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    Homeसमाजतेजी से बढ़ रही देश में अविवाहित युवाओं की तादाद . ....

    तेजी से बढ़ रही देश में अविवाहित युवाओं की तादाद . . .

    लिमटी खरे

    जब से सृष्टि की रचना हुई है उसके बाद से नर और मादा का आपस में संबंध रहा है। इसे विवाह की संज्ञा दी जा सकती है। सदियों से स्त्री और पुरूष आपस में विवाह करते हैं और उसके बाद संतानोत्पत्ति से उनका वंश आगे बढ़ता है। लगभग एक दशक से युवाओं में विवाह के प्रति आकर्षण कम होने का भाव आता दिख रहा है जो उचित नहीं माना जा सकता है।

    राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के द्वारा जारी एक रिपोर्ट कुछ हद तक चौंकाने वाली मानी जा सकती है। लगभग नौ सालों के आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो युवाओं में अविवाहित रहने की मंशा बढ़ती दिख रही है। इस सर्वेक्षण के अनुसार 15 से 29 साल आयुवर्ग के अविवाहित युवाओं का प्रतिशत 2011 में 17.2 था जो 2019 में बढ़कर 23 फीसदी हो गया है। आने वाले सालों में यह अगर और बढ़ जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

    जब समाज की परिकल्पना की गई होगी तभी यह बात भी ध्यान में रखी गई होगी कि समाज का निर्माण व्यक्तियों से होता है। समाज में जब कोई व्यक्ति निर्णय लेता है और अगर वह निर्णय सामूहिक निर्णय में तब्दील होने लगता है तब समाज को सकारात्मक या नकारात्मक दिशा प्रदान करने का वह सबसे बड़ा कारक होता है।

    यह बात इसलिए कही है क्योंकि हमें यह विचार करना होगा कि आखिर युवाओं में अकेले रहने की प्रवृत्ति क्यों घर कर रही है! इसके अनेक कारण हो सकते हैं। देखा जाए तो अस्सी के दशक के उपरांत युवा पीढ़ी के मन में पश्चिमी सभ्यता के प्रति आकर्षण बहुत ज्यादा बढ़ा है। पश्चिमी देशों में जिस तरह की संस्कृति, आचार विचार को अपनाया जा रहा है उसे हमारे युवा भी अंगीकार करना चाहते हैं।

    एक अमेरिकन संस्था प्यू रिसर्च के द्वारा किए गए एक अध्ययन पर अगर हम गौर फरमाएं तो पाएंगे कि दुनिया के चौधरी अमेरिका में लगभग पांच सात सालों में विवाह विच्छेद अर्थात तलाक की तादाद की दर दो गुना से ज्यादा हो चुकी है। देश में भी तलाक के मामलों पर शोध की आवश्यकता महसूस होने लगी है।

    कहा जा सकता है कि युवाओं के मन में एक तरह का भय उतपन्न हो रहा है कि विवाह की नियति अगर विवाह विच्छेद ही है तो इस रास्ते में प्रवेश ही क्यों किया जाए! इसके अलावा आज युवा जब स्वयं आजीविकोपार्जन करने लगता है तो उसे लगता है कि उसकी कमाई में दूसरा साझेदार क्यों बने!

    इसके अतिरिक्त लगभग दो तीन दशकों में पालकों के द्वारा अपने बच्चों का लालन पालन जिस तरह से किया जा रहा है, जिस तरह से उनके नाज नखरे उठाए जा रहे हैं, उसके बाद युवाओं को आज न सुनने की आदन नहीं रह गई है। बच्चों की हर आकांक्षा की पूर्ति होने के चलते बच्चों के अंदर अस्वीकार्यता जैसी बातें उनके शब्दकोश से गायब हो चुकी हैं। आज की युवा पीढ़ी सामंजस्य बनाने में भी बहुत ज्यादा दिलचस्पी लेती नहीं दिखती।

    इस सबके लिए देश में पारिवारिक व्यवस्था भी काफी हद तक जिम्मेदार मानी जा सकती है। पहले संयुक्त परिवार हुआ करते थे। शादी ब्याह, मेले ठेले, तीज त्यौहारों आदि में परिवारों का समागम होता था जो आज लगभग बंद ही हो चुका है। इसके अलावा अस्सी के दशक तक अगर बेटी 22 साल की हो गई और उसका विवाह नहीं हो पाया तो पालक चिंतित हो जाया करते थे, पर आज के समय में 25 या 26 साल की आयु के उपरांत ही बेटी के लिए और 30 साल के उपरांत बेटे के लिए विवाह योग्य वर या वधू की खोज आरंभ होती है।

    समय बदलता गया और बालिकाओं को बेहतर शिक्षा देने के मार्ग प्रशस्त हुए। देखा जाए तो यह जरूरी भी था, पर इसके चलते युवतियों में एक बात घर करने लगी कि वे विवाह को विकल्प के बतौर देखने लगीं। युवतियां आर्थिक रूप से सक्षम होने के बाद किसी के निर्देश या सामाजिक वर्जनाओं को मानने को तैयार नहीं दिखती हैं।

    बारहवीं तक शिक्षा, उसके बाद कम से कम पांच सात साल तक उच्च शिक्षा, उसके बाद दो तीन साल तक नौकरी ढूंढने या आर्थिक रूप से सुद्रढ़ होने और भौतिक संसाधनों को जोड़ने आदि के चक्कर में इतना विलंब हो जाता है कि युवती 25 साल से अधिक की हो जाती है, तब उसकी नजर में विवाह का औचित्य ही समाप्त होने लगता है।

    वर्तमान समय में सोशल मीडिया का जादू सर चढ़कर बोल रहा है। एक समय था जब सुख दुख की बातों के लिए मित्र या परिवार ही विकल्प होते थे। समय व्यतीत करने के लिए भी परिवार या मित्र ही साधन हुआ करते थे। आज के समय में सोशल मीडिया पर आप घंटे कैसे बिता देते हैं, यह बात पता ही नहीं चल पाती है। आज परिवार का विकल्प सोशल मीडिया के रूप में सामने आ चुका है।

    आज जिस तरह से युवाओं के द्वारा बिना विवाह के ही लिव इन रिलेशनशिप में रहा जा रहा है उससे शारीरिक सुखों की प्राप्ति भी उन्हें हो रही है। इसके लिए वे किसी से डरते भी नजर नहीं आते, सामाजिक वर्जनाएं भी उनके लिए बंधनकारी नहीं रह गई हैं। युवाओं को समझाने की आवश्यकता है कि विवाह का अर्थ परिवार में रहना और इसका सबसे बड़ा फायदा वृद्धावस्था में जब आप अशक्त हो जाते हैं तब वही परिवार आपकी देखभाल भी करता है, जो अकेले रहते हुए आपको किसी भी कीमत पर प्राप्त नहीं हो सकता है . . .

    लिमटी खरे
    लिमटी खरेhttps://limtykhare.blogspot.com
    हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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