हिमाचल की फिल्मी संस्कृति

अनिल अनूप 

अगल मैं आठ साल पहले की सिनेमाई फिज़ा में लौटूं तो सही मायने में हिमाचल में लघु फिल्मों के कल्चर को विकसित करने को हुए प्रयासों की स्मृतियां जहन में ताजा हो उठती हैं। इससे पूर्व इस पहाड़ी प्रांत में किसी ने भी फिल्म फेस्टीवल जैसे आयोजनों की कल्पना नहीं की थी। इसका श्रेय निश्चित रूप से सूचना विभाग के पूर्व सचिव राम सुभग सिंह को है जो अच्छी फिल्मों और बेहतर सिनेमा के कायल और मुरीद रहे हैं। यह वह दौर था जब करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद शिमला में अंग्रेजों की धरोहर गेयटी थियेटर का रंग-रूप संवर चुका था और उसके भीतर एक बेहद खूबसूरत फिल्म ऑडिटोरियम का निर्माण हुआ था।

सूचना विभाग के बैनर में 2009 से लेकर 2011 के मध्य तीन बड़े फिल्मोत्सव हुए। इनमें प्रख्यात फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल की फिल्मों का रैटरो हुआ तो 70 के दशक की मशहूर फिल्म ‘गर्म हवा’ के निर्देशक एमएस सथ्यू, राहुल देव, दिव्या दत्ता जैसे बड़े कलाकार शिमला पहुंचे। इन्हीं सालों में एफटीआईआई और एनएफएआई, पुणे संस्थानों के सहयोग से फिल्म एपरीसेशन कोर्स भी आयोजित हुए। इन आयोजनों में सामाजिक सरोकारों से जुड़ी बड़ी व छोटी फिल्मों को एक साथ बड़े परदे पर देखना सचमुच रोमांचक अनुभूति थी। लेकिन सैलानियों से सराबोर रहने वाले शिमला में दर्शकों की कमी खलती रही। ऐसी फिल्मों के प्रति ऑडिएंस को रिझाना सचमुच एक बड़ी चुनौती है।

ऐसा प्रतीत होता है कि डिजिटल क्रांति ने जिस प्रकार पाठकों को किताबों से दूर कर दिया है, उसी प्रकार फिल्मों के प्रति दर्शकों में मोहभंग की स्थिति है। फेसबुक और इंटरनेट के प्रति पागलपन ने कला और साहित्य के सभी माध्यमों का बेज़ा नुकसान किया है। ऐसे में स्ट्रगलर्स कहे जाने वाले उन फिल्मकारों की सुध कौन ले जो हिमाचल में ही रह कर बेजोड़ कहानियां ढूंढ रहे हैं और उन्हें पर्दे पर लाने की जद्दोजहद से लगातार जूझ रहे हैं। सही मायने में ऐसे फिल्मकारों को आने वाले सालों में गेयटी थिएटर में माकूल मंच या प्लेटफार्म मुहैया करवाया तो देव कन्या ठाकुर और उनके भाई पुष्पराज ठाकुर ने। साल 2015 से 2018 तक आते-आते चार सालों में शिमला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल ने देश-विदेश में अपनी साख इस कदर कायम कर ली कि इस अवधि में 2000 से अधिक फिल्म निर्माताओं ने अपनी फिल्में इन समारोहों में भेजीं।

चयन प्रक्रिया के उपरांत चार सालों में 400 से ज्यादा फिल्मों की स्क्रीनिग हुई। इनमें 60 से ज्यादा हिमाचल के फिल्मकारों ने अपनी कुछ उम्दा व बेहतरीन फिल्मों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर यह साबित कर दिया कि हिमाचल की फिज़ाओं में शॉट व फीचर फिल्मों का एक नया युग करवट ले रहा है।

रोहडू से संबंध रखने वाले युवा फिल्म निर्माता सिद्धार्थ चौहान ने अपनी तीसरी लघु फिल्म ‘पाशी’ से सबको चकित कर दिया। अनके पुरस्कार प्राप्त करने के बाद यह फिल्म ऑस्कर की दौड़ में भी शामिल हुई। मंडी के एक अन्य युवा फिल्मकार अजय सकलानी ने अपनी पहली पहाड़ी, कांगड़ी या हिमाचली बोली में बनी फिल्म ‘सांझ’ से हिमाचल के फिल्म प्रेमियों में सुगबुगाहट पैदा कर दी। इस फिल्म ने ढेरों पुरस्कार प्राप्त किए और अमरीका के कैलिफोर्निया में 700 फिल्म प्रवष्टियों में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया। उधर देव कन्या ने फिल्म निर्माण में 2015 में अपना पहला कदम ‘नो वीमेन्स लैंड’ फिल्म से रखा।

यह फिल्म हिमाचल की कबायली महिलाओं के उस संघर्ष को रेखांकित करती है जिसकी मूक जंग वे कई दशकों से लड़ रही हैं। देव कन्या की इस फिल्म ने देशभर में नई बहस को जन्म दिया और उनकी अन्य दो फिल्मों ‘लाल होता दरख्त’ और ‘बीहाइंड दि वार्स’ को भी देशभर के फिल्म समारोहों में पुरस्कृत किया गया। हिमाचल की जेलों में डा. सोमेश गोयल, महानिदेशक (कारावास) ने कैदियों के जीवन में सकारात्मक सुधार के लिए जिस क्रांति का सूत्रपात किया है और उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने की जो अनूठी पहल सामने आई है, उसे केंद्र में रखकर इस फिल्म का नैरेटिव रचा गया है। हिमाचल के लिए यह गौरव की बात है कि इस फिल्म को नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन द्वारा एक लाख रुपए के नकद पुरस्कार से नवाजा गया। लेकिन बार-बार कोशिशों के बावजूद न तो देव कन्या ठाकुर की नो वीमैन्स लैंड फिल्म को किसी भी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री या अन्य उच्च अधिकारियों ने देखने की ज़हमत उठाई, न ही इन पंक्तियों के लेखक की पौंग बांध विस्थापितों की पीड़ा को बयां करती शॉट फिल्म ‘द लॉटस रूटस’ को देखा गया।

‘लाल होता दरख्त’ जब शिमला फिल्मोत्सव में रिलीज हुई थी तो राज्यपाल आचार्य देवव्रत की सटीक टिप्पणी भुलाए नहीं भूलती- ‘हमारे समाज की यह घोर बिडंबना और त्रासदी है कि आज भी हमारा समाज पीपल विवाह और तुलसी विवाह जैसी गली-सड़ी परंपराओं में उलझा हुआ है और उसे बेटियों के विवाह की चिंता नहीं है।’ साल 2017 में हुए शिमला फिल्मोत्सव में हिमाचल के ही एक अन्य फिल्म निर्माता पवन शर्मा की फीचर फिल्म ब्रिहणा की स्क्रीनिंग हुई थी जिस पर कुछ दर्शकों ने तल़्ख टिप्पणियां की थीं। हिमाचल की प्राचीन लोक कथाओं पर आधारित फिल्मों का इसलिए विरोध होता है कि बहुपति जैसी प्रथाओं पर ऐसी फिल्में चोट करती हैं और इन वैवाहिक पद्धतियों के पक्ष में स्वर बुलंद करने वाले लोगों को ऐसी फिल्में नागवार गुजरती हैं। शिमला के ही एक अन्य प्रतिभावान अभिनेता, फिल्म निर्माता व निर्देशक आर्यन हरनोट ने प्रदेश के भाषा विभाग के सौजन्य से एक शॉट फिल्म ‘कील’ का निर्माण किया है जो शीघ्र ही सिने-प्रेमियों के लिए रिलीज होगी। उनकी एक अन्य फिल्म ‘रामभरोसे’ भी पुरस्कृत हुई है। सोलन के सुशील मैहता की लघु फिल्म ‘माचिस है क्या’ को भी फिल्म प्रेमियों ने हाथों-हाथ लिया और इस फिल्म को भी अनेक पुरस्कार मिले। एक और युवा फिल्मकार हैप्पी शर्मा की फिल्म ‘घराट’ को भी गत वर्ष शिमला फेस्टीवल में दिखाया गया था। बिलासपुर के पीयूष कांगा की तीन लघु फिल्में शिमला फिल्मोत्सव में प्रदर्शित की गई हैं जिनमें नलवाड़ी नाम से फिल्म प्रमुख है। उनकी दो अन्य फिल्में जिनका नाम दोस्त और स्पेस है, भी सराही गई हैं। इसी तरह शिमला के रोहित युवा फिल्म मेकर हैं तो जसूर के एकलव्य ने भी ‘नशे के विरूद्ध’ तथा ‘बेटी बचाओ’ आदि विषयों पर कई चर्चित फिल्मों का निर्माण किया है।

अगर मैं अपना जिक्र करूं तो मैंने सामाजिक विषयों को केंद्र में रखकर तीन वृत्त चित्रों का निर्माण किया है जिनमें खातरियां : विलुप्त होती जीवन रेखाएं, द लॉटस रूटस और आई एम श्रेष्ठा शामिल हैं। मुझे खुशी है कि इन फिल्मों को देशभर में आयोजित अनेक फिल्म समारोहों में स्क्रीनिंग के लिए शामिल किया गया। मैंने मार्च 2015 में एनआईटी के बेहद खूबसूरत ऑडिटोरियम में हमीरपुर के इतिहास में पहला फिल्म फेस्टीवल आयोजित किया था जिसकी गूंज हिमाचल से बाहर भी रही। निकट भविष्य में दूसरे हमीरपुर फिल्मोत्सव को ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाने का प्रयास है। इसके लिए हमीरपुर जिले में भोरंज क्षेत्र में स्थापित पहले निजी विश्वविद्यालय कैरियर प्वाइंट को चुना गया है। यह चिंता का विषय है कि फिल्म समारोहों की धूम शिमला या धर्मशाला जैसे बड़े शहरों में रही है और उसे छोटे कस्बों और गांवों तक ले जाने के प्रयास नदारद रहे हैं। हिमाचल के एक अन्य चर्चित फिल्मकार संजीव रतन हैं जिनकी दो फिल्में पुरस्कृत हुई हैं जिनके नाम पनचक्की व नया चांद हैं। उधर धर्मशाला में गत कुछ वर्षों से डिफ यानी धर्मशाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टीवल ने देशभर में सुर्खियां बटोरी हैं।

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