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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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sonia-gandhi-protest-march-650_650x400_51426593911सदन मे आये दिन संसदीय कार्यवाही बाधित होने की ख़बरे आती रहती है. प्रायः सदनों मे हंगामा होने के कारण कार्यवाही बाधित होती है.कभी कभी तो ये जन प्रतिनिधि सदन की गरिमा  तक को भूल जाते हैं. अनेक उदाहरण भी मौजुद हैं. इस हो- हंगामा के बीच ये तो तय हैं कि किसी भी मुद्दे पर सदन मे अच्छी बहस नही हो पायेगी इस वजह से जो विधेयक सदन मे ऐसी चर्चा के  बाद पारित होगा उसके परिणाम दूरगामी नही होंगे. अगर किसी मुद्दे पर बहस के बाद विधेयक निम्न सदन में पारित होता है तो उसे एक बार फ़िर हो-हल्ला का सामना उच्च सदन मे करना पड़ता है.
   आज़-कल विपक्ष का रवैया बिल्कुल बदल सा गया है. विपक्ष का रवैया एंटी सत्ता पक्ष स हो गया है. पहले राष्ट्र, दलीय प्रतिबद्धता से ऊपर था लेकिन आज स्थिति उलट है. आप जनतंत्र में अपना बिरोध दर्ज कर सकते है लेकिन सदन का समय नुकसान करने कि कीमत पर नही. अपनी सरकार के समय उसी मुद्दे को भरपूर समर्थन दे रहे थे और आज जब आप विपक्ष में है तो पुरी असहमति भी आप ही जाहिर कर रहे है. इससे यह स्पष्ट है कि विपक्ष का रवैया कैसा हो गया है.
      सदन में होने वाले  हो-हंगामे के कारण सत्ता पक्ष के पास एक मात्र अंतिम विकल्प शेष रह जाता है और वह विकल्प है अध्यादेश. अगर सत्ता पक्ष अध्यादेश लाता है तो आगामी संसद सत्र के दौरान सदन में उस अध्यादेश को फ़िर उसी हो-हंगामा का सामना करना पड़ता है. ऐसे में आगे कुआँ पीछे खाई वाली स्थिति उत्पन्न हो जाती है. सत्ता  पक्ष करे भी तो क्या? ऐसे में विपक्ष यह भूल जाता है कि सदन का कितना महत्वपूर्ण समय नुकसान हो रहा है. अनेक बार इसी हंगामे के कारण सदन को पूरे कार्यदिवस के लिये स्थगित करना पड़ता है. कई बार ये जन प्रतिनिधि सदन में हिंसात्मक रुप से अपना बिरोध ज़ाहिर करने लगते है. जब भी संसद में ऐसी घटनाये होती है, तो भारत की वैश्विक छवि धूमिल पड़ती है. ये जन प्रतिनिधि अगर भारत की  छवि सुधार नही सकते तो इन्हे छवि धूमिल करने का अधिकार कौन देता है?
        संविधान निर्माताओं ने गहन विचार-विमर्श के बाद सदन में विधेयक पारित होने से पहले चर्चा का प्रावधान किया था. लेकिन भारत का दुर्भाग्य है कि आज सदन में चर्चा कम और हो-हंगामा ज्यादे होता है. आज-कल सदन में चर्चा लगभग नही हो पाती है क्योंकि विपक्ष का उद्देश्य सत्ता पक्ष में खामियां ढूंढना हो गया है.आज-कल जन प्रतिनिधियों के लिये दलगत राजनीति सर्वोपरि है चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हो. बेशक सभी दलों कि अपनी- अपनी राजनीति है लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि है. राष्ट्र के विकास को वोट बैंक कि राजनीति से नही जोड़ा जाना चाहिये. विपक्ष को यह ध्यान रखना चाहिये कि उसके एंटी  सत्ता पक्ष वाला रवैया देश के सवा सौ करोड़ लोगो के जनादेश और सदन कि गरिमा का अपमान होगा. विपक्ष को अपना रवैया बदलने चाहिये और जन प्रतिनिधियों को दलगत राजनीति से परे उठकर राष्ट्र कि राजनीति करनी चाहिये.
-राजीव प्रताप सिंह

2 Responses to “संसद में विपक्ष की उत्तरदायित्वहीनता”

  1. mahendra gupta

    विपक्ष को यदि सरकारी बिल से असहमति है तो उसे सदन में बहस के माध्यम से सुलझाना चाहिए न कि हंगामा कर के सदन की बैठक को भांग करके। आखिर टेबल पर बैठ कर ही विवादों को सुलझाया जा सकता है पराजय से तिलमिलाई कांग्रेस के पास बस एक ही खटराग है कि यह सरकार उद्योगपतियों को प्रश्रय दे रही है। लेकिन जब विकास की बात आती है तो वह पुरे देश का ही होता है न कि केवल किसी एक वर्ग का। गरीबों के नाम पर राजनीति करने वाले कितने ईमानदार हैं व कितनी उनको उनकी परवाह है इस का पता उसके पिछले दस साल के शासन से चलता है लेकिन इन अराजक लोगों के चुने जाने का एक कारण हम भी हैं इनको सजा जनता ही दे सकती है जब किवह जागृत हो अन्यथा ये लोग सदन को बंधक बनाये रखेंगे व हम मुहं ताकते रहेंगे , अगले चुनाव के बाद ये सत्ता में आ भी गए तो आज का सत्ता पक्ष विपक्ष में बैठ ये हरकते करेगा , यह हमारे देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि खुद को परिपक्व लोकतंत्र कहने वाले देश में ऐसी अपरिपक्वता देखने को मिल रही है

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  2. suresh karmarkar

    विपक्ष में चाहे कोई दल हो या दलों का समूह हो वह विरोध के लिए विरोध करता है. विदेशी निवेश का मसला हो ,बीमे में विदेशी निवेश हो, आतंकवाद पर कोई क़ानून बनाया जाय ,भमि अधिग्रहण विधेयक हो संसद में बहस नही. सड़कों पर मार्च ,सदन में हंगामा। यह नियति बन चुकी है. फ़िलहाल इसमें से निकलने का रास्ता नही.

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