विश्व का एकमात्र ब्रह्माणी माता मंदिर जहाँ होती है देवी की पीठ की पूजा


राजस्थान का इतिहास वीरता , शौर्य और पराक्रम का इतिहास रहा है । वीरता के चरित्र को प्रेरणा देने वाली शक्ति की आराधना यहाँ की संस्कृति का अभिन्न अंग रही है । यहाँ पर शक्ति पूजा की परंपरा प्राचीनकाल से ही रही है । हनुमानगढ़ जिले के रंगमहल में मिली पकी हुई मिट्टी की देवी प्रतिमाएँ शक्ति उपासना की प्राचीन परम्परा की साक्षी हैं । इसी तरह टोंक जिले के उनियारा गाँव के पास महिषमर्दिनी की प्रतिमा मिली है जो प्रथम शताब्दी ईस्वी की मानी जाती है । ये कुछ उदाहरण राजस्थान में प्राचीनकाल से शक्ति उपासना को  प्रामाणिकता प्रदान करते हैं । राजस्थान में वैसे तो कई शक्ति स्थल हैं लेकिन एक शक्ति स्थल ऐसा भी है जहाँ पर देवी के विग्रह के मुख की नहीं बल्कि पीठ की पूजा की जाती है । राजस्थान के बाराँ जिले की अंता तहसील में स्थित सोरसन गाँव में ब्रह्माणी माता का मंदिर विश्व का एकमात्र मंदिर है जहाँ पर देवी के पृष्ठ भाग की अर्थात पीठ की ही पूजा अर्चना होती है । यह प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर बाराँ जिले से लगभग 35 किलोमीटर दूर सोरसन नामक गाँव की बाहरी सीमा में स्थित है । जनश्रुति के अनुसार कहा जाता है कि ब्रह्माणी माता का प्राकट्य यहाँ पर 700 वर्ष पूर्व हुआ था । तब यह देवी खोखर गौड़ ब्राह्मण पर प्रसन्न हुई थी इसलिए आज भी खोखरजी के वंशज ही मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं । एक कथा यह भी है कि माना जी नामक बोहरा अपने खेत में काम कर रहे थे तब उनकी पत्नी उनके लिए खाना लेकर आई तो खेत में उन्हें ठोकर लग गई और पारस पत्थर निकल आया जिससे हल की लोहे की वस्तुएँ स्वर्ण की हो गई । जब माना जी को यह पता चला तो वे उस पारस पत्थर को लेकर घर आ गए । रात में देवी ने स्वप्न में आकर उन पर प्रसन्न होने की बात कही । धीरे धीरे माना जी की प्रसिद्धि चहुँओर फैलने लगी तो गुप्तचरों द्वारा यह बात राजा तक पहुँच गई कि माना जी के पास पारस पत्थर है । राजा ने उन्हें दरबार में हाजिर होने के लिए कहा लेकिन वे नहीं आये तो राजा ने उन्हें पकड़कर लाने के लिए अपने सैनिक भेज दिए परन्तु माना जी को जब इस विपत्ति का पता चला तो उन्होंने वह पारस पत्थर पास में स्थित कुंड में फेंक दिया । उधर उनकी पुत्रवधु ने अचानक आई इस विपत्ति का कारण देवी को मानकर अपशब्द कह दिए जिससे देवी नाराज हो गई और क्रोधित होकर वहाँ से जाने लगी । तब जाते समय देवी की पीठ माना जी की तरफ थी इसलिए पीछे से आवाज लगाते हुए उन्होंने कहा कि देवी ! मैं तीर्थयात्रा के लिए जा रहा हूँ अतः जब तक मैं लौटकर न आऊँ तब तक यहीं रहो , मेरे लौटकर आने के बाद चले जाना । कहा जाता है कि माना जी तीर्थयात्रा से कभी लौटकर नहीं आये और वचनबद्ध होने के कारण देवी वहीं विराजमान हो गई ।माना जाता है कि तबसे यहाँ पर देवी की पीठ ही पुजाने लगी । आज भी यहाँ पर 400 वर्षों से अखण्ड ज्योति अबाध रूप से जल रही है । यहाँ मंदिर परिसर में एक परम्परा यह भी है कि एक गुजराती परिवार के सदस्य ही दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं और मीणों के राव भाट परिवार के सदस्य ही नगाड़े बजाते हैं । यह मंदिर चारों ओर परकोटे से घिरा हुआ है । यह गुफा मंदिर के रूप में भी जाना जाता है क्योंकि मंदिर के गर्भगृह में एक विशाल चट्टान है जिस पर बनी चरण चौकी पर देवी की पाषाण प्रतिमा विराजमान है । मंदिर के तीन प्रवेश द्वार हैं जिनमें दो लघु आकार के हैं और एक जो मुख्य प्रवेश द्वार है वह दीर्घाकार और कलात्मक है । परिसर के मध्य स्थित देवी मंदिर में गुम्बद द्वार मण्डप और शिखर युक्त गर्भगृह है । गर्भगृह के प्रवेश द्वार की चौखट 5 गुणा 7 फुट आकार की है जिसमें भी देवी प्रतिमा तक जाने का गंतव्य मार्ग 3 गुणा 2 फुट का ही है । इसलिए इसमें झुककर ही प्रवेश करना पड़ता है और आज भी पुजारी झुककर ही पूजा करते हैं । मंदिर की विशेष खासियत यही है कि यहाँ पर देवी विग्रह के अग्रभाग की पूजा न होकर पृष्ठ भाग (पीठ) की पूजा की जाती है । यहाँ के स्थानीय निवासी इसे पीठ पुजाना भी कहते हैं । प्रतिदिन देवी की पीठ पर सिंदूर लगाया जाता है और कनेर के पत्तों से श्रृंगार किया जाता है । रोजाना दाल बाटी चूरमा का भोग लगाया जाता है । यह नन्दवाना बोहरा परिवार की आराध्य देवी मानी जाती है जिसमें माना जी नामक बोहरा का जन्म हुआ था । साथ ही गौतम ब्राह्मण भी इसे अपनी कुलदेवी मानकर पूजा करते हैं । मंदिर के परिक्रमा स्थल के मध्य में देवी के विग्रह का मुख भी है जहाँ पर भी लोग परिक्रमा देते समय ढोक लगाते हैं । मंदिर के दायीं ओर एक प्राचीन शिव मंदिर और नागा बाबाओं की समाधियाँ भी स्थित हैं ।यहाँ आने वाले हर दर्शनार्थी पीठ के ही दर्शन करते हैं । यहाँ श्रृंगार भी पीठ का ही होता है और भोग भी पीठ को ही लगाया जाता है तथा पीठ पर ही नेत्र स्थापित हैं । ब्रह्माणी माता के प्रति अंचल के लोगों में गहरी आस्था है । यहाँ आने वाले लोग मन्नत माँगते हैं और जिसकी मन्नत पूरी हो जाती है तो कोई पालना या झूला चढ़ाता है तो कोई चाँदी का छत्र । प्रतिवर्ष माघ मास की सप्तमी को मेला लगता है जिसमें रोज हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती रहती है । यह मेला प्राचीनकाल में गर्दभ पशु मेले के रूप में जाना जाता था । देश के कई राज्यों से गधे खरीदने के लिए लोग आया करते थे परंतु अब गधों की अपेक्षा सिर्फ घोड़ों की खरीददारी होने लग गई । वर्तमान में यह पशु मेले के रूप में आयोजित होता है जिसमें मध्यप्रदेश , उत्तरप्रदेश से घोड़े खरीदने के लिए लोग आते हैं । माघ सप्तमी को सोरसन ग्राम पंचायत और मेला समिति के सहयोग से माता की विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है जिसमें हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं । होली के त्योहार के 13 दिन बाद हाड़ौती के प्रसिद्ध तेरस के न्हाण के उपलक्ष्य में सांगोद में भी अखाड़ों और गाजे बाजे के साथ माता की झाँखी निकाली जाती है जिसे देखने के लिए दूरदराज के गाँवों से हजारों श्रद्धालु आते हैं । वर्तमान में यह क्षेत्र सोरसन अभयारण्य के रूप में भी संरक्षित है जहाँ पर राजस्थान के राजकीय पक्षी गोडावण को संरक्षण प्रदान किया गया । गोडावण के अलावा हिरण और प्रवासी पक्षी भी पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं । बारिश के दिनों में बहते झरने के सौंदर्य को देखने व पिकनिक मनाने के लिए पर्यटकों की काफी भीड़ लगी रहती है । मंदिर के पास ही स्थित कुंड और तालाब भी यहाँ आने वालों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहता है । परन्तु आज इस मंदिर को सरकार और प्रशासन की देखरेख की विशेष दरकार है तभी विश्व का एकमात्र यह ब्रह्माणी माता मंदिर विश्व में अपनी पहचान अक्षुण्ण बनाये रख सकेगा ।
नवीन गौतम

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