‘जिस स्थान पर यज्ञ होता है वहां की भूमि पवित्र हो जाती हैः स्वामी आनन्दवेश’

 

मनमोहन कुमार आर्य,

हरिद्वार में आयोजित तीन दिवसीय गुरुकुल महासम्मेलन का आज 8 जुलाई, 2018 को समापन दिवस था। हम देहरादून से प्रातः चलकर लगभग 9.00 बजे गुरुकुल पहुंचे। यज्ञ चल रहा था। यज्ञ की पूर्णाहुति पर हम वहां उपस्थित थे। डा. प्रियंवदा वेदभारती जी के ब्रह्मत्व में यज्ञ हुआ। यज्ञ की पूर्णाहुति पर उनका सम्बोधन भी हुआ। इसके बाद स्वामी आर्यवेश जी ने सम्बोधन दिया और कहा कि इस यज्ञ में दर्शन कुमार अग्निहोत्री जी ने दस टीन गाय का शुद्ध घृत एवं सामग्री आदि प्रदान कर सहयोग किया है। स्वामी जी ने महत्वपूर्ण बात यह कही कि मुझे इस सम्मेलन की सफलता की इतनी आशा नहीं थी। इस कार्यक्रम में लोगों का उत्साह एवं सहयोग देखकर हम प्रसन्न व सन्तुष्ट हैं। स्वामी आर्यवेश जी के बाद गुरुकुल गोमत, उत्तरप्रदेश के आचार्य स्वामी श्रद्धानन्द जी का प्रवचन हुआ। वह व्हील चेयर पर आये। पिछले दिनों एक दुर्घटना में उनके पैर की हड्डी टूट गई थी। स्वामी जी ने अपने उपदेश में आर्यसमाज के 6ठे नियम की चर्चा की। स्वामी जी ने कहा कि आत्मिक उन्नति की ओर हमारी प्रायः उपेक्षा रहती है। उन्होंने कहा कि आध्यात्मिक उन्नति पर आर्यसमाज टिका है। यदि मनुष्य के जीवन में आध्यात्म नहीं है तो वह जीवन मृत प्रायः है। उन्होंने कहा कि हमारा आध्यात्मिक पक्ष कमजोर नहीं होना चाहिये। स्वामी जी ने जागने का नाम जीवन और सोने का नाम मृत्यु बताया। स्वामी जी ने कहा कि जो व्यक्ति केवल भौतिक उन्नति में लगे हुए हैं वह सोये हुए हैं।स्वामी जी ने गार्गी और याज्ञवल्क्य संवाद को भी रोचक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। गार्गी ने याज्ञवल्कय जी से प्रश्न किया था कि संसार में सबसे अभागा मनुष्य कौन है? ऋषि याज्ञवल्कय जी ने कहा कि धनहीन मनुष्य अभागा है। सन्तानहीन मनुष्य भी अभागा है। जिस मनुष्य की समाज में प्रतिष्ठा नहीं है वह भी अभागा है। ऋषि ने अन्त में कहा कि जिस मनुष्य ने अपने मनुष्य जीवन में आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार नहीं किया वह सबसे अधिक अभागा है। स्वामी जी ने अपने बहुमूल्य जीवन में आत्मा परमात्मा को जानने इन दोनों का साक्षात्कार करने को कहा। स्वामी जी ने यज्ञशाला के पंडाल उपस्थित लोगों को कहा कि आप यहां से दैनिक यज्ञ करने का संकल्प लेकर जायें। इसी के साथ स्वामी श्रद्धानन्द, गोमत का व्याख्यान समाप्त हो गया। इसके बाद श्री लाजपत राय चौधरी, रोहतक का सम्बोधन हुआ।श्री लाजपतराय चौधरी ने अपने वक्तव्य के आरम्भ में कहा कि कि हे ईश्वर आपको मेरी वन्दना स्वीकार हो। मैं करूं प्रणाम बारम्बार हो। उन्होंने पानीपत के तृतीय युद्ध में मराठाओं की यवनों के हाथों पराजय का उल्लेख कर कहा कि जो लोग मिलकर एक साथ भोजन बना नहीं सकते और एक साथ मिलकर खा नहीं सकते वह जीवन युद्ध में विजयी नहीं हो सकते। उन्होंने बताया कि अब्दुलशाह अब्दाली हिन्दुओं की इसी दुर्बलता के कारण कम सेना व शक्ति होने पर भी विजयी हुआ था। विद्वान श्री चौधरी ने यज्ञ के मध्य दान का एक प्रभावशाली उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि एक सेठ जी यज्ञ में चार दिन लगातार आये और नीचे बैठे रहे किसी ने उन्हें पूछा तक नहीं। चौथे दिन उन्होंने एक मोटी रकम दान में दी। इस पर आयोजकों ने उका बहुत सम्मान किया और उन्हें मंच पर बैठाया गया। विद्वान वक्ता ने कहा कि इस सम्मान का कारण उन सेठ जी का धन नहीं अपितु उसका त्याग करना था। यह दान की महिमा है। जो व्यक्ति धन होते हुए भी बिना दान किये किसी के द्वारा पूछा नहीं जाता वह दान करने से प्रतिष्ठा पाता है। चौधरी साहब ने आर्यसमाज के अधिकारियों और श्रोताओं को कहा कि आर्यसमाज से विघटन को त्याग दीजिए। उन्होंने कहा कि आज सदस्यों के स्तर पर समस्या नहीं है अपितु नेतृत्व के स्तर पर समस्या हैं। उन्होंने पुनः दान व त्याग करने की प्रेरणा की जिससे संगठन व देश को लाभ होगा। श्री चौधरी ने कहा कि मैकाले की शिक्षा से मनुष्य का चरित्र और नैतिकता का तपन हुआ है। उन्होंने कहा कि हमें गुरुकुलों के आचार व विचारों को भी सुधारना होगा।यज्ञ सम्पन्न होने पर गुरुकुल शुक्रताल के विद्वान आचार्य स्वामी आनन्दवेश जी ने भी श्रोताओं को सम्बोधित किया। स्वामी आनन्दवेश जी ने कहा कि जिस स्थान पर यज्ञ होता है वहां की भूमि पवित्र हो जाती है। उन्होंने कहा कि स्वर्ग वहां विद्वान होता है जहां विद्वानों का समागम होता है, वेद मन्त्रों की ध्वनि गूंजती है और स्वाहा स्वाहा की ध्वनि भी होती है। स्वामी जी ने कहा कि आप जिस स्थान पर बैठे हैं यह स्वर्ग हैं क्योंकि यहां पर यज्ञ हुआ है। स्वामी जी ने कहा कि स्वामी दयानन्द का जर्मनी के संस्कृत विद्वान प्रो. मैक्समूलर से पत्राचार हुआ था। स्वामी दयानन्द जी ने उससे उसका नाम पूछा था? मैक्समूलर ने अपना नाम बदला और उन्हें बताया कि व्याकरणानुसार मेरा सही नाम मोक्षमूलर है। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानन्द ने सारी दुनिया में वेदों का सन्देश दिया था। वेदों का सन्देश सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक ईश्वर का सन्देश है। वैदिक संस्कृति सृष्टि की आदि संस्कृति है। आप वैदिक धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए यहां आयें हैं। उन्होंने कहा यदि हमने यहां बैठकर कोई संकल्प लिया तो हमारा यह गुरुकुल सम्मेलन सम्पन्न हो जायेगा नहीं तो नहीं होगा। स्वामी जी ने लोगों से कहा कि यहां आप अपनी एक बुराई को अवश्य छोड़ देना। इसी के साथ स्वामी जी ने अपने संक्षिप्त व्याख्यान को विराम दिया।हम गुरुकुल सम्मेलन के प्रथम दिन सम्मेलन में गये थे। वहां भीषण गर्मी थी। वहां बैठना व बाहर घूमना असम्भव प्रायः था। बार बार पसीना पोछना पड़ रहा था। पंडाल के अन्दर जो लोग कूलर के पास बैठे थे उन्हें छोड़ कर श्रोता व वक्ता सभी गर्मी के शिकार थे। गर्मी के कारण हमारा स्वास्थ्य भी कुछ खराब हो गया था। दूसरे दिन हम सम्मेलन में जा नहीं सके। आज तीसरे दिन हमने साहस किया और सम्मेलन में पहुंच गये इस उम्मीद में की कुछ लोगों के दर्शन होंगे और कुछ देखने और सुनने को मिलेगा। इससे लाभ ही होगा, हानि तो किसी भी प्रकार से नहीं होगी और समय का भी सदुपयोग हो जायेगा। यज्ञशाला में संक्षिप्त प्रवचनों के बाद मुख्य पंण्डाल में वेद एवं संस्कृति सम्मेलन का आयोजन हुआ।

 

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