विपक्षहीन राजनीति का दौर

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 52 सीटें मिली हैं। कुल सीटों के दस प्रतिशत से कम होने के कारण उसे इस बार भी विपक्षी दल का दर्जा नहीं मिलेगा। अतः कई राजनीतिक विश्लेषक चिंतित हैं। मजबूत विपक्ष न हो, तो सत्तापक्ष निरंकुश हो जाता है। अंग्रेजी कहावत है, “Power currupts & absolute power currupts absolutely.”

भारत में तीन राजनीतिक दलों की पहुंच पूरे देश में किसी न किसी रूप में रही है। ये हैं कम्यूनिस्ट, कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी; पर वामपंथ सिकुड़ते हुए अब केरल तक सीमित रह गया। वहां भी इस लोकसभा में उसकी दुर्दशा के संकेत उनके लिए भयावह हैं। भा.ज.पा. सब ओर तेजी से बढ़ रही है, जबकि उसी अनुपात में कांग्रेस पीछे खिसक रही है।

कांग्रेस को इस बार दक्षिण ने सहारा दिया, अन्यथा वह 40 पर ही सिमट जाती। केरल में हिन्दू संगठनों ने सबरीमला मुद्दे पर जो माहौल बनाया, उसका लाभ भा.ज.पा. की बजाय कांग्रेस को मिला। तमिलनाडु में उसे मिली सीटों का कारण द्रमुक के साथ हुआ तालमेल है। कांग्रेस की अपनी सीट तो बस पंजाब में हैं। यद्यपि विश्लेषक उन्हें राहुल की बजाय अमरेन्द्र सिंह की सीटें मानते हैं। उधर तेलंगाना में मुख्यमंत्री के.चंद्रशेखर राव ने 12 कांग्रेस विधायकों को अपने पक्ष में मिला लिया। आंध्र में जगनमोहन को मिले बंपर बहुमत ने भी विपक्ष की जगह छीन ली है। इसलिए चिंताजनक प्रश्न यही है कि क्या भारत में विपक्षहीन राजनीति का दौर आ रहा है; और इसके परिणाम क्या होंगे ?

कई लोगों का मत है कि जैसे एक समय कांग्रेस में से टूटकर कई पार्टियां बनीं और उन्होंने ही केन्द्र और राज्यों में विपक्ष की भूमिका निभायी, ऐसा ही भा.ज.पा. के साथ भी होगा। भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना 1925 में हुई। उसकी विचारधारा विदेश प्रेरित, लोकतंत्र विरोधी और हिंसा की समर्थक है। यद्यपि भारत में उन्हें मजबूरी में चुनाव लड़ने पड़ते हैं। जिन देशों से उन्हें प्रेरणा मिलती थी, वह सोवियत रूस बिखर गया और चीन साम्यवादी खोल में पूंजीवादी हो गया। इसीलिए भारत में वामपंथ पचासों खेमों में बंट गया। कुछ राजनीति कर रहे हैं और शेष हिंसा।

कांग्रेस का चरित्र नेहरू परिवार के कारण व्यक्तिवादी हो गया। अतः उससे निकले दल भी इसी प्रवृत्ति के हैं। एक पीढ़ी तक तो उनका काम ठीक चलता है; फिर बच्चों में घरेलू सम्पत्ति की तरह दल पर कब्जे के लिए भी कलह होती है। समाजवाद और सेक्यूलरवाद का मुखौटा लगाये मुलायम सिंह, लालू यादव, ओमप्रकाश चैटाला, चंद्रबाबू नायडू, शरद पवार, नीतीश कुमार आदि मूलतः कांग्रेसी ही हैं। इनमें से अधिकांश घरेलू कलह में उलझे हैं। नवीन, ममता और मायावती अविवाहित हैं। अतः उनके दल उनके साथ ही तिरोहित हो जाएंगे; या फिर ‘खंडहर बता रहे हैं इमारत बुलंद थी’ की तरह नाम ही बचेगा।

भारतीय जनता पार्टी की पूर्वज भारतीय जनसंघ का गठन नेहरू मंत्रिमंडल में शामिल डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने किया था; पर जनसंघ कभी घरेलू दल नहीं बना, चूंकि उसके पीछे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ का नैतिक बल था। कांग्रेस से निकले नेता विभिन्न राज्यों में पनप गये; पर जनसंघ या भा.ज.पा. से निकले नेता सफल नहीं हो सके। इसका सबसे पहला प्रयास बलराज मधोक ने किया। 1947-48 में कश्मीर बचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का बड़ा योगदान रहा है। उस समय वे वहां प्रांत प्रचारक थे। अर्थात जनसंघ से उनके वैचारिक मतभेद नहीं थे। कानपुर अधिवेशन में वे फिर अध्यक्ष बनना चाहते थे; पर कार्यकर्ताओं की इच्छा नहीं थी। अतः उन्होंने पार्टी छोड़ दी। फिर उन्होंने बहुत हाथ-पैर मारे; पर सफल नहीं हुए। भा.ज.पा. के उदय के बाद राजनीति छोड़कर वे फिर रा.स्व.संघ के कार्यक्रमों में आने लगे।

कुछ ऐसा ही प्रयास उ.प्र. में कल्याण सिंह ने किया। वे एक जमीनी नेता रहे हैं। अतः भा.ज.पा. सरकार में वे मुख्यमंत्री बने; पर उनकी कुरसी हथियाने के इच्छुक लोगों की पहुंच प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तक थी। अतः उन्हें हटाकर पहले रामप्रकाश गुप्ता और फिर राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री बन गये। इससे नाराज होकर कल्याण सिंह ने अपनी पार्टी बनायी और अपने धुर विरोधी मुलायम सिंह से हाथ मिला लिया; पर सफल नहीं हुए। कल्याण सिंह अब राजस्थान के राज्यपाल हैं।

कल्याण सिंह की तरह उमा भारती भी जमीनी नेता हैं। 2003 में उन्होंने म.प्र. को कांग्रेस से छीना था। मुख्यमंत्री बनने के कुछ समय बाद ही हुबली कांड के कारण उन्हें पद छोड़ना पड़ा; पर उससे बरी होने पर उन्हें उनकी कुरसी नहीं दी गयी। इस अन्याय से नाराज होकर उन्होंने ‘भारतीय जनशक्ति पार्टी’ बनायी; पर सफल नहीं हुईं। अंततः वे फिर भा.ज.पा. में शामिल होकर केन्द्रीय मंत्री बनीं।

गुजरात में भा.ज.पा. को जमाने में नरेन्द्र मोदी और शंकर सिंह बाघेला ने अथक परिश्रम किया। बाघेला मुख्यमंत्री बनना चाहते थे; पर वरिष्ठता के कारण बने केशुभाई पटेल। इससे नाराज होकर उन्होंने सरकार गिरायी; पर मोदी जैसे खिलाड़ी से वे पार नहीं पा सके। उन्होंने भी अपना दल बनाया; पर राजनीतिक बियाबान में खो गये। कर्नाटक में येदियुरप्पा ने भी भा.ज.पा. को चोट तो पहुंचाई; पर वे मुख्यमंत्री नहीं बन सके और अब फिर भा.ज.पा. में ही हैं।

इन प्रकरणों पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि भा.ज.पा. से अलग होने वाले सफल नहीं हुए, जबकि कांग्रेस से अलग होने वाले अधिकांश लोग सफल हो गये। इसका कारण दोनों के स्वभाव का अंतर है। कांग्रेस पिछले 50 साल से एक खानदानी पार्टी है। उसके वोटर को भी यह खराब नहीं लगता; पर भा.ज.पा. का वोटर व्यक्ति की बजाय संगठन और विचार को महत्व देता है। इसलिए भा.ज.पा. में से ही सक्षम विपक्ष निकलने का विचार केवल भ्रम है।

लेकिन विपक्ष की जरूरत का यक्ष प्रश्न फिर भी विद्यमान है। कम्यूनिस्ट अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं। कांग्रेस में उस परिवार से पीछा छुड़ाने का दम नहीं है, जो उसकी बरबादी का कारण है; और भा.ज.पा. में से निकला विपक्ष सफल नहीं हो सकता। तो क्या देश में अब विपक्षहीन राजनीति चलेगी ? इसके लाभ और हानि पर सबको सोचना चाहिए। 

विजय कुमार

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