भाषा के नाम पर संघर्ष खत्म होना चाहिएः अतुल कोठारी

नयी दिल्ली – माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल एवं भारतीय भाषा मंच, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘ भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता: चुनौतियां एवं समाधान‘‘ विषय पर काॅन्स्ट्रीटयूशन क्लब मे। एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

नयी दिल्ली – माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल एवं भारतीय भाषा मंच, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में ‘‘ भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता: चुनौतियां एवं समाधान‘‘ विषय पर काॅन्स्ट्रीटयूशन क्लब मे। एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय संयोजक वृषभ प्रसाद जैन ने पत्रकारिता के इतिहास और भारतीय भाषा संघर्ष पर खुल कर अपनी राय रखी। उन्होंने विभिन्न भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता एवं उसके सामने आने वाली चुनौतियों को सबके सामने रखा ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और वरिष्ठ पत्रकार विजय क्रांति ने भाषाई संघर्ष में तकनीकी पक्ष की समस्याओं को उजागर किया । उन्होंने कहा कि विदेश की अन्य भाषाओं में उपलब्ध तकनीक में एकरुपता है जबकि हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी पक्ष में काफी भिन्नता है। अलग-अलग अखबार अलग-अलग फांट एवं टाइपिंग फार्मेट का उपयोग कर रहे हैंए जो किसी नए व्यक्ति के लिए सीख पाना बेहद मुश्किल होता है।
हिंदी के बढ़ते प्रभाव पर उन्होंने कहा कि आज हिंदी निरंतर आगे बढ़ रही है। पठनीयता के मामले मेें आज के 10 बड़े अखबारों में 9 हिंदी के हैं । आज हिंदी के अखबारों की पठनीयता काफी ज्यादा है, साथ ही विज्ञापन का पूरा क्षेत्र हिंदी भाषा में ही है। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता की चुनौतियों पर बोलते हुए विजय क्रांति ने कहा कि मीडिया में एनजीओ मानसिकता से आए लोगों का भाषा से कोई सरोकार नहीं होता। उन्हें महज मुनाफा से मतलब होता है । इससे न केवल भाषाई अस्मिता खतरे में पड़ी है बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जी न्यूज हिंदी के संपादक सुधीर चैधरी ने कहा कि मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई अंग्रेेजी भाषा में की मगर काम मैं हिंदी में कर रहा हूं । काम की जो सहजता अपनी मातृभाषा में होती है वह किसी और भाषा में नहीं।
भाषाई पत्रकारिता की चुनौतियों के कारणों पर अपनी राय रखते हुए सुधीर चैधरी ने कहा कि
हिंदी में तथाकथित ठेकेदार तो बहुत है मगर अनुसरण करने वाले कम, जबकि अंग्रेजी में अनुसरण करने वाले ज्यादा है । वल्र्ड इकोनाॅमिक फोरम के पावर लैग्वेंजेज सर्वे का हवाला देते हुए सुधीर चैधरी ने हिंदी के भविष्य को उज्ज्वल बताया उनके अनुसार एक सर्वे के मुताबिक वर्ष 2050 तक हिंदी विश्व में 10 बड़ी भाषाओं में से एक होगी ।
पिछले वर्ष आॅक्सफोर्ड डिक्शनरी में 500 नए शब्द शामिल किए गए, इसमें से 240 शब्द भारतीय भाषाओं से शामिल हुए, यह हिंदी के बढ़ते प्रभाव का परिचायक है।
कार्यक्रम में वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं भारतीय भाषा म।च के संचालक अतुल कोठारी ने कहा कि भारत में स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद विभिन्न भारतीय भाषाओं में आपसी संघर्ष शुरु हो गया। आज आवश्यकता है इस मतभिन्नता का त्याग करते हुए एक ऐसे मंच की स्थापना की जाए, जो सार्वजनिक तौर पर भारतीय भाषाओं की बेहतरी के लिए काम करें । उन्होंने कहा कि स्वतंत्र भारत के जितने लोग हुए वो भारतीय भाषाओं को लेकर काफी काम किए है, मगर आज-कल लोग मानस के हिसाब से भी चलते है, जिससे हमारी भाषाओं में टकराव नजर आता है।
कार्यक्रम के समापन के दौरान अध्यक्षीय उद्बोधन में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि भले भी हम पढ़ते अंग्रेजी में हो मगर समझने का काम भारतीय भाषाओं में ही होता है। हमें अपने भविष्य को ध्यान में रखकर अपनी आगामी योजनाओं को बनाना होगा। लगभग 90 फीसदी संवाद का काम देश में भारतीय भाषाओं में होता है। मगर प्रशासन हमारे साथ संवाद भारतीय भाषाओं में नहीं करता। इस दृष्टिकोण से क्या हमें अपनी ही मातृभाषा में बोलने का अधिकार नहीं मिलना चाहिए। कई शोधो से यह बात स्थापित हो चुकी है कि संस्कृत विश्व की सबसे वैज्ञानिक भाषा है, साथ ही अंग्रेजी उतनी ही अवैज्ञानिक। हमें ये सोचना होगा कि किस ओर जाना है। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले सात समाचार पत्रों का विश्लेषण किया गया। इस विश्लेषण से हमने ये पाया कि इन अखबारों में एक महीने में 22000 अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग किया गया था। सभागार में उपस्थित युवाओं को संकल्पित कराते हुए प्रो. कुठियाला ने कहा कि वे सोशल मीडिया पर हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा दे ।
मंच संचालन प्रो. अरूण कुमार भगत ने किया. कार्यक्रम में वरिष्ठ पत्रकार नंद किशोर त्रिखा, रामजी त्रिपाठी, राजनीतिक चिंतक अवधेश कुमार मौजूद थे.

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