इस जनादेश का अर्थ- पुनर्प्रतिष्ठित हो ‘भारतवर्ष’

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                                          मनोज ज्वाला
       अभी-अभी सम्पन्न हुए चुनाव के मध्य में ही मैंने एक आलेख लिखा था,
जिसका शीर्षक था- “यह राजनीतिक रुझान आध्यात्मिक चेतना का उफान” ।  वह
रुझान अब चुनाव-परिणाम में बदल गया, किन्तु चेतना का वह उफान अभी भी जारी
है , जो विशुद्ध रुप से दैविक है और परमात्म सत्ता से संचालित होते हुए
समस्त वातावरण में घनिभूत होता जा रहा है । इस तथ्य के प्रमाण स्वतंत्रता
संघर्ष के उग्र आन्दोलनकारी (अरविन्दो घोष) से महान योगी बने महर्षि
अरविन्द और स्वतंत्रता सेनानी से आध्यात्मिक तत्ववेत्ता-तपस्वी बने
युगऋषि श्रीराम शर्मा आचार्य की उन भविष्योक्तियों से होती है, जिन्हें
ऋषिद्वय ने कठोर योग-साधना की बदौलत मानवी चेतना के सर्वोच्च स्तर पर जा
कर प्राप्त की हुई दिव्य-दृष्टि से देश-दुनिया की भवितव्यताओं का
पूर्वावलोकन कर काल-गणना के साथ ऐसे अभिव्यक्त किया हुआ है कि वे सन २०११
से ही अक्षरशः सत्य घटित होती दिख रही है । संक्षेप में आपको यह जान कर
सुखद आश्चर्य होगा उन दोनों ऋषियों द्वारा की हुई काल-गणना के मुताबिक
रामकृष्ण परमहंस के जन्मोंपरान्त १७५ वर्ष का संघिकाल समाप्त होते ही सन
२०११ से ही भारत में राजनीतिक उथल-पुथल व सांस्कतिक पुनर्जागरण एवं
विचार-परिवर्तन का दौर शुरु हुआ है, जो सन २०१४ में अप्रत्याशित रुप से
सत्ता-परिवर्तन को अंजाम देते हुए तथा राजनीति के स्थापित
मिथकों-मान्यताओं को ध्वस्त करते हुए इस वर्ष और भी ज्यादा विस्मयकारी
परिणाम प्रस्तुत कर आगे कुछ और करने को उद्धत है ।

      इस आम-चुनाव में प्रकट राजनीतिक रुझान तथा उसके फलस्वरुप भारतीय
राष्ट्रवाद की पक्षधर भाजपा को मिले प्रचण्ड बहुमत-युक्त परिणाम तथा
‘अभारतीय’ सोच वाले समस्त राजनीतिक दलों की हुई करारी हार से निःसृत
जनादेश का केवल और केवल एक ही अर्थ है- जैसा कि उन ऋषियों का कथन है-
“भारत का पुनरुत्थान सुनिश्चित है”, क्योंकि विभाजनकारी मजहबी शक्तियों
के विस्तारवाद एवं पश्चिमी सभ्यता-संस्कृति के भोगवाद से आतंकित-पीडित
समस्त विश्व-वसुधा के कल्याणार्थ सनातन धर्म , जो सनातन राष्ट्र- भारत की
राष्ट्रीय्ता है उसका उन्नयन परमात्म सत्ता-सम्पन्न दैवीय शक्तियों को ही
अपेक्षित है । यही कारण है कि पिछले पांच वर्षों से एक प्रकार की सूक्ष्म
सत्ता (दैवीय चेतना) भारत की समस्त  होतव्यताओं की हेतु बनी हुई है , तभी
ऐसे-ऐसे आश्चर्यजनक अप्रत्याशित घटनाक्रम घटित होते जा रहे हैं, जो कल तक
असम्भव प्रतीत होते रहे थे ।
      भारत की १७वीं लोकसभा का यह चुनाव-परिणाम वास्तव में भारत के
पुनरुत्थान का सोपन है , जिसका सीधा मतलब है- सदियों से कायम अभारतीय
वैचारिक अधिष्ठान वाले सत्ता-प्रतिष्ठान के कारण पददलित होते रहे भारतीय
ज्ञान-विज्ञान व जीवन-दर्शन-चिन्तन एवं तत्विषयक शिक्षा-विद्या की सनातन
भारतीय परम्परा का पुनर्प्रतिष्ठापन । मालूम हो कि पिछली बार (१६वीं
लोकसभा) के चुनाव-परिणाम के फलस्वरुप २०१४ में कांग्रेसी शासन से भारत की
मुक्ति पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटेन के ‘दी गार्जियन’ अखबार ने १८मई २०१४
के अपने सम्पादकीय में लिखा था कि “ब्रिटेन फाइनली लेफ्ट इण्डिया” ,
अर्थात “ब्रिटेन अन्ततोगत्वा छोड दिया भारत” ।   मतलब साफ है कि २०१४ से
पहले तक भारत ब्रिटिश-क्राऊन के गिरफ्त से मुक्त नहीं हुआ था , बल्कि
कांग्रेस नामक उसके अभिकर्ता (एजेण्ट) के माध्य्म से ही शासित हो रहा था
। अर्थात  पिछले  चुनाव-परिणाम का जनादेश ब्रिटिश उपनिवेशवाद  से भारत की
मुक्ति के नाम था तो जाहिर है इस १७वीं लोकसभा के चुनाव का परिणाम ‘भारत
के  पुनरुत्थान का सोपान’ ही है, जिसका मतलब यह भी है कि दुनिया में भारत
की पहचान ब्रिटिश कॉमनवेल्थ के अन्तर्गत ‘इण्डिया’ नामक डोमिनियन स्टेट
के रुप में ही न हो, बल्कि एक सनातन राष्ट्र- ‘भारतवर्ष’ के रुप में हो,
जिसके लिए आवश्यक है कि तमाम औपनिवेशिक-शासनिक स्थापनाओं का भारतीयकरण
करते हुए शिक्षा, चिकित्सा, न्याय  को भारतीय रीति-नीति से भारतीय भाषा
में सर्वसुलभ कर भारतीय मानदण्ड स्थापित किये जाएं और शासन का स्वरुप
सनातन धर्म के अनुकूल कायम किया जाए । दुनिया में कोई भी राज्य-राष्ट्र
ऐसा नहीं है, जिसके स्वशासन का स्वरुप ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर वहां
की धार्मिक-सांस्कृतिक-ऐतिहासिक परम्पराओं के विरुद्ध व विरोधी हो ।
किन्तु दुनिया भर के सभी मतों-पंथों को आश्रय देते रहने वाले अपने देश
में धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारत की पहचान व राष्ट्रीयता को ही मिटा
डालने का जो वितण्डावाद वर्षों से कायम है, उसे अब तिलांजलि दे देने का
भी जनादेश है यह चुनाव-परिणाम ।  यद्यपि मानसिक व बौद्धिक गुलामी से
ग्रसित आम जन को इस तथ्य का ज्ञान व भान तनिक भी नहीं होने तथा भोजन आवास
रोजगार की जरुरतों में ही उलझे रहने के कारण उसकी ओर से ऐसी कोई  मांग
व्यापक रुप से मुखरित नहीं हुई है, तथापि भारत के पुनरुत्थान को कटिबद्ध
नियति की नीयत यही है, जो जागरुक जनमानस वाले राष्ट्रवादी बहुसंख्यक
समाज-समुदाय में सदा से ही सुविचारित होती रही है । जनता के आर्थिक
सामाजिक उन्नयन का मार्ग भी विकास की स्वदेशी (भारतीय) अवधारणा और भारतीय
ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परम्परा के क्रियान्वयन से ही प्रशस्त होगा । इस
सत्य को न केवल स्वीकारना होगा , बल्कि शासन के नेतृत्व को इसी मार्ग पर
चलते हुए नियति के साथ कदमताल करना होगा ।  इस चुनाव-परिणाम ने ऐसा
स्वर्णिम सुअवसर उपलब्ध कर-करा दिया है कि भारत के नेतृत्वकर्ताओं को
भारत की नियति का भी साथ मिल रहा है । अतएव, औपनिवेशिक शासन के जिन
राजनीतिक, सामाजिक, ऐतिहासिक , बौद्धिक षड्यंत्रों का शिकार होते रहने के
कारण हमारे राष्ट्र-जीवन के जिन-जिन अंगों-अवयवों का क्षरण होता रहा है,
उन समस्त षड्यंत्रों का उद्भेदन कर राष्ट्र को इसके प्राचीन वैभव से
विभूषित करने की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होने वाला है यह जनादेश ।
इस जनादेश से निर्मित सरकार को चाहिए वह जनता के आर्थिक विकास की योजनाओं
के साथ-साथ रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण करने तथा जम्मू-कश्मीर में
धारा३७० को निरस्त करने और समान नागरिक कानून लागू करने की कार्रवाई समय
गंवाये बिना फौरी तौर तुरंत शुरू कर दे और दीर्घकालीन योजना के तहत देश
की शिक्षा-पद्धति के भारतीयकरण व संस्कृत भाषा के पुनर्जीवन के साथ-साथ
भारतीय ज्ञान-विज्ञान के संवर्द्धन एवं इतिहास के संशोधन-पुनर्लेखन की
दिशा में भी ठोस कदम उठाये ।
•       मनोज ज्वाला ;

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