते नहीं हैं, वह मिथ्याचार है या धर्माभास है। उनका फल अधर्म व पाप कर्मों के अनुसार होता है। आचार्य जी ने कहा कि पाप व पुण्य कर्म आपस में जुड़ते व घटते नहीं हैं। उन्होंने गधे और घोड़े का उदाहरण देकर कहा कि 100 गधे और 50 घोड़े को आपस में जोड़ा व घटाया नहीं जा सकता। आचार्य जी ने कहा कि छल व कपट का व्यवहार अनुचित है। कोई दीवार तोड़कर किसी के घर में घुस जाये उसे चोर कहते हंै। कोई किसी की चीज उठा ले वह भी चोर कहलाता है। यदि कोई मनुष्य किसी दूसरे व्यक्ति की वस्तु को लेने की इच्छा कर लेता है तो वह भी चोर होता है। ब्रह्म के स्थान पर जो अपनी पूजा कराता है वह भी चोर होता है। कोई मनुष्य अपनी इच्छा से वेद व ईश्वराज्ञा से विरुद्ध कल्पना करके जो बातें प्रचलित करता है वह मत होता है धर्म नहीं। मनुष्यों को मत का नहीं धर्म का पालन करना चाहिये। विचार बहुत हैं इसलिये धर्म भी बहुत हैं।

आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने कहा कि यदि मत में से मत प्रवत्र्तक को निकाल दें तो कुछ बचता नहीं है। उन्होंने कहा कि धर्म में से राम, कृष्ण और दयानन्द आदि को निकाल दें तो धर्म की कुछ हानि नहीं होती है। धर्म इन महापुरुषों से नहीं चला अपितु यह लोग धर्म पर चले थे। श्रोत्रिय जी ने कहा कि जो मनुष्य धर्म पर चलता है उसे धर्मात्मा कहा जाता है। आचार्य जी ने वर्षों पुराने एक ऊंचे वृक्ष और एक बरसात में उत्पन्न बेल की चर्चा की जो कुछ ही समय में वृक्ष के शिखर तक पहुंच जाती हैं और कुछ दिनों बाद ही सूख भी जाती है। उन्होंने कहा कि सभी मत व सम्प्रदाय बेल के समान हैं। धर्म सदा शाश्वत व अमर रहता है। आचार्य जी ने कहा कि ईश्वर एक है इसलिये धर्म भी एक ही है। ईश्वर नित्य है अतः उसका धर्म भी नित्य है। ईश्वर प्रदत्त भाषा, धर्म व संस्कृति एक है। सारी मनुष्य जाति भी एक है। समस्त मनुष्य जाति का एक ही धर्म है। जब तक एक धर्म का पालन नहीं होगा तब तक विखराव बना रहेगा। आचार्य जी ने खरबूजे और सन्तरे का उदाहरण दिया। खरबूजा बाहर से अनेक भागों वाला दीखता है लेकिन भीतर से वह एक होता है। सन्तरा बाहर से एक परन्तु भीतर से अनेक है। सन्तरें में भीतर पृथकता व अनेकता होने पर भी उन सबमें रस, स्वाद व गुण पूर्णतः एक समान होते हैं। यही वस्तुतः अनेकता में एकता है। सन्तरे की अलग अलग फांको के गुण व धर्म पृथक नहीं अपितु एक समान होते हैं। हम भी रूप, आकृति व रंग से भले ही भिन्न भिन्न हों परन्तु हमारे गुण, कर्म व स्वभाव सभी के एक समान होने चाहियें। आचार्य जी ने कहा कि समझौतावादी नीति से धर्म कभी आगे नहीं बढ़ेगा। स्वामी दयानन्द भी बिना समझौतावादी बने अकेला खड़ा रहा। उन्होंने सत्य को पकड़े रखा परन्तु मत-मतान्तरों से भयभीत नहीं हुआ और न उसने किसी से समझौता किया। इसके साथ ही आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने अपने व्याख्यान को विराम दिया।

गुरुकुल के संस्थापक स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती के विचार

स्वामी प्रणवानन्द जी ने कहा कि आचार्य वेदप्रकाश श्रोत्रिय जी ने धर्म विषयक प्रायः सभी बातें कह दी हैं। परमात्मा ने हमें मुख दिया है इसलिये हमें कुछ कहना चाहिये। उन्होंने कहा कि गुरुकुल पौन्धा के ब्रह्मचारी ऐसे हैं कि मुझे यहां कुछ करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस कारण मैं मंच पर उपस्थित रहता हूं। स्वामी जी ने कहा कि स्वाभाविकता धर्म है और अस्वाभिवकता अधर्म है। एक परिवार का उदाहरण देते हुए स्वामी जी ने कहा कि आर्यसमाज का एक विद्वान संन्यासी एक व्यक्ति के घर पर गया। उस भवन स्वामी के छोटी आयु के पुत्र ने दरवाजा खोला। उस विद्वान ने कहा कि आपके पिताजी से मिलना है। बालक ने अपने पिता को उस विद्वान के आने की सूचना दी। पिता ने उससे कहा कि उन्हें कह दो कि मैं घर नहीं हूं। बच्चा आता है और विद्वान को कहता है कि पिता जी कह रहे हैं कि वह घर पर नहीं हैं। स्वामी जी ने पूछा कि पिता धर्मात्मा है या बच्चा? उन्होंने स्वयं उत्तर दिया कि बच्चा स्वभाविक है इसलिये वही धर्मात्मा है। सृष्टि में अग्नि तत्व गर्मी व प्रकाश देता है। यह अग्नि का धर्म है। जल का धर्म शीतलता प्रदान करना है। जल अग्नि को बुझाता है। जल का धर्म अग्नि को बुझाना है जिसका वह हमेशा पालन करता है। सूर्य का धर्म संसार को प्रकाश व गर्मी देना है। सूर्य यह काम भली-भांति कर रहा है। उन्होंने कहा कि यदि स्वामी दयानन्द जी जैसे विद्वान हों तो उनकी उपस्थिति में अज्ञानी, अल्पज्ञानी व अधर्म करने वाले भाग जाते हैं। वह उनसे अविद्यामूलक अपनी बातें स्वीकार नहीं करा सकते। सत्य को जानना व उसका पालन करना ही धर्म है। स्वामी जी ने कहा कि मूर्तिपूजा अधर्म है। सन्ध्या करना धर्म है।

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